भविष्य में हमारा स्वप्न आइआइटी गुरुकुल का है
   दिनांक 07-मई-2018
 
भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री मुकुल कानिटकर कहते हैं,‘‘विराट गुरुकुल सम्मेलन का उद्देश्य देश में गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पुनर्स्थापित करके उसे युगानुकूल बनाना है। ऐसे में यहां से निकलने वाले बच्चे विविध क्षेत्रों में न केवल देश-समाज को उच्च शिखर पर ले जाएंगे बल्कि जो सोच नहीं सकते, वह करके दिखाएंगे।’’ पाञ्चजन्य संवाददाता अश्वनी मिश्र ने उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान में उनसे गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न विषयों पर लंबी बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश -
 
अंतराष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
 
सम्मेलन के उद्देश्य को तीन भागों में बताया जा सकता है। पहला, प्राचीन गुरुकुल परंपरा को बनाये रखने का संघर्ष बहुत सारे लोग कर रहे हैं, जिसके चलते देशभर में अभी चार हजार से अधिक गुरुकुल हैं। यह सभी लोग बड़े संघर्ष के साथ इन्हें चला रहे हैं। इसके बाद भी उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं है। इसलिए हमारा पहला उद्देश्य है कि सभी संगठित हों। दूसरा, उनका आत्मबल विकसित हो ताकि वे इस काम को और आत्मविश्वास के साथ करें। उनको लगना चाहिए कि हम जो काम कर रहे हैं वह अकेले नहीं बल्कि बहुत सारे लोग कर रहे हैं और उसकी समाज में प्रतिष्ठा है। तीसरा, समाज के अंदर गुरुकुल शिक्षा को युगानुकूल शिक्षा की तर्ज पर ‘ब्रांड’ बनाना। क्योंकि आज समाज ‘ब्रांड’ की ओर ज्यादा आकर्षित होता है। इसलिए इस तरह के बड़े आयोजन से समाज का ध्यान आकर्षित होता है। क्योंकि इसमें बड़े बुद्धिजीवी, ख्याति प्राप्त विद्वान आते हैं जो समाज को संस्कृति-परंपरा को पुनर्स्थापित करने की राह दिखाते हैं। इससे समाज का ध्यान इस ओर आता है।
सम्मेलन में कितने गुरुकुल एवं विदेश के प्रतिनिधियों की सहभागिता रही?
 
इस सम्मेलन में लगभग 800 से अधिक गुरुकुल और उनके प्रतिनिधि एकत्रित हुए। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो 3500 लोग यहां पर आए जिसमें 6-7 सौ ऐसे थे, जो सीधे तौर से गुरुकुल से नहीं जुड़े थे लेकिन आधुनिक शिक्षा या भारतीय शिक्षण मंडल के कार्यकर्ता हैं। दूसरी बात विदेश के गुरुकुलों और प्रतिनिधियों की तो नेपाल से श्रीराम अधिकारी सहित 95 प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में सहभागिता की। इसके अलावा भूटान, म्यांमार,थाईलैंड,जापान, दुबई, कनाडा, सिंगापुर से भी लोग आए। इसमें कुछ गुरुकुल नहीं चलाते लेकिन वे अपने देश में गुरुकुल चलाना चाहते हैं। कुल मिलाकर दस देशों के लोगों की सहभागिता रही है।
आप भारत के अलावा कहां-कहां गुरुकुल शिक्षा पद्धति का विस्तार होने की संभावना देखते हैं?
 
देखिए, इंडोनेशिया सरकार ने हिन्दू स्वयंसेवक संघ के संघचालक से निवेदन किया है कि हमें 15 गुरुकुल खोलना है, आप विद्वान आचार्य दीजिए। हम आने वाले समय में यहां आचार्यों की व्यवस्था करेंगे। इसके अलावा मॉरिशस, साउथ अफ्रीका, वेस्टंडीज, त्रिनिदाद से भी गुरुकुल खोलने की मांग हैं। इस सबको देखते हुए हमें पूरा विश्वास है कि अंतरराष्टÑीय विराट गुरुकुल सम्मेलन के बाद गुरुकुल शिक्षा विश्व में मुख्य शिक्षा की धारा बनेगी। जैसे योग की अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर छवि का निर्माण हुआ इसी तरह गुरुकुल शिक्षा भी पुनर्स्थापित होगी।
भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति को लेकर एक अवधारणा है कि यहां से पढ़कर बच्चा सिर्फ कर्मकांड ही करेगा। गुरुकुल शिक्षा फिर से पुर्नस्थापित हो और समाज का यह मानस बदले, इसके लिए आप क्या कर रहे हैं?
 
