कांग्रेस ने अपने हिसाब से किए संविधान में संशोधन
   दिनांक 27-मई-2018
न्यायपालिका पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस खुद कितना न्यायालय का सम्मान करती है इस पर हमने पिछली स्टोरी में चर्चा की थी कि कांग्रेस सरकारों ने कैसे नेहरू काल से ही न्यायालयों और न्यायाधीशों को लगातार प्रभावित करने की कोशिश की। जो न्यायालय और न्यायाधीश दबाव में नहीं आये उन्हें अपमानित एवं दण्डित किया गया। साथ ही न्यायालयों के निर्णयों से छुटकारा पाने के लिए संविधान में समय-समय पर संशोधन किये गए। प्रो. मक्खन लाल के इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे संशोधनों के रास्ते न्यायालयों के निर्णय कूड़ेदान में डाले गए।

 
भारत ने अपना संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया। संविधान के लागू होने के मात्र चार महीने बाद ही,12 मई 1950 को जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय संविधान में पहले संशोधन का मसौदा संसद में रखा। यह संविधान के भाग 3, अनुच्छेद 19 (स्वातंत्र्य-अधिकार) से संबंधित था। यहां यह जान लेना चाहिए कि अनुच्छेद 19 ही संविधान का वह हिस्सा है जो हमें अधिकार देता है:
1. वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का
2. शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मलेन का
3. संगम या संघ बनाने का
4. भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का
5. भारत के किसी भाग में निवास करने/ बस जाने का, और
6. कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का।
नेहरू अपनी नीतियों एवं कार्यप्रणाली की वजह से मीडिया एवं विपक्ष की आलोचना के शिकार हो रहे थे। साथियों के समझाने के बाद वह कुछ दिन तो रुके, लेकिन फरवरी 1951 में उन्होंने कैबिनेट समिति बनाई जिसके समक्ष कहा गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अनर्गल, अशोभनीय, जहरीली एवं गंदी भाषा में केंद्रीय एवं प्रदेश सरकारों पर प्रहार किया जा रहा है जिसे हर हाल में रोकना चाहिए। इसके लिए अनुच्छेद19 में संशोधन आवश्यक है। तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर को संशोधन का मसौदा तैयार करने को कहा। आंबेडकर ने न केवल ऐसा करने से मना किया बल्कि यह भी कहा कि यह संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। पर नेहरू नहीं माने और उसी दिन आंबेडकर को निर्देश दिया कि संशोधन का मसौदा तुरंत तैयार किया जाये और संसद में उसी सत्र में पास कराया जाय। मसौदा तैयार होने पर कैबिनेट ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद (तत्कालीन राष्ट्रपति) को अवलोकन के लिए भेजा। राष्ट्रपति ने मसौदे पर गहरी आपत्ति जताते हुए स्पष्ट लिखा कि ‘सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और समकालीन परिस्थितियों को देखते हुए साफ लगता है कि स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि ‘मौलिक अधिकारों’ में कोई संशोधन किया जाये।’ फिर भी नेहरू नहीं माने और 12 मई, 1951 को संविधान संशोधन का मसौदा संसद में पेश किया। संशोधन मसौदा देख कर एच. बी. कामथ, ह्रदयनाथ कुंजरू, श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि ने एक स्वर से कहा कि यह तो संशोधन नहीं बल्कि अनुच्छेद19 (स्वातंत्र्य-अधिकारों) को पूरी तरह खत्म करने का बिल है। काफी विरोध के बाद नेहरू ने न केवल उस बिल को एक संसदीय समिति को भेजने के नाम पर वापस लिया बल्कि विस्तृत रूप से संशोधन कर 23 अक्तूूबर 1951 को ‘द प्रेस (ओब्जेक्शनेबल) एक्ट’ रूप में पास किया, न कि अनुच्छेद 19 में संशोधन के रूप में।
