अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करना होगा अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करना होगा
अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करना होगा
   दिनांक 07-मई-2018
इन दिनों हर तरफ पेट्रो उत्पादों के बढ़ते दामों की चर्चा है। विशेषज्ञों के अनुसार कई प्रकार के करों के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं, वही सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण दाम बढ़ रहे हैं। बढ़ती कीमतों के पीछे की सचाई जानने के लिए पाञ्चजन्य संवाददाता अरुण कुमार सिंह ने केन्द्रीय तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश

पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार तेजी बनी हुई है। क्या कारण हैं?
 
भारत अपनी खपत का 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। इसलिए जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में उतार-चढ़ाव होता है तो उसका असर भारत पर पड़ता है। इस समय कई अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के चलते तेल के दाम बढ़ रहे हैं। पहली घटना है तेल उत्पादक देशों के संगठन ‘ओपेक’ ने तेल उत्पादन में कटौती कर दी है। ओपेक के अलावा रूस, वेनेजुएला जैसे देश भी तेल का उत्पादन करते हैं। इन दोनों देशों ने भी भारी कटौती की है। वेनेजुएला तो अपने तेल इतिहास के 30 वर्ष के काल में सबसे कम तेल उत्पादन कर रहा है। तेल के दाम कम होने से इन देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा था। इसलिए इन्होंने उत्पादन में कटौती की है। इससे कच्चे तेल की आपूर्ति तो कम हो गई, पर मांग तो वही रही। इसलिए दाम बढ़े। सीरिया संकट की वजह से भी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अनिश्चितता का माहौल है। ईरान और अमेरिका के बीच मौजूद तनाव के कारण भी तेल के दाम बढ़ रहे हैं। भारत सरकार इन सब पर नजर रखे हुए है।

“यह सच है कि तेल पर लगभग 40 प्रतिशत कर है, लेकिन यह बिल्कुल पारदर्शी है। तेल के जरिए जो आय होती है उसी से केंद्र और राज्य सरकारों के खर्चे चलते हैं। केंद्र सरकार अपनी आय का 42 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को ही लौटा देती है। इसके साथ ही राज्यों में केंद्र की जो योजनाएं चलती हैं उनके खर्चे का 60 प्रतिशत हिस्सा भी भारत सरकार देती है।“
लेकिन आम आदमी तो मान रहा है कि सरकार द्वारा लगाए गए करों की वजह से तेल के दाम बढ़ रहे हैं?
 
आम आदमी का हित हमारे लिए सर्वोपरि है, साथ ही आर्थिक सुप्रबंधन होना भी जरूरी है। यह बात सच है कि तेल पर लगभग 40 प्रतिशत कर है, लेकिन यह बिल्कुल पारदर्शी है। तेल के जरिए जो आय होती है, उसी से केंद्र और राज्य सरकारों के खर्चे चलते हैं। केंद्र सरकार अपनी आय का 42 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को ही लौटा देती है। इसके साथ ही राज्यों में केंद्र की जो योजनाएं चलती हैं उनके खर्चे का 60 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार देती है। यानी भारत सरकार अपनी आय का 60-70 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को ही दे देती है। बाकी पैसे से भारत सरकार की योजनाएं चलती हैं। भारत सरकार और राज्य सरकारें भी कर के जरिए आए पैसे से ही कामगारों को वेतन देती हैं।

“पिछले चार साल में 10 करोड़ नए एलपीजी ग्राहक बने हैं। उल्लेखनीय है कि देश में 1955 में एलपीजी की सेवा शुरू हो गई थी। 1955 से 2014 तक यानी 59 साल में केवल 13 करोड़ एलपीजी ग्राहक बन पाए थे। लेकिन 2014 से अब तक यानी चार साल में 10 करोड़ परिवारों को एलपीजी की सुविधा दी गई”

इन सबके बावजूद भारत सरकार अपने उपभोक्ताओं की चिंता करती है। इसलिए हमने कहा था कि पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में क्यों न लाया जाए? पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में लाने के लिए ‘जीएसटी काउंसिल’ की सहमति की जरूरत है। हां, राज्य सरकारें अपनी आय के स्रोतों को लेकर थोड़ी चिन्तित हैं। मामला सुलझ रहा है। हो सकता है, आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में लाया जाएगा, जिसका फायदा उपभोक्ताओं को होगा।
जब कच्चे तेल की कीमत कम होती है उस समय भी ग्राहकों को कोई फायदा नहीं होता। इसके क्या कारण हैं?
 
