षड्यंत्र का शिलालेख
   दिनांक 29-मई-2018

अरुण कुमार सिंह, झारखंड से लौटकर
जनजातियों की सदियों पुरानी प्रथा पत्थरगड़ी को ढाल बनाकर उन्हें सरकार के विरुद्ध भड़काया जा रहा है। इस मुहिम को शहरों में बैठे कथित बुद्धिजीवियों की शह मिल रही है और जमीनी स्तर पर कन्वर्जन में जुटे ईसाई मिशनरी से जुड़े गुर्गे भोले-भाले लोगों से कह रहे हैं कि अपने गांव में किसी बाहरी व्यक्ति को मत आने दो

 

 
उलीडीह (खूंटी) गांव के मुहाने पर गड़ा एक पत्थर

इन दिनों पूरे देश में पत्थरगड़ी (जनजातीय उच्चारण पत्थलगड़ी) की चर्चा है। पत्थरगड़ी मुख्य रूप से झारखंड में हो रही है, लेकिन इसकी आग अब छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैल चुकी है। इसके अंतर्गत लोगों को भारत के प्रशासनिक तंत्र के विरुद्ध भड़काया जा रहा है। सरकारी योजनाओं का विरोध किया जा रहा है। लोगों को मतदान न करने और जनवितरण प्रणाली की दुकानों से राशन लेने से रोका जा रहा है। आगे बढ़ने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर पत्थरगड़ी क्या है? जनजातियों में पत्थरगड़ी सदियों पुरानी प्रथा है, जो चार मौकों पर होती है। पहला, किसी की मौत पर, दूसरा, सगोत्र विवाह का बहिष्कार करने के लिए, तीसरा भूमि का सीमांकन करने के लिए और चौथा किसी की दुर्घटना में मृत्यु होने पर। लेकिन इस प्रथा की आड़ में इन दिनों कुछ भारत विरोधी तत्व जनजातियों को भड़का रहे हैं। इसी का दुष्परिणाम है कि जनजाति-बहुल अनेक क्षेत्रों में गांवों के बाहर पत्थर गाड़ कर बाहरी लोगों को गांव में प्रवेश से रोका जा रहा है। गांववालों को इतना भड़का दिया गया है कि वे अपने गांवों में न तो किसी सरकारी अधिकारी को घुसने देते हैं और न ही कोई सरकारी योजना वहां चलने देते हैं। उनका कहना है कि ग्राम सभा की अनुमति के बिना गांव में किसी सरकारी मुलाजिम का आना या कोई सरकारी कार्य करना अवैध और जनजातीय परंपरा के विरुद्ध है। यहां तक कि ये लोग अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ने भी नहीं भेज रहे हैं। सरकारी योजनाओं के विरुद्ध उनमें ऐसा जहर भर दिया गया है कि वे दीवारों पर लिखी गई सरकारी योजनाओं की जानकारी भी मिटा रहे हैं। हालत यह है कि जिस खूंटी की डोम्बारी पहाड़ी पर बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी, वहां स्वतंत्र भारत में प्रशासनिक अमले को घुसने तक नहीं दिया जा रहा।

हम उस दिन खूंटी जिला मुख्यालय से जमशेदपुर की ओर जाने वाली सड़क पर करीब चार किलोमीटर आगे बढ़े तो रोगों-दीगरी गांव मिला। गांव के मुहाने पर हरे रंग से रंगा एक पत्थर गड़ा हुआ है। इस पर स्थानीय जनजाति की मुंडरी भाषा में कई पंक्तियां लिखी हुई हैं। एक मुंडरीभाषी ने बताया कि पत्थर पर लिखा हुआ है, ‘‘अनुसूचित क्षेत्र (जनजाति-बहुल क्षेत्र) में बिना ग्राम सभा की अनुमति के किसी भी व्यक्ति या समूह का आना सख्त मना है।’’


 

उसके आगे कुछ ही दूरी पर उलीडीह गांव मिला। उसके मुहाने पर भी भ्रामक बातों का उल्लेख करता तथा लोगों को देश और इसकी व्यवस्था से काटता एक पत्थर गड़ा हुआ था। शिलालेख में हिंदी में मुख्य रूप से तीन बातें लिखी गई हैं- पहली, ‘‘अनुसूचित प्रदेशों-क्षेत्रों में, लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय चुनाव तथा पंचायत चुनाव अवैध हैं।’’ दूसरी, ‘‘अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र सरकार या राज्य सरकार की एक इंच भी जमीन नहीं है। (समता जजमेंट 1997, उच्च न्यायालय)।’’ तीसरी, ‘‘आदिवासी हिंदू नहीं हैं। वे हिंदू कानून-व्यवस्था से संचालित नहीं होते हैं। अत: वे भारत के जिस किसी भी भूभाग में निवास करें, वहां वे अपनी स्वशासन-व्यवस्था से ही संचालित होंगे।’’

