तुतुकड़ी में हुई हिंसा के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार, संयंत्र 1994 में खोला गया था तब केंद्र में थी कांग्रेस की सरकार
   दिनांक 28-मई-2018
वेदांता ने कांग्रेस के राज में भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय से पर्यावरण मंजूरी प्रमाण पत्र प्राप्त किया था। शुरू से लोग इस प्लांट का विरोध कर रहे थे कांग्रेस ने किसी की बात नहीं सुनी क्योंकि कांग्रेस के बड़े नेता पी. चिदंबरम 2004 में देश के वित्त मंत्री बनने से पहले वेदांता ग्रुप ऑफ कंपनीज के निदेशक थे


22 मई को तमिलनाडु के तुतुकुडी में स्टरलाइट के तांबा गलाने वाले संयंत्र के खिलाफ चल रहा विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया। हिंसक भीड़ ने अंततः कहर बरपा दिया और शहर को युद्ध क्षेत्र बना दिया। जब हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने में अन्य विकल्प नाकाम रहे, तो पुलिस ने फायरिंग का सहारा लिया, जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। वास्तव में, आगजनी और विध्वंस करने के अलावा घातक हथियारों से लैस भीड़ ने निर्दोष नागरिकों और पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया। तब जाकर पुलिस ने फायरिंग शुरु की। पुलिसकर्मियों के खिलाफ बर्बर हमले के वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इन हिंसक हमलों में कई निर्दोष नागरिक और पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों ने अनेक सरकारी और निजी वाहनों को जला दिया। उन्होंने जिला कलेक्टर के कार्यालय और एटीएम जैसी सार्वजनिक उपयोगिताओं सहित कई इमारतों में भी तोड़फोड़ की।
वास्तव में तुथुकुडी में घटी घटनाएं पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच थीं। प्रदर्शनकारियों की मांग एक तांबा गलाने का संयंत्र बंद करने की थी। कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है, संघ का नहीं। तमिलनाडु में सत्ताधारी पार्टी एआईएडीएमके है और जो एनडीए गठबंधन का हिस्सा भी नहीं है।
यहां से स्थिति में मोड़ आता है। तुथुकुडी में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के तुरंत बाद, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने ट्विटर अकाउंट से एक बयान जारी किया। जिसमें उन्होंने तुथुकुडी में गड़बड़ियों के लिए आरएसएस और भाजपा दोनों पर आरोप लगाया था। कांग्रेस अध्यक्ष के इस तरह के सफेद झूठ ने कई लोगों को चौंका दिया। एक विचार यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष का बयान गलती से जारी नहीं किया गया था बल्कि अपने स्वयं के दुष्कर्मों से ध्यान हटाने के लिए जानबूझकर दिया गया था। इसका एक और इरादा एक और ऐसा गढ़ा हुआ झूठ फैलाने का भी था कि देश में शांतिपूर्ण वातावरण खतरे में है। लेकिन बीजेपी और आरएसएस पर लांछन लगाने में जल्दबाजी में कांग्रेस अध्यक्ष ने किसी भी प्रासंगिक तथ्य की जांच करने की जरूरत नहीं समझी।
वास्तव में, वेदांता ने तुतुकुड़ी में तांबा गलाने वाला संयंत्र 1994 में जब खोला था, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। वेदांता ने भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय से पर्यावरण मंजूरी प्रमाण पत्र प्राप्त किया, और 1997 में जब कामकाज शुरू किया, तब देवगौड़ा के नेतृत्व वाली कांग्रेस समर्थित सरकार केंद्र में सत्ता में थी। शुरुआत से ही इस संयंत्र का लगातार विरोध रहा और कानूनी लड़ाई चली थी। लेकिन वेदांता समूह को 2009 में जब एक अन्य संयंत्र के लिए पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी मिली, तब यूपीए सत्ता में थी। 2010 में, स्टरलाइट प्लांट से संबंधित एक प्रश्न का उत्तर देते हुए, तत्कालीन पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि “एसआईपीसीओटी (सिपकोट) औद्योगिक परिसर तुथुकुडी, तमिलनाडु में दूसरे चरण के लिए तांबा स्मेल्टर संयंत्र के विस्तार के लिए पर्यावरण मंजूरी, मेसर्स स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (इंडिया) लिमिटेड को पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) अधिसूचना 2006 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार 1 जनवरी 2009 को दी गई थी। इस अधिसूचना के अनुसार, इस परियोजना की या औद्योगिक संपत्ति के भीतर चलने वाली गतिविधियों की सार्वजनिक सुनवाई की आवश्यकता नहीं है।” जब यह किया गया था, तब राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता थे, जो सरकार को नियंत्रित करते थे। इसके अलावा, कांग्रेस के बड़े नेता पी. चिदंबरम 2004 में देश के वित्त मंत्री बनने से पहले वेदांता ग्रुप ऑफ कंपनीज के निदेशक थे। वह कंपनी की कानूनी टीम का हिस्सा भी थे।
इससे भी बढ़कर, भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में मामले के सभी तथ्यों और आयामों पर विचार करने के बाद, मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया था और कंपनी को संयंत्र संचालित करने की अनुमति दी थी। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि अदालत ने पर्यावरण प्रदूषित करने के लिए कंपनी पर 100 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। इसी प्रकार, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी संयंत्र के संचालन के लिए कंपनी के पक्ष में निर्णय दिया था।
 
