परिणाम किसी खास दिन और समय पर एक झटके में आते हैं
   दिनांक 07-मई-2018

परिणाम किसी खास दिन और समय पर एक झटके में आते हैं.. किन्तु इनके पीछे पल-पल की मेहनत और बेहिसाब अड़चनों की ऐसी अकथ कथाएं गुंथी होती हैं जिनका उस एक पल में ब्यौरा नहीं दिया जा सकता।

यह हर बार की कहानी है। हाल में संघ लोकसेवा आयोग के नतीजे भी यही मुनादी करके गए हैं। निश्चित ही कुछ दिन बात घोषित होने वाले बोर्ड परीक्षा के नतीजे भी इसका अपवाद नहीं होंगे।

तो क्या कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कोई अपवाद या चमत्कार होगा? यानी बिना मेहनत मनचाहा परिणाम, या ऐसा ही कुछ!

कर्नाटक चुनाव के नतीजे 15 मई को आने हैं। लोग भले लाख इनकार में सिर हिलाएं, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को तो ऐसा ही लगता है। पार्टी कार्यकर्ता उनकी बात से कितने सहमत होते हैं कहना कठिन है किन्तु कांग्रेस के भीतर वह बिना कुछ खास किए बड़ी भारी आशा जगाना चाहते हैं।हालांकि, जनता के मन का हाल जानना कठिन है किन्तु राजनेता के कदम बता देते हैं कि किस चाल से कौन से फासले कितने समय में तय किए जा सकते हैं। जब राहुल बीच चुनाव में यह कहते हैं कि चुनाव के बाद उन्हें 15 दिन का अवकाश चाहिए! या फिर वे अगली छुट्टियां कहां बिताएंगे तो इसे कैसे देखना चाहिए!

जवाब में एक और प्रश्न है ,यदि बोर्ड परीक्षा के बीच किसी छात्र को प्रश्नपत्र और मेहनत की बजाय नानी के गांव में अमरूद के बगीचे और आम का बौर याद आता हो तो उसे कैसे देखना चाहिए!

बहरहाल, नतीजे जो होंगे सो होंगे।

आज स्थिति यह है कि - भले ही कांग्रेस चुनाव को उत्तर बनाम दक्षिण का रंग देने के लिए जोर लगा रही है किन्तु दक्षिण में भाजपा कैसे-क्यों जगह बना सकती है -इस तरह के सारे प्रश्न स्थानीय स्तर पर अपना वजन खो रहे हैं। (इसमें भी कर्नाटक इसलिए विशेष है क्योंकि यहां पहले भी जनता भाजपा की सरकार बना चुकी है)

फिलहाल, भारतीय जनता पार्टी की जमीनी मेहनत और कांग्रेसी युवराज के कच्चेपन के ताजा किस्से कर्नाटक में एकबार फिर लोगों की जुबान पर हैं।

-केंद्र के अतिरिक्त 20 राज्यों में सत्तासीन भाजपा अध्यक्ष दिल्ली के शक्ति की हनक भरे गलियारे छोड़कर धूल-धूप में हर बूथ प्रमुख तक पहुंचे और इस जमीनी संपर्क ने पार्टी का आत्मविश्वास चमका दिया।

-कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एकाएक कर्नाटक पहुंचे और फिर 'मोदी' को ललकारते हुए ताल ठोक दी और घबराहट से भरी पार्टी में गहरी थरथराहट भर दी।

अब जो होना है वो हो, राहुल की बला से!
यह हल्के में कही गई बात नहीं है। सच यही है कि भाजपा की (असम के अजेय समझे जाने वाले किले से त्रिपुरा के दुर्भेद लाल गढ़ तक) हिमालयी सफलताओं के बरक्स कांग्रेसी किरकिरी का एक राहुल गांधी मॉडल भी साथ-साथ विकसित हुआ है। यह विफलताओं का ऐसा पहाड़ है जिसके लिए कांग्रेस और प्रगतिशील धड़ों द्वारा लगातार कहा जाता रहा कि बस एक नतीजे की बात है और फिर यह पूरा का पूरा 'पर्वत' आसमान में फुर्र हो जाएगा...कांग्रेस और इसकी लामबंदियों के लिए रास्ता बन जाएगा। ख्याल अच्छा है मगर ख्याल ही है क्योंकि भाजपा विरोधियों द्वारा हर प्रतिकूल परिणाम के बाद न केवल अहम सबक भुला दिए गए बल्कि उनकी राजनीति का स्वर ज्यादा कसैला और समाज विभाजक होता गया। (कर्नाटक में 'लिंगायत विवाद' इसकी बानगी कहा जा सकता है जो गुजरात में हिंदुओं को बांटने वाली राजनीति का ही एक और प्रयोग है)

