महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और जनरल करिअप्पा भी आ चुके हैं संघ के वर्ग में
   दिनांक 29-मई-2018


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष के समापन पर स्वयंसेवकों को संबोधित करने के लिए भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी स्वीकृति दे दी है। ऐसे में जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी गाहे बगाहे संघ परिवार पर हमले का मौका नहीं छोड़ते तो प्रणब मुखर्जी का संघ के तृतीय वर्ष वर्ग के समापन में जाना कांग्रेसियों और वामपंथियों को खासा परेशान करना वाला है। संभवत: इसलिए अभी तक किसी ने इस बात पर कोई टिप्पणी भी नहीं की है। जहां तक प्रणब दा की बात है तो इंदिरा गांधी के बाद के दौर में प्रणब मुखर्जी, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में गिने जाते रहे हैं। कांग्रेस में उनकी गिनती थिंक टैंक के रूप में होती थी। वह राष्ट्रपति बनने से पहले तक कांग्रेस से जुड़े रहे और देश के रक्षा, वित्त और विदेश मंत्री का पद संभाला। उनके बेटे अभी कांग्रेस से सांसद हैं जबकि बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी दिल्ली महिला कांग्रेस की नेता हैं। दरअसल संघ की यह परंपरा रही है कि अपने कार्यक्रमों में वह विशिष्ट लोगों को आमंत्रित करता रहा है भले ही वह किसी भी विचारधारा के हों, लेकिन जो भी संघ के किसी वर्ग में गया वह वहां का अनुशासन देखकर उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका। महात्मा गांधी, डॉ भीमराव आंबेडकर से लेकर जनरल करिअप्पा समेत तमाम लोग संघ के विभिन्न वर्गों में आ चुके हैं।
​दरअसल जिस तरह संघ के बारे में विषैला दुष्प्रचार किया जाता है वह आधारहीन है। संघ के नाम पर जिस तरह राजनीति की जाती है उसका कोई औचित्य नहीं। संघ जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं रखता और उसका ध्येय सामाजिक एकता को बनाए रखते हुए राष्ट्र को परमवैभव की ओर ले जाना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने जब संघ की शुरुआत की तो उनका मानना था कि विगत कुछ शतकों में हिंदू समाज विभाजित हो चुका है। उन्होंने हिंदू समाज में चल रही जातिगत भेदभाव पर कठोर प्रहार किए। वह कहा करते थे ‘अपना संपूर्ण कार्य हिंदू समाज का संगठन करना है। हिंदू समाज के किसी भी अंग की उपेक्षा करने से यह कार्य सिद्ध नहीं होगा। हिंदू मात्र से हमारा व्यवहार स्नेहपूर्ण होना चाहिए। जातिगत ऊंच-नीच का भाव हमारे मन को कभी स्पर्श न करे। ऊंच-नीच , जात-पात के आधार पर सोचना भी पाप है। संघ के स्वयंसेवकों के मन में ऐसे घृणित और समाज के लिए घातक विचारों को कभी स्थान नहीं मिलना चाहिए। राष्ट्र के प्रति भक्ति रखने वाला प्रत्येक हिंदू मेरा भाई है। यही दृढ़ भावना प्रत्येक स्वयंसेवक की होनी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कभी भी छूआछूत,अस्पृश्यता, ऊंच-नीच का स्थान नहीं रहा।
आज जब कुछ कथित बुद्धिजीवी और राजनीतिक दल संघ को लेकर भ्रांतियां फैलाने की कोशिश करते हैं और संघ की कार्यपद्धति पर सवाल उठाते हैं तो उन पर हंसी आती है। दरअसल उन्हें तो संघ की पद्धति और संघ कार्य के बारे में रत्तीभर भी जानकारी नहीं है।
जब किसी संस्था के सर्वोच्च नेतृत्व में परिवर्तन होता है तो उसके लक्ष्य और नीतियों में परिवर्तन हो जाया करता है, लेकिन संघ में ऐसा कभी नहीं हुआ। डॉ. हेडगेवार के बाद संघ के दूसरे सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने 1969 में कनार्टक के उडुपी नामक स्थान पर संपन्न विश्व हिंदू सम्मेलन में कहा था ‘ धर्म के संबंध में विकृत कल्पना के कारण ही अस्पृश्यता की दुष्ट सामाजिक प्रथा आज तक बनी हुई है। इस धर्म विरोधी प्रथा को खत्म करने करने के लिए परंपरागत मठाधिपतियों को ही आगे आना होगा। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि परंपरागत समाज आज भी धर्माचार्यों को ही धर्म का अधिकृत प्रवक्ता मानता है। शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध, सिख आदि समस्त पंथों के प्रतिनिधि इस सम्मेलन में उपस्थित थे।’
गुरुजी कहा करते थे ‘संघ में समाज के विभिन्न स्तरों से आने वाले हजारों स्वयंसेवक एकत्र होकर खाना खाते हैं। साथ में खेलते हैं, लेकिन उन्हें कभी अपने साथ के स्वयंसेवक की जाति, पंथ आदि को जानने की इच्छा नहीं होती। आप हिंदू हैं, इतना ही हमारे लिए पर्याप्त है। यह मानकर वह चलते हैं। ’