जब तथ्य इस प्रकार हैं, तो फिर राहुल गांधी ने आरएसएस और बीजेपी के खिलाफ एक गैरजिम्मेदाराना झूठ क्यों प्रचारित किया? उनकी पार्टी के लोग और उनकी सहयोगी कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने एक कदम आगे बढ़कर यह आरोप लगा दिया कि दंगा करने वालों पर सिविल ड्रेस में निशाना लगाने वाला एक पुलिसकर्मी आरएसएस का सदस्य है। वास्तव में, जो पुलिसकर्मी संभवतः तमिलनाडु पुलिस टास्क फोर्स का सदस्य था, वह उस समय अपनी प्रशिक्षण वाली वर्दी पहने हुआ था।
 
स्पष्ट रूप से यह राहुल और वामपंथियों की एक रणनीतिक चाल थी- ताकि हिंसा और दंगे में शामिल रहे हाशिए पर पड़े मिशनरी-माओवादी तत्वों को बचाया जा सके। क्योंकि असहिष्णुता अभियान के पीछे असली और अदृश्य कारक वही हैं। यही वे लोग हैं, जो देश में अशांति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस आज ऐसी ताकतों का मुखौटा भर रह गई है।
 
तुथुकुडी में, स्टरलाइट विरोधी आंदोलन के पीछे असली कर्ताधर्ता मिशनरी लॉबी है। मोहन सी. लिजारस जैसे ईसाई प्रचारक ने स्टरलाइट संयंत्र के खिलाफ लोगों को भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लोगों के अनुसार, 22 मार्च को एक विरोध मार्च पनीमाया माता चर्च नाम की एक चर्च से शुरू हुआ था। इसके अलावा, मीडिया रिपोर्टों का कहना है कि नासरथ की उपकार माता चर्च का मुख्य पादरी जयासीलन डीसी कार्यालय के सामने हुई पुलिस गोलीबारी में घायल हुआ। और तुथुकुडी के आर्क बिशप युवोन अंबरोइस अस्पताल में उसे देखने गए। केवल स्टरलाइट संयंत्र ही नहीं, दक्षिणी तमिलनाडु में विकास विरोधी कई आंदोलन मिशनरी लॉबी द्वारा भड़काए और कराए जाते हैं। कुडमकुलन परमाणु विद्युत परियोजना के खिलाफ आंदोलन इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। विडंबना यह है कि यही मिशनरी लॉबी पश्चिमी घाटों पर गाडगिल समिति की पर्यावरण हितैषी रिपोर्ट का विरोध करती है। इससे उनके दोहरे मानदंडों का स्पष्ट रूप से खुलासा होता है।
 