ब्रिटिश काल के ‘प्र्रिवेंशन-डिटेक्शन एक्ट’ को कांग्रेस सरकार ने आगे चलाये रखा। इस बिल को वह विभिन्न संशोधनों (1952, 1954, 1957 और1960) के साथ पास कराती रही। नेहरू ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल के शुरुआती दिनों में कृषि और औद्योगिक नीति लागू करने के लिए बिना कोई उचित मुआवजा दिए जमींदारों तथा कृषकों की भूमि का अधिग्रहण किया। लोगों ने इसे अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना। कई प्रदेशों के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में भी इस निर्णय को चुनौती दी गई। उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में इस दलील के स्वीकार होने के बाद नेहरू ने मौलिक अधिकारों की सूची से ‘राइट टू होल्ड प्रोब’ का अंश निकाल दिया।
इंदिरा गांधी के शासनकाल में तो संविधान संशोधनों की बाढ़ आ गयी थी। महाराजाओं-राजाओं को दिए जाने वाले प्रिविपर्स को खत्म करने की बात हो या बैंकों के अधिग्रहण की; उच्चतम न्यायालय ने इन सबको गलत ठहराया था। इंदिरा गांधी ने इन फैसलों को संविधान संशोधन के रास्ते न्यायालयों के निर्णयों को निरस्त कर प्रिविपर्स खत्म किया और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में संविधान के साथ कितनी छेड़छाड़ की, इसे थोड़ा विस्तार में जानना जरूरी है।
इंदिरा गांधी सत्ता में आने के बाद ही संविधान संशोधनों के रास्ते सर्वशक्तिमान तानाशाह बनना चाहती थीं। पहले न्यायालयों के माध्यम से ऐसा करने की कोशिश की गई। इस सन्दर्भ में गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार नाम से प्रसिद्ध केस सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उच्चतम न्यायालय में भारत सरकार के अटार्नी जनरल और अन्य अधिवक्ताओं ने यह दलील रखी कि अनुच्छेद 368 (जिसमें संविधान को संशोधित करने की शक्ति निहित है) के अंतर्गत संसद को संविधान में संशोधन करने के असीमित अधिकार हैं। यहां तक कि संविधान के भाग-3 को भी खत्म किया जा सकता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि पूरा भाग-3 हमारे मौलिक अधिकारों से संबंध रखता है। इसे हम ऊपर देख चुके हैं और भारतीय नागरिकों को गारंटी के रूप में संविधान में निहित किया गया है। संविधान का यही हिस्सा है जो भारत के नागरिकों को सम्मान से जीने एवं जुल्म के खिलाफ लड़ने की ताकत देता है। इंदिरा सरकार के अधिवक्ताओं ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि संसद को संविधान के इस हिस्से को भी खत्म करने का अधिकार है।
यह तो भारत के नागरिकों का भाग्य अच्छा था कि उच्चतम न्यायालय ने सरकार की इस दलील को नहीं माना और साफ निर्णय दिया कि संसद के पास असीमित न होकर बहुत ही सीमित अधिकार हैं। संसद संविधान में ऐसा कोई भी संशोधन नहीं कर सकती जिससे कि ‘मौलिक अधिकारों’ पर आंच आये। उच्चतम न्यायालय के फैसले से तिलमिलाई इंदिरा सरकार ने 24वां संशोधन कर अनुच्छेद-13 में काफी बदलाव किये, जिससे कि संविधान के भाग-3 को परोक्ष रूप से निरस्त किया जा सके और उच्चतम न्यायालय के फैसले को भी रद्दी के टोकरी के हवाले किया जा सके।
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक बार पुन: केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार के केस में यह पूरा प्रकरण उठ गया। इसके पहले कि हम इस केस में विस्तार से जायें, यह जानना आवश्यक है कि केशवानंद भारती केस भारत के संविधान और न्यायपालिका के इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह केस न्यायालय और संविधान में निहित,आज तक की सबसे बड़ी पीठ (13 जजों) के द्वारा सुना गया था। पांच महीने तक लगातार सुनवाई हुई। आज तक के इतिहास में इसमें ही सर्वाधिक दस्तावेज पेश किये गए थे।
24वें और 25वें संविधान संशोधनों के माध्यम से गोलकनाथ केस के निर्णय को निरस्त किये जाने के संदर्भ में उच्चतम न्यायलय के समक्ष निम्न तीन बिंदु
रखे गए:
1. गोलकनाथ केस में दिया यह निर्णय सही था कि संसद को ‘मौलिक अधिकारों को खत्म या कम करने का अधिकार नहीं है।’ अत: 24वें संशोधन को रद्द किया जाये।
2. 25वें संशोधन से प्रदत्त अनुच्छेद-31 (उ) मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 14, 19 और 31 को प्रभावित करता है। इसलिए इसे निरस्त किया जाये।
