इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल पर बोलबाला हिंदू संस्कृति का
   दिनांक 30-मई-2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच दिन के इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर दौरे पर हैं। पहले दिन वह इंडोनेशिया पहुंचे और राष्ट्रपति जोको विडोडो से मुलाकात की। वहां उनका शाही अंदाज में स्वागत हुआ इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल है लेकिन यहां हिंदू संस्कृति का बोलबाला है। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में अनेक हिन्दू जनजातियां हैं जिनमें लोगों के नाम भले मुस्लिम हों, पर व्यवहार में वे हिन्दू ही हैं। भारत के प्रति उनमें अनूठी आस्था है। इंडोनेशिया के करेंसी पर भी गणपति की मूर्ति है।

 

सांस्कृतिक रूप से भारत के करीब इंडोनेशिया

सांस्कृतिक रूप से इंडोनेशिया भारत के बेहद करीब है। इंडोनेशिया की करेंसी को रूपियाह कहते हैं। वहां, 20 हजार के नोट पर भगवान गणेश की फोटो है.दरअसल, भगवान गणेश को इंडोनेशिया में शिक्षा, कला और विज्ञान का देवता माना जाता है। जब इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई थी तो वहां आर्थिक चिंतकों ने 20 हजार का नोट जारी किया था जिस पर भगवान गणेश की तस्वीर थी। वहां के लोगों का मानना है कि इस कारण अब इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था ठीक हो गई है।

हिंदू परंपरा के कई पहलुओं को अपनाया है इंडोनेशिया ने

इंडोनेशिया अपनी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी के साथ दुनिया में एक अलग स्थान रखता है, साथ ही उसने सदियों से स्थानीय हिंदू धर्म और परंपरा के कई पहलुओं को भी अपनाया है। ऐतिहासिक तौर पर, यहां की आबादी को हिंदू धर्म में कन्वर्ट नहीं किया गया है, बल्कि उन्होंने भारत से आने वाले यात्रियों, व्यापारियों और यहां तक कि राजाओं की संस्कृति को अपनाया था, हिंसा और रक्तपात के बिना। इंडोनेशिया के हर हिस्से में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हो रहा है। 70 के दशक के प्रारंभ में, सुलावेसी के राजा हिंदू धर्मावलंबियों के रूप में पहचाने गए सबसे पहले लोग थे। इसके बाद 1977 में सुमात्रा के कारो बताक और 1990 में कालीमंतन के नगाजू दायक का नाम आता है। हिंदू धर्म के विस्तार में सबदापलोन और जयबाय द्वारा जावा में की गई प्रसिद्ध भविष्यवाणी से भी मदद मिली। मजाफित की परंपरा में यह वापसी राष्ट्रीय गौरव का विषय है।

जावा में हिंदू समुदाय की प्रवृत्ति नवनिर्मित पुरों (मंदिर) या वैसे पुरातात्विक मंदिर स्थलों के आसपास बसने की रही जिन्हें हिंदू पूजास्थल के रूप में पुन: निर्मित किया जा रहा है। पूर्वी जावा में एक महत्वपूर्ण नया हिंदू मंदिर पुरा मंदारगिरि सुमेरू अगुंग है, जो जावा के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट सुमेरू की ढलान पर स्थित है। जावा में अंतिम हिंदू शासन ब्लामबैंगन राज्य से जुड़े एक पुरातात्विक भग्नावशेष पर निर्मित एक अन्य नए मंदिर पुरा अगुंग ब्लामबैंगन और पुरा लोक मोक्ष जयबाया (केदरी के पास मेणंग गांव में)-जहां हिंदू राजा और नबी जयबाय ने कथित तौर पर मोक्ष प्राप्त किया था- के आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कन्वर्जन हुआ।

पूर्वी जावा में एक और नया स्थल है पुरा पकाक रायंग, जिसे बाली साहित्य में ऐसे स्थान के तौर पर दिखाया गया है जहां से महर्षि मार्कण्डेय पांचवीं शताब्दी में हिंदू धर्म लेकर बाली आए थे।

प्राचीन हिंदू मंदिर स्थलों के प्रमुख पुरातात्विक अवशेषों के आसपास पुनरुत्थान का एक उदाहरण पौराणिक हिंदू साम्राज्य मजपहित की राजधानी, मोजोकर्टो के निकट ट्रौलन में पाया गया। खुदाई में निकले एक अन्य मंदिर भवन पर नियंत्रण के लिए एक स्थानीय हिंदू आंदोलन चल रहा है। आंदोलनकारी इस स्थल को एक जाग्रत हिंदू उपासना स्थल के रूप में पुर्नस्थापित करना चाहते हैं। यह मंदिर गजह मडा को समर्पित किया जाना है, जिन्हें छोटे से हिंदू राज मजपहित को एक साम्राज्य में बदलने का श्रेय प्राप्त है। हालांकि, पूर्वी जावा में इस्लामीकरण के प्रतिरोध का एक सुस्पष्ट इतिहास रहा है, लेकिन हिंदू समुदाय भी मध्य जावा में प्रमबनन के प्राचीन हिंदू स्मारकों के निकट विस्तार कर रहे हैं। जावा में हिंदू के तौर पर अपना अस्तित्व संरक्षित रखने वाला समुदाय है-पर्वतीय ब्रोमो टेंगर मासिफ, जिन्होंने किसी भी हालत में इस्लाम को नहीं अपनाया।

अपने जीवन के तौर-तरीकों को बरकरार रखने वाला एक अन्य समुदाय है सुलावेसी द्वीप के टोराजा जिले में रहने वाली जनजाति। यह द्वीप हरे जंगलों और प्राकृतिक गैस सहित समृद्ध खनिजों से परिपूर्ण है। आ-लोक-टू-डोलन नाम की जनजाति अपनी परंपराओं से जुड़ी रही है और इसने कभी भी इस्लाम को नहीं अपनाया। लेकिन पिछली शताब्दी के बाद से इन पर कन्वर्जन का जबरदस्त दबाव बना हुआ है। इनके कन्वर्जन में शामिल चर्चके दावों को मानें तो चर्च ने 800,000 टोराजाओं को ईसाई बना लिया है और कथित तौर पर अब जिले में केवल 11000 लोग ही बचे हैं। इस सुदूर इलाके की यह दुख भरी कहानी है जहां शायद ही बाहरी दुनिया के लोग कभी पहुंचते हैं।