ऐसा नहीं है। जब दाम घटता है तो ग्राहकों को लाभ मिलता है। यह बात सही है कि हमने कुछ पैसा बचाया। जो पैसा बचा है, वह गांवों और गरीबों के लिए खर्च हो रहा है। उसी बचे पैसे से ‘प्रधानमंत्री ग्राम उज्ज्वला योजना’ चल रही है। इस योजना पर अब तक 12,500 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इस योजना से गांवों में स्वच्छ र्इंधन पहुंच रहा है। आज देश में सड़कें बनाने का काम बहुत तेजी से हो रहा है। वह पैसा कहां से आ रहा है? किसानों के लिए ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ चल रही है। इससे किसानों को मदद मिलती है। वह पैसा कहां से आया? स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘आयुष्मान भारत योजना’ शुरू हो गई है। यानी जो पैसा बच रहा है उसका इस्तेमाल ढांचागत सुविधाओं के विकास में हो रहा है।
भारत अपनी खपत का 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। इसकी मात्रा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। क्या इसका कोई वैकल्पिक रास्ता ढूंढा जा रहा है?
 
प्रधानमंत्री जी ने तीन साल पहले हमारे विभाग को एक लक्ष्य दिया था। जब देश अपनी आजादी का 75वां साल मनाएगा तब ऊर्जा क्षेत्र में हमारी दूसरों पर निर्भरता आज की आवश्यकता से कम से कम 10 प्रतिशत कम हो। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के अनेक रास्ते हैं। जैसे- घरेलू उत्पादन बढ़ाना, वैकल्पिक र्इंधन ढूंढना, संरक्षण करना आदि। इन बिंदुओं पर काम हो रहा है। हमने ऊर्जा नीति में बदलाव किया है। इस कारण उत्पादन बढ़ रहा है। यही नहीं, इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश भारत में हो रहा है। हमारी सरकार के आने के समय प्रति यूनिट सौर ऊर्जा की कीमत 16 रुपए थी, जो आज ढाई-तीन रुपए तक आ गई है। हमारी नीतियों, नीयत और निर्णय के कारण उत्पादन बढ़ रहा है। केवल सौर ऊर्जा ही नहीं, जैव ऊर्जा पर भी काम हो रहा है। सबसे ज्यादा काम वैकल्पिक ऊर्जा पर हो रहा है।
वर्तमान सरकार ने तेल कुओं को लेकर कई देशों से करार किए हैं। इन करारों के बारे में बताएं ?
 
हमारी सरकार से पहले भी इस तरह के करार होते थे। भारत तेल कुओं में निवेश भी करता था, लेकिन पहले और अब में बहुत फर्क है। पहले नए तेल कुओं में भारत को निवेश करने का मौका मिलता था। अब माहौल बदल गया है। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से विदेशों में भारत की एक अलग छवि बनी है। इस कारण आज विश्व के बड़े-बड़े तेल उत्पादक देश हमें पूर्ण रूप से विकसित तेल कुओं में निवेश करने का अवसर दे रहे हैं। दुबई, अबू धाबी, रूस जैसों देशों में हमें तेल कुओं की हिस्सेदारी मिली है। यह भारत की नई पहचान है। इसका लाभ हमें पहले दिन से ही मिल रहा है।
भारत अभी किन-किन देशों से तेल का आयात करता है?
 
इन दिनों सऊदी अरब, इराक, ईरान, यूएई, अमेरिका, नाइजीरिया, वेनेजुएला, कोलंबिया आदि देशों से भारत तेल का आयात कर रहा है। इनमें सबसे अधिक सऊदी अरब से आयात होता है।
हर वर्ष कितने रुपए का तेल आयात होता है?
 
समय के अनुसार इसमें ज्यादा-कम होता रहता है। जब हम लोग सरकार में आए थे उस समय लगभग 9 लाख करोड़ रुपए का तेल आयात होता था। बीच में यह घटकर 4 लाख करोड़ रुपए तक आ गया था। इन दिनों लगभग 6 लाख करोड़ रुपए का तेल आयात हो रहा है।
हाल ही में नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा फोरम की बैठक में चीन और भारत ने एक समझौता किया है। इससे देश को क्या लाभ होने वाला है?
 
भारत तेल खपत करने वाला एक बड़ा देश है। हमारी तेल की खरीदारी से कई देशों की अर्थव्यवस्था चलती है। तेल उत्पादक देशों के लिए भारत एक बड़ा और स्थायी ग्राहक है। बड़े ग्राहक को तो हर दुकानदार कुछ न कुछ छूट देता है। इसलिए भारत चाहता है कि एक बड़े ग्राहक के नाते उसे तेल के दाम में छूट मिले। हमारी सरकार के आने के बाद से ही भारत यह मांग करता आ रहा है। आज एशिया में भारत के अलावा चीन, जापान और दक्षिण कोरिया तेल की ज्यादा खपत करते हैं। इस समझौते के बाद भारत और चीन मिलकर तेल उत्पादक देशों से छूट देने की मांग करेंगे। इसका लाभ दोनों देशों को होगा। तेल की कीमतें क्षेत्र को देखते हुए भी तय होती हैं। अमेरिका के लिए अलग, यूरोप के लिए अलग, एशिया के लिए अलग मूल्य वसूले जाते हैं। ओपेक ‘एशियन प्रीमियम’ के नाम पर एशियाई देशों से अधिक कीमत वसूल करता है। भारत कहता है कि अब ऐसा नहीं चलेगा, हमें छूट दो, हम बड़े ग्राहक हैं, ‘एशियन प्रीमियम’ खत्म करो। अपनी मांग को वजन देने के लिए ही भारत ने चीन से समझौता किया है।
इस सरकार के आने से पहले बहुत सारे तेलशोधक संयंत्र बंद थे। क्या वे शुरू हुए और कुछ नए लगे क्या?
 
