संघ के स्वयंसेवक डॉ. विष्णु श्रीधर ने खोजे थे भीमबैटका शैलाश्रय संघ के स्वयंसेवक डॉ. विष्णु श्रीधर ने खोजे थे भीमबैटका शैलाश्रय
संघ के स्वयंसेवक डॉ. विष्णु श्रीधर ने खोजे थे भीमबैटका शैलाश्रय
   दिनांक 04-मई-2018
सरकार ने किया पदमश्री से सम्मानित, स्वयंसेवक होने के नाते सामाजिक क्षेत्र में रहते थे सक्रिय, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, म.प्र. के अध्यक्ष रहे और 1981 में संस्कार भारती की स्थापना पर बने थे उसके महामंत्री
 
                                      
                                                                                 डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर
 

भारतीय सभ्यता लाखों वर्ष प्राचीन और अत्यंत समृद्ध है। हमारी सभ्यता और संस्कृति के बारे में जानने के लिए तमाम दुनिया के लोग भारत भ्रमण पर आते हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर खोज करते हैं। भारत की प्राचीन सभ्यता से विश्व को परिचित कराने में  विष्णु श्रीधर (हरिभाऊ) वाकणकर का नाम उल्लेखनीय है। भोपाल से 46 किलोमीटर दूर पर दक्षिण में भीमबैटका की गुफाएं मौजूद हैं। जो चारों तरफ से विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि भीमबैटका गुफाओं का स्थान महाभारत के चरित्र भीम से संबंधित है। इसी कारण से इसका नाम भीमबैठका भी पड़ गया। इनकी खोज वर्ष 1957-1958 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। इसके लिए उन्हें पदमश्री से सम्मानित किया गया। आज उन्हीं का जन्मदिवस है।
हरिभाऊ का जन्म 4 मई, 1919 को नीमच (जिला मंदसौर, म.प्र.) में हुआ था। इतिहास, पुरातत्व एवं चित्रकला में विशेष रुचि होने के कारण अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर वे उज्जैन आ गये और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे वहां पर ही प्राध्यापक हो गये।
उज्जैन के पास दंतेवाड़ा ग्राम में हुई खुदाई के समय उन्होंने अत्यधिक श्रम किया। 1958 में वे एक बार रेल से यात्रा कर रहे थे कि मार्ग में उन्होंने कुछ गुफाओं और चट्टानों को देखा। साथी यात्रियों से पूछने पर पता लगा कि यह भीमबेटका (भीम बैठका) नामक क्षेत्र है तथा यहां गुफा की दीवारों पर कुछ चित्र बने हैं, लेकिन लोग जंगली पशुओं के भय से वहां नहीं जाते।
हरिभाऊ की आंखों में यह सुनकर चमक आ गयी। रेल जब धीमी हुई, तो वह चलती गाड़ी से कूद गये और कई घंटे की चढ़ाई चढ़कर उन पहाडि़यों पर जा पहुंचे। इस उन्होंने पहली बार इन चित्रों से संसार का परिचय कराया। इस खोज से उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

समाजिक क्षेत्र में भी थे सक्रिय
संघ के स्वयंसेवक होने के नाते वह सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय थे। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, म.प्र. के अध्यक्ष रहे। विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के बाद 1966 में प्रयाग में जब प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन हुआ, तो श्री एकनाथ रानाडे ने उन्हें वहां  भेजा। इसके बाद हरिभाऊ देश के अनेक हिस्सों में गए। उन्होंने वहां भारतीय संस्कृति, कला, इतिहास और ज्ञान-विज्ञान आदि पर व्याख्यान दिये। 1981 में ‘संस्कार भारती’ की स्थापना होने पर उन्हें उसका महामंत्री बनाया गया।
 
पाषाणकालीन मनुष्यों के जीवन को दर्शाती हैं गुफाएं



हरिभाऊ द्वारा खोजी गई इन गुफाओं में बनी चित्रकृतियां पाषाणकालीन मनुष्यों के जीवन को दर्शाती हैं। यहां करीब 500 गुफाएं हैं। भीमबैटका गुफाओं में अधिकांश तस्वीरें लाल और सफेद रंग से तैयार की गई हैं। कहीं-कहीं पीले और हरे रंग के बिंदुओं को भी प्रयोग किया गया है। गुफाओं में वन्यप्राणियों के शिकार दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र उकेरे गए हैं।
शिलाओं पर लिखीं हैं महत्वपूर्ण जानकारियां
 
कुछ इस तरह है चित्रों के विषय

 
यहां 750 शैलाश्रय हैं जिनमें 500 शैलाश्रय चित्रों द्वारा सज्जित हैं। पूर्व पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा। यह बहुमूल्य धरोहर अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। भीमबैटका क्षेत्र में प्रवेश करते हुए शिलाओं पर लिखी कई जानकारियां मिलती हैं। यहां के शैल चित्रों के विषय मुख्यतया सामूहिक नृत्य, रेखांकित मानवाकृति, शिकार, पशु-पक्षी, युद्ध और प्राचीन मानव जीवन के दैनिक क्रियाकलापों से जुड़े हैं। चित्रों में प्रयोग किए गए खनिज रंगों में मुख्य रूप से गेरुआ, लाल और सफेद हैं और कहीं-कहीं पीला और हरा रंग भी प्रयोग हुआ है। यहां की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे। इस प्रकार भीम बैठका के प्राचीन मानव के संज्ञानात्मक विकास का कालक्रम विश्व के अन्य प्राचीन समानांतर स्थलों से हजारों वर्ष पूर्व हुआ था। इस प्रकार से यह स्थल मानव विकास का आरंभिक स्थान भी माना जाता है।