मेसून अल सुवैदन ने फेसबुक पर फोटो डालकर कहा हिजाब की आवश्यकता नहीं
   दिनांक 03-मई-2018



मेसून अल सुवैदन ने फेसबुक पर फोटो डालकर कहा हिजाब की आवश्यकता नहीं


कुवैत के मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य और इस्लामिक विद्वान तारेक अल सुवैदन बड़े इस्लामिक विद्वान माने जाते हैं। अक्सर वह टीवी चैनल पर इस्लाम से जुड़े मामलों में अपनी राय रखते हुए नजर आते हैं। इसके अलावा कई इस्लामिक मामलों पर उनकी कई किताबें भी हैं। इस्लामिक मामलों के जानकार के तौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड का एक बड़ा चेहरा हैं। उनकी बेटी मैसून अल सुवैदन भी एक प्रसिद्ध कवयित्री और टीवी पर्सनेलिटी हैं। सुवैदन इस्लामिक परंपराओं के अनुसार हमेशा सिर ढक कर रखती थीं। उन्होंने पूरे विश्व की यात्रा की और हमेशा इस्लामिक परंपरा के अनुसार सिर ढककर रखा। जार्जटाउन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली सुवैदन टीवी पर कविता पाठ करते समय भी सिर ढककर रहती थीं लेकिन कुछ दिनों पहले उन्होंने बिना हिजाब के अपना एक फोटो फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। उन्होंने फोटो के साथ एक कमेंट किया कि मैं किसी भी पंथ और संप्रदाय से दूर ईश्वर की खोज में भारत गई थीं। वहां मैंने पाया कि भगवान और मेरे बीच में सबसे बड़ा परदा हिजाब है। मुझे लगता है कि हिजाब पहनने की कोई आवश्यकता नहीं है। अरबी भाषा के अनुसार हिजाब का अर्थ वहां कई संदर्भों में प्रयोग होता है जैसे विभाजन महिलाओं द्वारा सिर ढककर रहने वाला आवरण आदि।
हिजाब छोड़ने के अपने इस निर्णय को सार्वजनिक मंच पर स्वीकारने के बाद उन्होंने कहा कि अपनी मान्यताओं को नकराने के बाद उसने भारत में आकर उन्होंने शुरू से ही ईश्वर की खोज शुरू की। मुझे लगा कि भगवान को पाने के लिए मुझे किसी हिजाब की जरूरत नहीं है। सुवैदन के इस बयान के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों और अन्य मजहबी संगठनों ने सुवैदन और उसके पिता को ट्रोल कर सोशल मीडिया पर उन पर अटैक शुरू कर दिए। हिजाब को लेकर सुवैदन के इस बयान ने मीडिल ईस्ट में एक चर्चा को भी जन्म दे दिया है। इस दौरान सुवैदन को लेकर कई लोगों ने लिखा कि वह हिजाब हटाने का अधिकार नहीं रखती हैं। उन्हें अपने फैसले के बारे में फिर से सोचना चाहिए। कइयों ने उसके पिता से अपील की कि वह उसे हिजाब पहनने के लिए प्रोत्साहित करें। वहीं कई लोगों ने सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने के लिए बधाई भी दी।

उनके फेसबुक पर टिप्पणी करते हुए सलह नाम के एक व्यक्ति कहा शायद यह मुद्दा इस्लाम के साथ नहीं है, लेकिन मुसलमान इन दिनों इस्लाम को कैसे लागू कर रहे हैं। रजा नाम के एक अन्य व्यक्ति ने टिप्पणी की मुझे इस बात का दुख है कि वह अपने रास्ते से भटक गई है। हालांकि मुझे उसे विश्वाघाती कहने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन हमें उसे वापस इस्लाम के रास्ते पर लाने के लिए प्रयास करना चाहिए। एक अन्य टिप्पणीकार मेलानी ने कहा सुवैदन की वजह से उसके पिता की प्रतिष्ठा कम हुई है। आप अपने जीवन में जो कुछ करना चाहते हैं वह करें लेकिन इस बारे में आपको सार्वजनिक मंच पर कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है। मुस्लिम महिलाओं को हिजाब पहनना चाहिए या नहीं इस विषय पर विवाद नई बात नहीं है। अरब देशों में इस विषय पर लंबे समय से बहस चल रही है। नई पीड़ी की अधिकांश युवतियों ने हिजाब को खारिज किया है। बहुत सी मुस्लिम युवतियां इस बात की शिकायत करती हैं कि हिजाब पहना जाए या न पहना जाए यह उनकी व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है लेकिन परंपरा और मान्यताओं के नाम पर उन पर हिजाब पहनने का दबाव बनाया जाता है। शायद अल सुवैदन पहली ऐसी महिला हैं जिन्होंने ईश्वर की खोज के लिए अपनी मान्यताओं और परंपराओं से हटकर हिजाब न पहनने का फैसला किया है। बहुत से लोगों ने उनके इस फैसले का स्वागत किया है तो बहुत से लोगों उनका विरोध कर रहे हैं। संभवत: सुवैदन का यह प्रयास अरब संस्कृति में महिलाओं के अधिकारों को लेकर चर्चा का एक नया मार्ग प्रशस्त करेगा।