ऐसा रोजा रखने का क्या फायदा ?
   दिनांक 29-मई-2018
रोज़ा या निर्जल व्रत एक तरह का कर्मकांड या प्रैक्टिस है.. इसमे जान बूझकर भूखा रहा जाता है ताकि अल्लाह को ख़ुश किया जा सके.. और अल्लाह को ख़ुश करना मतलब जन्नत.. और जन्नत मतलब हूरें, शराब, कबाब और अय्याशी.. मतलब दिन रात फ़्री सेक्स और अनंत तक मज़ा.. तो रोज़ा इसलिए रखा जाता है.. असल मक़सद इसका यही है और हमेशा से यही था.
लखनऊ और कई शहरों में कुछ होटल और कुछ दुकानदारों ने रोजेदारों के लिए शाम की इफ्तारी का मुफ़्त इंतेज़ाम कर रखा है.. बड़े ब्रांड के मुस्लिम होटल हैं जो शाम के वक़्त खाना सजा के रख देते हैं और जो भी रोज़ा हो वो जा कर उसे खा सकता है..पेपर इस बारे में लिख रहे हैं तारीफों के साथ कि जैसे कितना बड़ा पुण्य का काम हो रहा है.
रोज़ा या निर्जल व्रत एक तरह का कर्मकांड या प्रैक्टिस है.. इसमे जान बूझकर भूखा रहा जाता है ताकि अल्लाह को ख़ुश किया जा सके.. और अल्लाह को ख़ुश करना मतलब जन्नत.. और जन्नत मतलब हूरें, शराब, कबाब और अय्याशी.. मतलब दिन रात फ़्री सेक्स और अनंत तक मज़ा.. तो रोज़ा इसलिए रखा जाता है.. असल मक़सद इसका यही है और हमेशा से यही था.. रोज़ा इस्लाम के आने से पहले चंद्र देवता को ख़ुश करने के लिए था इस्लाम आने के बाद ये अल्लाह को ख़ुश करने के लिए हो गया

चालक धर्माधिकारी कहते मिलेंगे कि वो इसलिए भूखे रहते हैं ताकि ग़रीबों की पीड़ा महसूस कर सकें और अपने ऊपर कंट्रोल कर सकें.. मगर ये सब सिर्फ़ बातें हैं.. गरीबों की भूख आपको महसूस होके गरीबों का क्या भला हो जाएगा? तो ये सब दलीलें सिर्फ नौटंकी हैं.. ग़रीबों को खाना चाहिए कि आपकी नौटंकी? आप भूखे हों और कोई आपके बगल में आ कर बैठ जाये और कहे कि "देखो मैंने भी आज जानबूझकर कुछ नहीं खाया ताकि तुम्हारी भूख महसूस कर सकूं".. तो वो ग़रीब भी कहेगा कि "काहे को नौटंकी कर रहे हो भाई.. अरे घर से खाना ले आते उसे हम और तुम बैठ कर खाते.. तुम्हारे भूखे रहने से मुझे क्या मिल रहा है यार?"...ये बड़ी कॉमन सेंस की बात है.

ये मुस्लिम होटल जो फ़्री इफ्तारी दे रहे हैं वो इसे पूरे साल क्यूं नहीं दे सकते हैं? क्यूंकि बाक़ी के दिनों में सवाब का कोई वो कांसेप्ट नहीं है और मौलानाओं ने बाक़ी के दिनों में किसी "सच्चे" भूखे को खाना खिलाने के जन्नत के किसी ऑफ़र का ज़िक्र नहीं किया है.. सारा ऑफ़र इसी महीने में है इसलिए सब दिल खोलकर ऑफ़र का लाभ उठाते हैं बस.. उसके अलावा और कुछ नहीं है.

ये कहेंगे कि रोज़ेदारों का एहतराम (आदर) करो..उनके सामने कुछ मत खाओ पियो.. सोचिये ये जो प्रैक्टिस कर के भूखे रहते हैं इनका आदर करो.. और पूरे साल असल ग़रीबी से भूखे लोगों के सामने जम के छोले भटूरे उड़ाओ.. आपके सामने इसलिए कोई खाये पिये न ताकि आपको भूख न लग जाये? वाह!!!

इस्लामिक देशों में रमज़ान के दिनों में पब्लिक में खाना पीना मना हो जाता है ताकि रोज़ेदारों को भूख का एहसास न हो.. सोचिये ज़रा.. सोने और चांदी की गाड़ियों में चलने वाले सऊदी के लोग भूखे रहकर ग़रीब की भूख का एहसास करते हैं और तक़वा और परहेज़गारी सीखते हैं.. कहते वो यही हैं..मगर ये सब दुनिया के अन्य लोगों को झांसा देने के लिए होता है.. दिल मे हूरें और जन्नत की शराब उछाल मार रही होती है.. कैसा ग़रीबों का दर्द और कहां का दर्द ?

दरअसल जब अन्य दुनिया समझदार हुई और उसने इंसानियत सीखी तो अरबी बद्दुओं ने भी अपनी परंपराओं में इंसानियत ठूंसने की कोशिश की.. ये सारे ग़रीबी, तक़वा (धैर्य) और परहेज़गारी वाले लॉजिक उसी दुनियावी प्रेशर का नतीजा हैं.. सिख समाज रोज़ लंगर चलाता है.. ईसाई जाने कितने भूखे नंगों को खाना देता है.. सारा पश्चिम अपने यहां के ज़्यादातर ग़रीबों को खाना मुहैय्या करवाता है.. तो ये सब देखकर इस्लामिक आलिमों ने भी गरीबों की भूख रोज़े से जोड़ ली और मुस्लिम होटल सवाब कमाने लगे और पेपर उन्हें महिमामंडित करने लगे.

मुसलमान रोज़े रखकर गरीबों की भूख तीस दिन महसूस करते हैं फिर कुर्बानी के दिन करोड़ों जानवर काट के एक ही दिन सारी दुनिया के भूखे और ग़रीब लोगों के लिए गोश्त का इंतेज़ाम कर देता हैं और फिर पूरे साल न तो ग़रीबों की बात करते हैं और न और के भूख की.. क्यूंकि रमज़ान के महीने की फ़ज़ीलत का ऑफ़र ख़त्म हो चुका होता है अल्लाह की तरफ़ से मुझे इस से परेशानी नहीं है कि हम और आप रोज़ा रहते हैं..परेशानी इस से है कि आप इसमे भी झूठ शामिल करते हैं और रोज़े को ऐसा महिमामंडित करते हैं जैसे इंसानियत के लिए कितना बड़ा काम किया जा रहा है आपके द्वारा बताईये रोज़े ने आपको कितनी इंसानियत सिखाई है? कितनी बार आपने गरीबों के सामने खाना सिर्फ़ इसलिए नहीं खाया ताकि आपको देखकर उन्हें भूख न लग जाये?? और रमज़ान के बाद आपने कितनी बार मस्जिदों में रोज़ खाना भेजा ताकि ग़रीब उसे खा सकें? ये सब सीखा आपने कभी रोज़े से? या बस आप हर साल भूखे रहकर गरीबों की भूख महसूस करने की प्रैक्टिस ही करते रहेंगे??

(ताबिश सिद्धकी के वॉल से साभार )