22 मई का विरोध और उत्पात मुख्य रूप से हाशिए पर पड़े कट्टरपंथी वामपंथी तत्वों की कारगुजारी थी, जिसे मिशनरी लॉबी का अनकहा समर्थन प्राप्त था। मक्कल अधिगारम (पीपुल्स पावर), पुराईचिक्कारा इलेंजर मुन्नानी (क्रांतिकारी युवा संघ) जैसे संगठनों और विभिन्न अन्य हाशिए पर पड़े वामपंथी तत्वों ने तुतुकुड़ी में भीड़ जुटाने और भीड़ से हिंसा कराने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। पहले मिली कुछ रिपोर्टों के मुताबिक हाशिए पर पड़े वामपंथी तत्वों ने निर्दोष ग्रामीणों को एकत्रित करने और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए तुथुकुडी क्षेत्र में अपने सैकड़ों कार्यकर्ता तैनात किए। वंचिनाथन, हरि राघवन और रामचंद्रन जैसे हाशिए पर पड़े नेताओं ने इन आंदोलनों में मुख्य भूमिका निभाई। 25 अप्रैल 2018 को स्टरलाइट कार्यालय में एक पेट्रोल बम फेंका गया था, और पुलिस को उस घटना में इन समूहों के शामिल रहे होने का संदेह है। रिपोर्टों में कहा गया है कि 22 मई को हुई पुलिस गोलीबारी में मारे गए जयरामम और तमिलरासन इन हाशिए पर पड़े वामपंथी समूहों के नेता थे और दूसरे जिलों के रहने वाले थे।
 
इस दंगे में विदेशी हाथों की कथित भागीदारी इस मामले का एक और आयाम है। फॉइल वेदांता लंदन स्थित एक समूह है, जो वेदांता समूह के खिलाफ काम करता है। उसके निरंतर अभियानों के कारण कई शेयरधारकों ने वेदांता समूह से अपना निवेश हटा लिया है। ऐसी खबरें हैं कि इसके कर्ताधर्ताओं ने एक बैठक में भाग लेने के लिए तुथुकुडी का गुपचुप दौरा किया था। इसके अलावा स्टरलाइट विरोधी आंदोलन की एक नेता फातिमा बाबू सक्रिय रूप से इस समूह के संपर्क में है। तांबा गलाने की भट्टियों से होने वाला प्रदूषण तुथुकुडी में कोई अलग-थलग घटना नहीं है। दुनिया भर में ऐसी कई भट्टियां इसी तरह के आरोपों का सामना कर रही हैं। और न ही तांबे का गलाया जाना और इसका उपयोग किया जाना कोई हाल ही में घटी या भौगोलिक तौर पर सिर्फ यहीं घटी घटना है। पिछले कम से कम 5000 वर्षों से तांबा मानव जीवन का हिस्सा है। तांबा हमारे दैनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश की तांबा गलाने वाली सबसे बड़ी इकाइयों में से एक का बंद होना निश्चित रूप से हमारे राष्ट्रीय हितों और हमारी राष्ट्रीय क्षमताओं को प्रभावित करेगा। स्वाभाविक रूप से, इससे आयात में वृद्धि होगी, और कीमतों में वृद्धि अंततः हम सभी को प्रभावित करेगी। इसके अलावा, किसी भी पर्यावरणीय मुद्दे का उपाय हिंसा नहीं है, बल्कि इसके प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए।
 
जीवन अनमोल है, और जिन लोगों ने निर्दोष लोगों को हिंसा में शामिल होने के लिए भड़काया है, और उन्हें बंदूकों की नलियों की ओर धकेला है, वे आज सुरक्षित हैं। उनकी डोर खींचने वाले अदृश्य हाथ और उनके इरादे भी अराजकता के शोर में दफन हो गए हैं। आज हम जो जोर की आवाज सुन रहे हैं, वह राहुल गांधी जैसे नेताओं की भय पैदा करने की कोशिशें हैं। सौभाग्य की बात यह है कि फिलहाल उनका पर्दाफाश हो गया है। लेकिन उन लोगों का क्या होगा, जो कांग्रेस के मुखौटे के पीछे छिप रहे हैं? क्या वे देश के खिलाफ कोई और नया और गंदा षड़यंत्र रच रहे हैं? इसका जवाब केवल समय दे सकेगा।

(लेखक सेंटर फॉर साउथ इंडियन स्टडीज (दिल्ली स्थित एक थिंक टैंक के निदेशक हैं)