डालर पर अमेरिकी डर

अमेरिका अपने हितों की रक्षा की खतिर कुछ भी कर सकता है। उसने हाल ही में भारत को उन देशों की सूची में डाल दिया है, जो मुद्रा के मूल्यन में हेरा-फेरी करते हैं। दरअसल यह कदम अमेरिकी दादागिरी और धौंस का द्योतक है

अमेरिकी राजस्व विभाग ने भारत को मुद्रा के मूल्यन के मामले में हेर-फेर करने वाले संभावित देशों की सूची में रख दिया है। इसके मायने ये हैं कि अमेरिका यह सोचता है कि शायद भारत डॉलर और रुपए की विनिमय दर में जान-बूझकर हेराफेरी करता है। अमेरिका को शक है कि शायद भारत जबरदस्ती रुपए को कमजोर रखता है, जिससे अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचता है। वहीं भारत का मानना है कि अमेरिका की सोच सही नहीं है, क्योंकि चाहे रिजर्व बैंक कई मौकों पर रुपए को बेजा मजबूत होने से रोकता है, लेकिन ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि विनिमय दर में ज्यादा उथल-पुथल न हो। कई अवसरों पर ऐसा होता है कि अचानक विदेशों से संस्थागत निवेशकों अथवा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की ज्यादा प्राप्ति होने पर डॉलर की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिसके चलते रुपया मजबूत होने लगता है। ऐसे में रिजर्व बैंक हस्तक्षेप कर डॉलर खरीददारी करते हुए उसे मजबूत होने से रोकता है।

अमेरिकी चिंता का कारण

 

अमेरिकी राजस्व विभाग की यह सोच है कि जब रुपया कमजोर होगा यानी डॉलर रुपए के मुकाबले मजबूत हो जाएगा तो अमेरिका की व्यापार प्रतिस्पर्धा शक्ति कम हो जाएगी, जिसके चलते अमेरिका से निर्यात कम हो जाएगा और आयात बढ़ जाएगा। गौरतलब है कि अमेरिका का चीन से ही नहीं, बल्कि भारत के साथ भी भारी व्यापार घाटा है। ट्रंप प्रशासन यह नहीं चाहता कि यह व्यापार घाटा और बढ़े, क्योंकि अमेरिका की वर्तमान सरकार का मानना है कि अमेरिका में आयात घटेंगा और निर्यात बढ़ेगा तो ही वहां रोजगार के अवसर जुटेंगे और जीडीपी भी बढ़ेगी।

आखिर क्या है सचाई?

 

दरअसल अमेरिका तीन आधार पर किसी देश को इस प्रकार की निगरानी सूची में रखता है। पहला आधार यह है कि उस देश के साथ अमेरिका का बड़ा व्यापार घाटा हो। दूसरे, उस देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जीडीपी के दो प्रतिशत से ज्यादा विदेशी करेंसी खरीदी जाती हो। और तीसरे, उस देश का चालू खाते पर भुगतान शेष का अतिरेक (सरप्लस) जीडीपी के तीन प्रतिशत से अधिक हो। इन तीन मापदंडों में से पहले दो मापदंड अमेरिकी सरकार को भारत को निगरानी सूची पर रखने के लिए प्रेरित करते हैं, क्योंकि अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा 23 अरब डॉलर है (जो अमेरिकी मापदंड 20 अरब डॉलर से ज्यादा है)। दूसरे, रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा की खरीद जीडीपी का 2़.2 प्रतिशत है, जबकि अमेरिकी मापदंड दो प्रतिशत की इजाजत देता है। लेकिन तीसरा मापदंड भारत पर लागू नहीं होता, क्योंकि भारत का भुगतान शेष सरप्लस में नहीं, बल्कि घाटे में है।

भारत और मौद्रिक जोड़तोड़

 

हो सकता है कि चीन सरीखे देश जान-बूझकर अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर अपने निर्यात को बढ़ाने और आयात को कम करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। यह भी कारण है कि चीन के साथ अमेरिका का भारी व्यापार घाटा है (375 अरब डॉलर), जबकि भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा मात्र 23 अरब डॉलर ही है। आज भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश प्राप्त हो रहा है, जिसका मुद्रा के मूल्यन से कोई सीधा संबंध नहीं है। स्वाभाविक है कि इन प्राप्तियों को यदि बाजार में खुला छोड़ दिया जाए तो उसके कारण रुपया बहुत मजबूत हो जाएगा। लेकिन यह मजबूती लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती, क्योंकि भारत का व्यापार घाटा बहुत अधिक है। वर्ष 2017-18 में यह घाटा लगभग 157 अरब डॉलर रहा। इसके अलावा भारत पर भारी मात्रा में विदेशी कर्ज भी है, इसलिए जरूरी है कि भारत सरकार रिजर्व बैंक के माध्यम से अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखे, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर उससे निकासी की जा सके। यही कारण है कि अप्रैल, 2018 के दूसरे सप्ताह की समाप्ति तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 425 अरब डॉलर तक पहुंच गया था।