1934 में महात्मा गांधी आए थे संघ के वर्ग में
सामाजिक समरसता का कार्य संघ अपनी स्थापना के पहले दिन से ही करता आ रहा है। 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शीत शिविर वर्धा में महात्मा गांधी के आश्रम के पास ही लगा था। उन्होंने शिविर को देखने इच्छा प्रकट की। वर्धा के संघचालक अप्पाजी जोशी ने उनका स्वागत किया। महात्मा गांधी ने बड़ी बारीकी से शिविर का निरीक्षण किया। उन्होंने अप्पाजी से पूछा, इस शिविर में कितने हरिजन हैं ? अप्पाजी ने जवाब दिया। यह बताना कठिन है, क्योंकि हम सभी को हिंदू के रूप में ही देखते हैं। इतना हमारे लिए पर्याप्त है। इसके बाद उन्होंने स्वयं शिविर में भाग ले रहे स्वयंसेवकों से उनकी जाति पूछी तो उन्हें पता लगा कि तमाम जातियों के स्वयंसेवक शिविर में मौजूद हैं लेकिन एक दूसरे की जाति को लेकर आपस में उनमें कोई भेद नहीं करता। अगले दिन डॉ. हेडगेवार नागपुर से वहां आए तो वह महात्मा गांधी से मिलने गए। महात्मा गांधी ने उनसे जानना चाहा कि संघ में अस्पृश्यता निवारण का कार्य किस प्रकार किया जाता है। इस पर डॉ. हेडगेवार ने कहा ‘हम अस्पृश्यता दूर करने की बात नहीं करते बल्कि हम स्वयंसेवकों को इस प्रकार विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम सभी हिंदू हैं और एक ही परिवार के सदस्य हैं। इससे किसी भी स्वयंसेवक में इस तरह का विचार नहीं आता है कि कौन किस जाति का है? ’

स्पष्ट है संघ का ध्येय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक मात्र ध्येय ‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’ यानी राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है। संघ ने ऐसा किया भी है। जो संघ के ध्येय है उसके अनुरूप संघ ने अपनी कार्यपद्धति का भी निर्माण किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संघ कार्य करने भी अपना तरीका है। यह तरीका स्वयं अपना प्रचार करने का नहीं है बल्कि व्यक्तिगत संपर्क का है। व्यक्तिगत संपर्क से संबंधों में आत्मीयता आती है। संघ शिविरों के इतर सहभोज भी संघ की कार्यपद्धति में से एक है। इसमें स्वयंसेवक किसी स्वयंसेवक के यहां बैठकर भोजन करते हैं। सभी अपने घरों से भोजन लेकर आते हैं और साथ में बैठकर मिल-बांटकर भोजन करते हैं। यहां सब बराबर होते हैं। किसी के बीच कोई भेद-भाव नहीं होता।

बाबा साहेब भी गए थे संघ शिक्षा वर्ग में
समाज को समरसता के सूत्र में पिरोकर उसे संगठित और सशक्त बनाने वाले महानायकों में से एक डॉ. भीमराव आंबेडकर भी संघ के प्रणेता डॉ. हेडगेवार के संपर्क में थे। बाबा साहेब 1935 और 1939 में संघ शिक्षा वर्ग में गए थे। 1937 में उन्होंने कतम्हाडा में विजयादशमी के उत्सव पर संघ की शाखा में भाषण भी दिया था। इस दौरान वहां 100 से अधिक वंचित और पिछड़े वर्ग के स्वयंसेवक थे। जिन्हें देखकर डॉ. आंबेडकर को आश्चर्य तो हुआ ही बल्कि भविष्य के प्रति उनकी आस्था भी बढ़ी। सितंबर 1948 में उनकी भेंट गुरुजी से भी हुई थी। संघ में जाति, ऊंच-नीच, अस्पृश्यता जैसी कोई चीज नहीं होती। बाबा साहेब साहेब संघ के इस रूप से परिचित थे इसलिए जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो बाबा साहेब ने उसे हटवाने के लिए अपने स्तर पर खूब प्रयास किए थे।
6 दिसंबर 1956 को बाबा साहेब की मृत्यु हुई। इसके छह वर्ष बाद 1963 में डॉ. आंबेडकर के अनुयायियों ने उनके 73वें जन्मदिन पर एक विशेषांक निकाला। इस विशेषांक में गुरुजी ने एक छोटा सा संदेश लिखा। गुरुजी ने लिखा ‘वंदनीय डॉ. आंबेडकर की पवित्र स्मृति का अभिवादन करना मैं अपना स्वभाविक कर्तव्य समझता हूं। उन्होंने स्वर्ण समाज की ‘छुओ मत’ प्रवृत्ति से निर्मित रूढ़ियों पर कठोर प्रहार किए और समाज की पुनर्रचना करने का आह्वान किया। कष्ट तथा अपमानित जीवन बिताने वाले समाज के बहुत महत्वपूर्ण वर्ग के लिए डॉ. आंबेडकर ने सम्मान का जीवन जीना संभव बनाया। उनके इस कार्य के द्वारा राष्ट्र पर जो महान उपकार किया गया उसका ऋण उतारना संभव नहीं है।’
जनरल करिअप्पा मंगलोर संघ के कार्यक्रम में गए थे