इसमें दो काम करने की आवश्यकता है और यह हम कर भी रहे हैं। पहला, गुरुकुलों का युगानुकूलीकरण। हमारे बच्चे संस्कृत, वेद-वेदांग का पाठन करें लेकिन इसके साथ वह कम्प्यूटर या अन्य यंत्र भी भी चला सकें। इसलिए प्रशिक्षण मंडल की प्रेरणा से जो 15-16 गुरुकुल चलते हैं, उसमें युगानुकूल पद्धति से ही पठन-पाठन होता है। अन्य गुरुकुलों में भी यह पद्धति आने लगी है। दूसरा काम करना है, वर्तमान में जो महाविद्यालयी शिक्षा है वह फैक्ट्री शिक्षा जैसी चली आ रही है, उसे बदलना। यानी सामान्य शिक्षा का गुरुकुलीकरण। हमारा उद्देश्य है कि भारत की समग्र शिक्षा ही गुरुकुल जैसी हो। जब यह होने लगेगा तो यहां से जो बच्चे निकलेंगे वह विविध क्षेत्रों में देश-समाज को उच्च शिखर पर ले जाएंगे। भविष्य में हमारा स्वप्न आइआइटी गुरुकुल का है, जो पूरा होगा।
अभिभावक गुरुकुल शिक्षा पद्धति की ओर आकर्षित हों, इसके लिए क्या विचार है आपके मन में?
 
अविभावकों के उद्बोधन के लिए दो विषय हैं, आधुनिक शिक्षा को लेकर आज समाज के मन में पीड़ा है, इसे हम सभी लोग अनुभव करते हैं। इसका परिणाम यह है कि वह अपने बच्चों के लिए शिक्षा का नया विकल्प ढूंढ रहे हैं। मेरे संपर्क में 20 हजार परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल से निकाल लिया। यह सभी अपने बच्चो को गुरुकुल भेजने को तैयार हैं। दरअसल हमारे समाज में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है कि जो जानते हैं कि यह गलत है लेकिन पड़ोसी का बच्चा उसमें पढ़ता है, इसलिए हमारा भी बच्चा उसी में पढ़ेगा। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी। इस भावना को बदलने की जरूरत है और मुझे विश्वास है कि यह परिवर्तन होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
भारत में गुरुकुल की समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन बीच के काल में इसका हृास हुआ। कारण क्या था?
 
नि:संदेह विश्वभर से लोग भारत में शिक्षा ग्रहण करने आते थे। हर वर्ग, स्त्री-पुरुष को शिक्षा मिलती थी और यह स्थिति वर्ष 1823 तक रही। 1823 में अंग्रेज अधिकारी थामस मुनरो एक सर्वेक्षण में लिखता है कि भारत सौ प्रतिशत साक्षर है और इसमें 76 प्रतिशत पूर्ण रूप से शिक्षित हैं। इसका कारण यह था कि शिक्षा सत्ता पर आधारित नहीं थी। यह समाज पोषित शिक्षा थी। इसलिए भारत में लाखों की संख्या में गुरुकुल थे, जहां अलग-अलग विद्याओं के विद्वान तैयार किए जाते थे। लेकिन मुगल आक्रांता खिलजी ने 1193 में नालंदा को जला दिया। यह वह समय था जब गुरुकुल पद्धति का हस हुआ।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय नई शिक्षा नीति पर काम कर रहा है। क्या उसमें गुरुकुल शिक्षा से जुड़े कुछ बिंदु आने की संभावना है?
 
संभावना तो पूरी है। पर गुरुकुल नाम से नहीं होंगे। हमने आधुनिक शिक्षा का ही गुरुकुलीकरण कैसे करना है, इसके बारे में सुझाव दिए हैं। दूसरी बात आज आप फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था को देखें। वह अपनी पूरी शिक्षा को गुरुकुल पर ले आए हैं। उनको पता नहीं गुरुकुल क्या है, लेकिन वह इसी तर्ज पर काम कर रहे हैं। वहां ‘क्लास रूम’ बंद हो गए, विषयवार शिक्षा बंद हो गई। अब वहां समग्र शिक्षा शुरू हो गयी। हमें विश्वास है कि जब फिनलैंड ने कर दिया तो भारत भी इस क्षेत्र में अच्छा ही करेगा।
उज्जैन श्रीकृष्ण और सुदामा की शिक्षा स्थली है। सांदीपनि आश्रम में ही उन्होंने 14 विद्याएं एवं 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। ये सब विद्याएं समाज को फिर से ज्ञानवान करें, इसके लिए आप क्या प्रयास कर रहे हैं?
 
वैसे तो हमारा प्रयास सभी विद्याओं के विद्वानों को खोजने का है। इसी क्रम में हमने अलग-अलग कला और विद्याओं के 36 आचार्य खोज निकाले हैं। यह सभी आचार्य आने वाले समय में समाज को अपने ज्ञान से लाभान्वित करेंगे।
सम्मेलन में देश-दुनिया से जो लोग आए, वह क्या संदेश और संकल्प लेकर यहां से गए?
 
तीन चीजें प्रमुख रूप से हैं। पहला व्यक्तिगत स्तर पर कि मैं क्या कर सकता हूं? मैं अपने बच्चों को भेज सकता हूं? संसाधन दे सकता हूं? मेरे पास किसी विषय का ज्ञान है तो उस विषय का आचार्य बन सकता हूंÞ? दूसरा, संस्थागत स्तर पर क्या योगदान कर सकता हूं? और तीसरा जो महत्वपूर्ण बात है वह है समाज का मानस बनाना। इस कार्य को सभी लोग कर सकते हैं। यह कार्य सबसे बड़ा कार्य होगा।
अगर कोई गुरुकुल खोलना चाहे तो शिक्षण मंडल उसमें क्या सहायता करता है?
 
हम उन्हें पूरा शैक्षिक सहयोग करेंगे। इसके अलावा आचार्य भी प्रदान करेंगे और पूर्ण रूप से शैक्षिक मार्गदर्शन देंगे।