जानकारों का मानना है कि अमेरिका का भारत को मुद्रा की हेराफेरी करने वाले देशों की संभावित सूची में शामिल करना इसलिए भी गलत है कि भारत का विदेशी भुगतान घाटा अन्य मुल्कों से कहीं ज्यादा है। गौरतलब है कि अमेरिका ने चीन को भी इस प्रकार की निगरानी सूची में रखा है। कई कारणों से ऐसा माना जाता है कि चीन वास्तव में मौद्रिक जोड़तोड़ करने वाला है और उसका अमेरिका के साथ भारी व्यापार घाटा भी है। और यही नहीं, अमेरिका के मापदंडों के हिसाब से किसी मुल्क को ऐसी निगरानी सूची में रखने का तीसरा कारण (जो भारत के मामले में लागू नहीं है) है उस देश का भुगतान शेष सरप्लस उसकी जीडीपी के तीन प्रतिशत से ज्यादा है, भी लागू होता है। इसलिए भारत और चीन दोनों को इस प्रकार की निगरानी सूची में रखने के बाद इस बात की संभावनाएं बहुत कम हैं कि अमेरिका भारत को अंततोगत्वा मुद्रा मूल्यन में हेराफेरी करने वाले मुल्कों की श्रेणी में रखेगा। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के मद्देनजर इस बात की संभावनाएं ज्यादा हैं कि अमेरिका चीन को सबसे पहले ऐसी सूची में रखना चाहेगा।

जानकारों का मानना है कि अमेरिका का भारत को मुद्रा की हेराफेरी करने वाले देशों की संभावित सूची में शामिल करना इसलिए भी गलत है कि भारत का विदेशी भुगतान घाटा अन्य मुल्कों से कहीं ज्यादा है। गौरतलब है कि अमेरिका ने चीन को भी इस प्रकार की निगरानी सूची में रखा है। कई कारणों से ऐसा माना जाता है कि चीन वास्तव में मौद्रिक जोड़तोड़ करने वाला है और उसका अमेरिका के साथ भारी व्यापार घाटा भी है। और यही नहीं, अमेरिका के मापदंडों के हिसाब से किसी मुल्क को ऐसी निगरानी सूची में रखने का तीसरा कारण (जो भारत के मामले में लागू नहीं है) है उस देश का भुगतान शेष सरप्लस उसकी जीडीपी के तीन प्रतिशत से ज्यादा है, भी लागू होता है। इसलिए भारत और चीन दोनों को इस प्रकार की निगरानी सूची में रखने के बाद इस बात की संभावनाएं बहुत कम हैं कि अमेरिका भारत को अंततोगत्वा मुद्रा मूल्यन में हेराफेरी करने वाले मुल्कों की श्रेणी में रखेगा। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के मद्देनजर इस बात की संभावनाएं ज्यादा हैं कि अमेरिका चीन को सबसे पहले ऐसी सूची में रखना चाहेगा।

खोजने होंगे नए उपाए

 

रिजर्व बैंक की तमाम कार्रवाइयों के बावजूद भारतीय रुपए में भारी उठापटक देखने को मिल रही है। इसका कारण यह है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों के द्वारा निवेश में स्थिरता बिल्कुल नहीं है। कभी वे भारी मात्रा में उसे लाते हैं, तो कभी भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा वापस ले जाते हैं। जब विदेशी मुद्रा भारत में आती है तब उससे रुपया थोड़ा मजबूत होने लगता है तो येन-केन-प्रकारेण रिजर्व बैंक उसे खरीदकर रुपए के मूल्य को बढ़ने से रोकता है। लेकिन जब विदेशी संस्थागत निवेशक पैसा वापस ले जाते हैं तो रिजर्व बैंक द्वारा उस प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होता, जिसके कारण रुपया कमजोर हो जाता है। वास्तव में रुपए के मूल्यन में भारी उठापटक का ज्यादा लाभ देश को नहीं, बल्कि सट्टेबाजों को मिलता है। इसे रोकने की जरूरत है। लंबे समय से इन प्रवृत्तियों से यह निष्कर्ष निकलता है कि सरकार को विदेशी संस्थागत निवेशकों पर अंकुश लगाने की भी जरूरत है। इन निवेशकों द्वारा लाभ कमाकर उसे बाहर ले जाने को रोकने के लिए कर की व्यवस्था की जा सकती है। इस कर को अर्थशास्त्र की भाषा में ‘टोबिन टैक्स’ कहा जाता है। इसके अलावा इन निवेशकों पर एक न्यूनतम समय सीमा (यानी ‘लॉक-इन पीरियड’) भी लागू की जा सकती है। यही नहीं, रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा का एक विशेष ‘बफर स्टॉक’ भी बना सकता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा राशि लाने पर उसे उस ‘बफर स्टॉक’ में डाला जा सकता है, ताकि रुपए का मूल्य न बढ़े और जब विदेशी संस्थागत निवेशक उस राशि को बाहर ले जाना चाहें तो उसकी निकासी उसी ‘बफर स्टॉक’ से की जाए। ऐसे में रुपए के मूल्य में बिना वजह होने वाली उठापटक रुकेगी। (लेखक पीजीडीएवी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)