हमारी सरकार के आने से पहले तक देश में तेल शोधन लगभग 220-25 मिलियन मीट्रिक टन तक था। वह बढ़कर आज 240-50 मिलियन मीट्रिक टन तक जा रहा है। आने वाले 5-10 साल के अंदर और 120 मिलियन मिट्रिक टन तक तेल का शोधन किया जाएगा। इसके लिए नए कारखाने लगाए जाएंगे। कई जगह काम भी शुरू हो गया है। राजस्थान तेल शोधन संयंत्र ने काम करना शुरू कर दिया है। इस पर लगभग 40-45,000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। महाराष्टÑ में बन रहा रत्नागिरि तेलशोधक कारखाना दुनिया के बड़े कारखानों में से एक होगा। यहां 60 मिलियन मीट्रिक टन तेल का शोधन होगा। मथुरा, पानीपत, मुंबई, वडोदरा, बरौनी, असम-इन सभी तेल रिफाइनरियों की क्षमता बढ़ गई है।
उज्ज्वला योजना से अब तक कितने परिवार लाभान्वित हुए हैं?
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की शुरुआत 1 मई, 2016 को की थी। केवल दो साल में ही 3 करोड़ 60 लाख परिवार इससे लाभान्वित हुए हैं। इसके अंतर्गत एक चूल्हा, एक सिलिंडर, पाईप लाइन और रेगुलेटर दिया जाता है। प्रधानमंत्री जी का सपना है भारत को ऊर्जा न्याय देना। सामान्य लोगों की जिंदगी में ऊर्जा ही बदलाव ला सकती है। ऊर्जा सामाजिक परिवर्तन की द्योतक है। भोजन बनाते हुए धुएं से हर वर्ष लगभग 5,00,000 महिलाओं की जान चली जाती है। एक घंटे तक धुएं में रहने का मतलब है 400 सिगरेट फूंक देना। अनजाने में घर की मां-बहनें-बुजुर्ग उसको झेल रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छ और सस्ता र्इंधन घर-घर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। उसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उज्ज्वला योजना शुरू की गई है।
प्रधानमंत्री के आह्वान पर अब तक कितने लोगों ने गैस सब्सिडी छोड़ी है?
 
लगभग 1 करोड़ 20 लाख लोगों ने सब्सिडी छोड़ी है। इससे जो पैसा बचता है, वह गांव-गांव तक गैस पहुंचाने में काम आ रहा है।
 
आपने अपने कार्यकाल में कितने गैस कनेक्शन बांटे?
 
2014 में जब हम लोग सरकार में आए थे, उस समय देश में 27 करोड़ घर थे और उनमें से 13 करोड़ घरों में एलपीजी गैस थी। पिछले चार साल में 10 करोड़ नए एलपीजी ग्राहक बने हैं। उल्लेखनीय है कि देश में 1955 में एलपीजी की सेवा शुरू हो गई थी। 1955 से 2014 तक यानी 59 साल में केवल 13 करोड़ एलपीजी ग्राहक बन पाए थे। लेकिन 2014 से अब तक यानी चार साल में 10 करोड़ परिवारों को एलपीजी की सुविधा दी गई।
 
सिलेंडर से गैस चोरी होने की बड़ी शिकायतें आती हैं। 15 किलो वाले सिलेंडर में 11 किलो भी गैस नहीं होती। इसे रोकने के लिए आपने कोई उपाय किया है?
 
देखिए, इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। एक उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना राज्य सरकार का काम है।
 
पाईप लाइन के जरिए अब तक कितने शहरों में गैस की आपूर्ति हो रही है?
 
2014 तक देश के 50-60 जिलों तक ही पाईप से गैस की आपूर्ति होती थी। आज ऐसे जिलों की संख्या दोगुनी होकर लगभग 110-115 हो गई है। एक योजना पर जल्दी ही काम शुरू होने वाला है। इसके अंतर्गत लगभग 180 क्लस्टर और 300 जिलों में यानी लगभग आधे भारत में पाईप लाइन के सहारे गैस पहुंचाने का काम किया जाएगा।