1959 में जनरल करिअप्पा मंगलोर की संघ शाखा के कार्यक्रम में गए थे। उन्होंने कहा “संघ कार्य मुझे अपने ह्रदय से प्रिय कार्यों में से है। अगर कोई मुस्लिम इस्लाम की प्रशंसा कर सकता है, तो संघ के हिंदुत्व का अभिमान रखने में गलत क्या है? प्रिय युवा मित्रों, आप किसी भी गलत प्रचार से हतोत्साहित न होते हुए कार्य करो। डॉ. हेडगेवार ने आप के सामने एक स्वार्थरहित कार्य का पवित्र आदर्श रखा है। उसी पर आगे बढ़ो। भारत को आज आप जैसे सेवाभावी कार्यकर्ताओं की ही आवश्यकता है”।(Malkani KR, “How others look at the RSS”, Deendayal Research Institute, New Delhi)

वरिष्ठ पत्रकार दिनकर विनायक गोखले ने संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस का साक्षात्कार लिया था। यह साक्षात्कार अगस्त 1973 के किर्लोस्कर मासिक में प्रकाशित हुआ था। इसमें गोखले ने उनसे एक प्रश्न पूछा था, चातुर्वर्ण्य के बारे में संघ का क्या नजरिया है ? इस पर बालासाहब ने जवाब दिया था कि संघ को किसी किसी भी रूप में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था स्वीकार नहीं है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था ने सबसे बड़ी समस्या का निर्माण किया है। यह है अस्पृश्यता और समाजिक विषमता। इस बात को सभी ने स्वीकार किया है कि संघ में अस्पृश्यता और जात-पात नाम की चीज नहीं है। हमारे बढ़िये नाम के एक कायकर्ता हैं। वह बेलदार समाज के हैं। यह बात हमें संयोग से पता चली। हमने कभी उनकी जाति की पूछताछ नहीं की। हमारे घर में सनातनी वातावरण था लेकिन संघ में आने के बाद मैंने माताजी ने कह रखा था कि मेरे साथ जो कोई खाना खाने आएगा उसकी थाली मेरे बगल में ही परोसें और खाना खाने के बाद वह थाली नहीं उठाएंगे। संघ के कार्यक्रमों में स्पृश्य और अस्पृश्य का भेद नहीं रहता, लेकिन यह ध्यान में रखिए, यह दो-चार हजार साल पुरानी समस्या है। केवल आक्रोश प्रकट करने और कोई स्टंट करने से वह हल नहीं होगी। आज तक कई आंदोलन हुए होंगे मगर अस्पृश्यता तो कायम है न। इसलिए संघ की पद्धति ज्यादा परिणामकारक है, ऐसा मुझे लगता है। फिर भी मैं मानता हूं कि परिवर्तन की गति तेज होनी चाहिए, लेकिन बहुत जल्दबाजी करने से काम नहीं चलेगा। मेरा मान्यता है कि अस्पृश्य बस्तियों में संघ की शाखाएं बढ़ें तो स्वाभाविक रूप से अस्पृश्यता निवारण होगा।
बालासाहब देवरस ने 1986 राष्ट्रीय सेविका समिति के स्वर्ण जयंती समारोह में दिए भाषण में कहा था ‘चातुर्वर्ण्य व्यवस्था किसी भी रूप में स्वीकार नहीं है। जाति-व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए। हिंदू समाज की जातिप्रथा समाप्त होने पर सारा संसार हिंदू समाज को वरण करेगा। इसके लिए भारतीय महिला समाज को पहल अपने हाथ में लेकर अपने घर से ही अंतरजातीय और अंतरप्रांतीय विवाह की शुरुआत करनी चाहिए।
संघ के चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया का पाञ्चजन्य के 17 फरवरी 2003 के अंक में साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था। अपने साक्षात्कार में एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि छूआछूत, छोटे-बड़े की भावना पूरी तरह समाप्त होनी चाहिए। देश में सब धाराओं से मिलकर एक समरस जीवन पैदा हो यह हमारी आशा और अपेक्षा है।
समाज से अलगाव के भाव को हटाकर सभी एक साथ रहें। एक ऐसा संकल्प सभी के मन में दृढ़ता से हो संघ यही प्रयास करता है। अपने इसी विचार को लेकर संघ अपनी शुरुआत से समाजिक समरसता के लिए कार्य रह रहा है। राष्ट्रीयत्व का भाव समाज के हर व्यक्ति के हृदय में जागृत किया जा सके यही संघ का प्रयास है।