किन्तु राजनीति की इन मौकापरस्त उलटबांसियों को जनता समझ चुकी है और अब इसे समझते हुए ही वह अपना उत्तर दर्ज भी करा रही है । कर्नाटक में लोग पूछ रहे हैं कि क्या कारण है कि चाहे बात अचकन पर उल्टा जनेऊ चढ़ाने की हो या मंदिरों में ताबड़तोड़ माथा टिकाने की, कांग्रेस का हिन्दू प्रेम सिर्फ चुनाव के समय और सिर्फ एक खास भौगोलिक क्षेत्र और मतदाताओं को दिखाते हुए परिलक्षित होता है? सवाल उचित है! पार्टी में यदि वास्तव में कहीं हिन्दू विचार के प्रति अंशमात्र भी सदशयता (झुकाव नहीं) है तो कन्वर्जन की बड़ी समस्या या गौरक्षा के संवैधानिक दायित्व/संकेत से पार्टी सदा मुंह चुराती क्यों दिखती है?

इस दोमुंहे बर्ताव को भाजपा की लक्ष्यसिद्ध एकनेत्री दृष्टि और एकात्म मानव दर्शन पर टिकी नीतियों पर लगातार समर्पित भाव से किये जा रहे काम से देशभर में सीधी चुनौती मिली है। आज दक्षिण में भी भाजपा की 'धमक' का यह कमाल एकाएक नहीं हुआ। भाजपा, इसके समर्थक और कार्यकताओं की मेहनत की छेनी (इस राज्य और इसके बाहर भी) लंबे समय से लगातार चलती रही है। सत्ता के भीतर या बाहर, किन्तु सदा समाज और इसके मुद्दों के करीब। भाजपा के कदम रोकने वाली आशंकाओं के भारी-भरकम पहाड़ों को को हौले-हौले, एक-एककर इसी वैचारिकता और समाज के भारतीय भाव को तराशने वाली छेनी ने ही तो काटा है!

हर परीक्षा में भाजपा को सफलता मिली तो इसके पीछे श्रम की पराकाष्ठा थी, विफलता मिली तो सबक की पूंजी थी। यह सीखने की ललक है कि उसके हाथ कभी खाली नहीं थे, भाजपा इसी तरह बढ़ी है।

जाहिर है गलतियों से सबक न सीखते हुए ज्यादा बड़ी गलतियां होती हैं। ऐसे में उसे क्या कहिए जो गलती को मानने से ही इनकार कर दे!

राहुल की अगुआई में कांग्रेस के साथ कुछ ऐसा ही है।

सपनों की परख सचाई की सख्त जमीन पर होती है। जैसी बिहार में भाजपा के लिए हुई थी। झटका बड़ा था। भाजपा ने गंभीरता से इस सबक को समझा। चीजों को सुधारा। किन्तु दूसरी ओर क्या हुआ?

पांव जमा नहीं और सपनीला दम्भ अंगद से भी बड़ा हो गया?

भ्रष्टाचार पर केंद्र में पटखनी खाने वालों ने लालू से गलबहियां की तो जातीय समीकरणों की एक कामचलाऊ कश्ती बनी जरूर लेकिन भ्रष्टाचार और अकड़ के लगातार भारी होते आरोप उसे जरा दूरी पर ले डूबे।

कुछ मौके थे जहां कुछ हो सकता था, किन्तु हुआ कुछ भी नहीं।

मसलन, गुजरात -जिसके लिए राहुल गांधी द्वारा पूरा जोर लगाने पर भी भाजपा का मत प्रतिशत और बढ़ गया!

गलतियों से सबक न सीखते हुए ज्यादा बड़ी गलतियां होनी ही थीं। इक्का-दुक्का उपचुनावों में किसी राई बराबर सफलता को पहाड़ बताना और भाजपा के हिमालयी होते अस्तित्व को लगातार नकारना! भाजपा विरोधी लामबंदियों ने पिछले कुछ वर्षो में इसके अलावा किया क्या है?

समझने वाली बात यह है कि देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी की छीजन और भाजपा के लगातार बढ़ते व्याप के पीछे यदि कुछ है तो वह कड़ी मेहनत से जीता हुआ जनता का भरोसा ही है।

यह अच्छी बात है कि देश का सबसे बड़ा दल लोकतंत्र की आकांक्षाओं का अगुवा बना हुआ है।


अंत में यही कि जैसा किया उसका परिणाम आना ही है। परिणाम आते जरूर हैं और यह परीक्षार्थी का मन रखने के लिए नहीं आते।

यह बात भाजपा, कांग्रेस या किसी अन्य पर भी बराबर लागू होती है।

बहरहाल, परीक्षा के समय छुट्टी और काम के समय आम के बौर! ख्यालों की उड़ान बता रही है कि विद्यार्थी का मन परीक्षा हॉल की खिड़की से बाहर कहीं उड़ रहा है।