पत्थरगड़ी करने वाले चर्च और नक्सली समर्थित लोग भोले-भाले जनजातीय समाज में दावा करते हैं कि ‘‘अंग्रेजों ने गुजरात के एक कानूनविद् कुंवर केसरी सिंह के साथ एक समझौता किया था। उसके अनुसार भारत के मालिक जनजातीय समाज के लोग हैं, बाकी नौकर। चूंकि उस समय जनजातीय समाज के लोग राजपाट चलाने में सक्षम नहीं थे, इसलिए इस देश को 99 साल के पट्टे पर केंद्र सरकार को दिया गया था और वह पट्टा 1969 में समाप्त हो गया है।’’ इस कथित पट्टे की जानकारी गांव-गांव में फैलाने के लिए एक पुस्तक विश्वक्रांति संदेश : आदिवासीभी प्रकाशित की गई है। (पुस्तक में अनेक आपत्तिजनक बातें हैं।)

पत्थरगड़ी करने वाले भारत सरकार और राज्य सरकार के अस्तित्व को ही नहीं मानते, लेकिन देश में एक वर्ग ऐसा है, जो उनके कार्य को सही ठहराता है। रांची जिले के ब्रांबे गांव में सरना मत के पाहन (पुजारी) बंधन तिगा कहते हैं, ‘‘पत्थरगड़ी के जरिए लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। राजनीति करने वाले इसे राजनीतिक नजरिए से देखते हैं और सामाजिक कार्य करने वाले समाज की दृष्टि से देखते हैं।’’ मारांग हादा पंचायत के पूर्व मुखिया दोरो मुंडा भी पत्थरगड़ी को ठीक मानते हैं। वे कहते हैं, ‘‘मेरे गांव के विद्यालय में 70 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन शिक्षक एक है। ऐसे में बच्चे कैसे पढ़ेंगे? जितनी भी सरकारी योजनाएं चलती हैं, सबमें भ्रष्टाचार होता है। इसलिए इन योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पाता। सरकार भ्रष्टाचार रोके, स्कूल में शिक्षक नियुक्त करे तो हम लोग पत्थरगड़ी नहीं करेंगे।’’

क्या है पत्थरगड़ी की प्रथा ?

 

गुट्टूहातु गांव का एक कब्रिस्तान

जनजातियों की यह अति प्राचीन प्रथा है। चार अवसरों पर पत्थरगड़ी की जाती है। पहला, जब किसी का निधन होता है तो तत्काल उसे दफना दिया जाता है। 10वें दिन रिश्तेदारों की उपस्थिति में उसकी कब्र के पास पूजा होती है। इसके बाद विधि-विधान से वहां एक पत्थर गाड़ा जाता है। उस पर उसकी पूरी वंशावली लिखी जाती है। हालांकि पत्थर गाड़ना अनिवार्य नहीं है, परंतु जो सक्षम हैं, वे निश्चित रूप से ऐसा करते हैं। दूसरा, गांव या जमीन की सीमा तय करने के लिए, ताकि जमीन संबंधी किसी विवाद से बचा जा सके। तीसरा, एक गोत्र में विवाह करने वालों का बहिष्कार करने के लिए। ऐसे जोड़े को गांव के लोग गाजे-बाजे के साथ गांव से बाहर कर देते हैं और एक पत्थर गाड़ देते हैं जिस पर उस लड़के और लड़की का पारिवारिक विवरण होता है और यह भी लिखा जाता है कि आज से ये दोनों इस गांव में प्रवेश नहीं कर सकते। और चौथा, किसी की आकस्मिक मृत्यु होने पर। किसी दुर्घटना से, आग में जल जाने से, पानी में डूबने से, सांप या किसी पशु के काटने से यदि कोई मर जाता है तो उसे श्मशान में नहीं दफनाया जाता, बल्कि और कहीं दफना कर उसके नाम से एक पत्थर गाड़ा जाता है। उस पर उसका और उसके परिवार के नाम के अलावा मृत्यु का कारण भी लिखा जाता है।

(पूरी स्टोरी पढ़ने के लिए 3 जून का हमारा अंक पढ़ें)