3. किसी भी हालत में संसद को संविधान को संशोधित कर उसमे मौलिक आधार को बदलने/खत्म करने का अधिकार नहीं है। किसी भी संशोधन को न्यायालय में चुनौती दी जा
सकती है।
न्यायालय में उठाये गए ये तीन बिंदु निम्न तीन बातों से सम्बंधित हैं : नागरिकों के मौलिक अधिकार, संविधान का मूलभूत स्वरूप, और ऊपर दिए दोनों बिंदुओं पर न्यायालय के हस्तक्षेप का अधिकार। पांच महीने की सुनवाई के बाद 24 अप्रैल, 1973 को फैसला आया। सात जजों ने फैसला सुनाया-‘संसद के पास संविधान संशोधन के सीमित अधिकार हैं और संविधान के मूलभूत स्वरूप को संशोधन कर खत्म नहीं किया जा सकता।’ इस आलोक में संविधान में किये गए 24वें और 25वें संशोधनों के कई प्रावधानों को न्यायालय ने निरस्त कर दिया। ये सात जज थे: मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सीकरी और न्यायमूर्ति जे.एम. शेलट, के.एस. हेगड़े, ए.एन. ग्रोवर, ए.के. मुखर्जी, जगनमोहन रेड्डी तथा एच.आर. खन्ना।
जिन छह जजों ने इंदिरा सरकार की दलीलों को मानते हुए फैसला दिया कि संसद के पास संशोधन के असीमित अधिकार हैं और वह जो चाहे कर सकती है, वे थे-न्यायमूर्ति आदित्यनाथ रे, डी.जी. पालेकर, के.के. मैथ्यू, एम.एच. बेग, एस.एन. द्विवेदी और वाई.वी. चन्द्रचूड़। जिन जजों ने सरकार की मंशा के खिलाफ निर्णय दिया उनके साथ क्या हुआ, वह पहले बताया जा चुका है, और जिन्होंने सरकार की मनमर्जी का साथ दिया, उनके साथ जो हुआ, वह भी सब जानते हैं।
1973 और 1975 के बीच सरकार ने संविधान में कई संशोधन किये, लेकिन 26 जून, 1975 को आपातकाल लगाने के बाद तो संविधान पर मानो लगातार गाज गिरने लगी। अगस्त 1975 में विरोधी पक्ष के सभी नेता जेल में थे, तब संसद में 41वां संशोधन बिल पेश किया गया। इस बिल ने तो सभ्य समाज में विधि द्वारा स्थापित न्याय व्यवस्था तथा संसदीय व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। संशोधन ने व्यवस्था दी-1. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं राज्यपालों के खिलाफ उनके पद पर रहते हुए, कहीं भी किसी भी अदालत में कोई भी सिविल केस नहीं चल सकता। 2. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों पर आजन्म किसी तरह के आपराधिक कार्य के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। किसी भी सभ्य समाज में इस तरह के विधानों का कोई उदाहरण नहीं मिलता। तत्कालीन भारत में कांग्रेस के हुक्मरानों ने खुद को संविधान, कानून के ऊपर कर लिया था।
(लेखक इतिहासकार एवं स्तंभकार हैं)
क्यों डरी इंदिरा सरकार?
तत्कालीन इंदिरा सरकार को संशोधनों पर ही संतोष नहीं हुआ, क्योंकि केशवानंद भारती केस का फैसला उसके गले की फांस बना हुआ था। उसकी वजह से सभी संशोधनों में न्यायिक हस्तक्षेप का डर बना रहता था। इसे खत्म करने के लिए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर केशवानंद भारती केस को निरस्त करने की मांग की। ऐसा इसलिए क्योंकि जब तक यह केस निरस्त नहीं होता तब तक संविधान के मूलभूत ढांचे की बात बनी रहती। इस याचिका के विरोध में नानी पालखीवाला ने मात्र 7 पृष्ठों का प्रार्थना पत्र दिया।10 नवम्बर 1975 को 13 जजों की पीठ केस सुनने के लिए बैठी। पालखीवाला ने पीठ-गठन पर सवाल उठा दिए, कहा कि पिछले दो-ढाई वर्ष में ऐसा क्या हुआ जिससे कि केस की पुन: समीक्षा करने की जरूरत पड़ी? फिर जब देश में भय का वातावरण है और सभी विरोधी नेता जेल में हैं, ऐसा में यह सर्वथा गलत है। और यह कि 13 जजों की पीठ द्वारा दिए गए निर्णय की समीक्षा एक और 13 जजों की पीठ करे, यह न केवल परंपरा के लिहाज से गलत है वरन् कानूनी तौर पर भी गलत है। कल को एक तीसरी 13 जजों की पीठ की समीक्षा को हम कैसे रोक पाएंगे? दो दिन की सुनवाई के बाद पीठ ने बिना कुछ आगे सुने खुद को निरस्त कर केशवानन्द भारती केस को बहाल रखा। देश पालखीवाला और उनके साथियों का ऋणी रहेगा कि उन्होंने ऐसे समय में संविधान की रक्षा की जब इंदिरा सरकार की तानाशाही चरम पर थी।