मनोबल ऊंचा हो तो कठिन से कठिन कार्य भी हो जाता है संभव
   दिनांक 04-मई-2018

 
एक बार की बात है गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ विहार करते हुए शाल्यवन में एक वटवृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्म चर्चा शुरू हुई और उसी क्रम में एक भिक्षु ने उनसे प्रश्न किया "भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मात देते हुए बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधन सम्पन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसकाक्या कारण हैं? क्या पूर्वजन्मों के कर्म अवरोध बनकर खड़े हो जाते हैं?"

‘नहीं’ बुद्ध उन्हें समझाने के लिए एक प्रेरक कथा सुनाने लगे। भगवान बुद्ध ने कहा, “विराट् नगर के राजासुकीर्ति के पास लौहशांग नामक एक हाथी था। राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी। शैशव से ही लौहशांग को इस तरह प्रशिक्षित किया था कि वह युद्ध कला में बड़ा प्रवीण हो गया था। सेना के आगे चलते हुए पर्वताकार लौहशांग जब प्रचण्ड हुंकार भरता हुआ शत्रु सेनाओं में प्रवेश करता था तो विपक्षियों के पांव उखड़ जाते थे।

धीरे-धीरे समय से साथ जिस तरह जन्म के बाद सभी प्राणियों को युवा और जरावस्था से गुजरना पड़ता है, उसी क्रम से लौहशांग भी वृद्ध होने लगा, उसकी चमड़ी झूल गई और युवावस्था वाला पराक्रम जाता रहा। अब वह हाथीशाला की शोभा मात्र बनकर रह गया. उपयोगिता और महत्व कम हो जाने के कारण उसकी ओर पहले जैसा ध्यान भी नहीं दिया जा रहा था। उसे मिलने वाले भोजन में कमी कर दी गई। एक बूढ़ा सेवक उसके भोजन पानी की व्यवस्था करता, वह भी कई बार चूक कर जाता और हाथी को भूखा प्यासा ही रहना पड़ता।

बहुत प्यासा होने और कई दिनों से पानी न मिलने के कारण एक बार लौहशांग हाथी शाला से निकल कर पुराने तालाब की ओर चल पड़ा, जहां उसे पहले कभी प्रायः ले जाया करता था. उसने भरपेट पानी पीकर प्यास बुझाई और गहरे जल में स्नान के लिए चल पड़ा। उस तालाब में कीचड़ बहुत था दुर्भाग्य से वृद्ध हाथी उसमें फंस गया। जितना भी वह निकलने का प्रयास करता उतना ही फंसता जाता और आखिर गर्दन तक कीचड़ में फंस गया.

यह समाचार राजा सुकीर्ति तक पहुँचा, तो वे बड़े दुःखी हुए। हाथी को निकलवाने के बहुत से प्रयास किए गए पर वह सफल नहीं हुए। उसे इस दयनीय दुर्दशा के साथ मृत्यु मुख में जाते देखकर सभी दुखी हो गए। जब सारे प्रयास असफल हो गये, तब एक चतुर मंत्री ने युक्ति सुझाई। इसके अनुसार हाथी को निकलवाने वाले सभी प्रयत्न करने वालों को वापस बुलाया गया और उन्हें युद्ध सैनिकों की वेशभूषा पहनाई गई। युद्ध में बजने वाली रणभेरियां मंगवाई गई।

हाथी के सामने युद्ध के समय बजने वाले नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे जैसे वे शत्रुपक्ष की ओर से लौहशांग की ओर बढ़ रहे हैं। यह दृश्य देखकर लौहशांग ने पूरी ताकत से चिंघाड़ लगाई और शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए पूरी शक्ति लगाकर बाहर निकल आया। वह दौड़ा और कीचड़ को रौंदता हुआ तालाब के तट पर जा पहुंचा। उसे बड़ी मुश्किल से नियंत्रित किया गया।
यह कथा सुनाकर तथागत ने कहा - “भिक्षुओं! संसार में मनोबल ही प्रथम है। वह जाग उठे तो असहाय और विवश प्राणी भी असंभव होनेवाले काम कर दिखाते हैं तथा मनुष्य अप्रत्याशित सफलताएं प्राप्त करते हैं।