पत्रकारीय स्वतंत्रता बनाम आत्मनियंत्रण
   दिनांक 07-मई-2018
—सही तथ्यों एवं सूचना के बजाय भारतीय मीडिया अधूरी जानकारी एवं अपरिपक्व समझ का शिकार

सामयिक मुद्दों पर मीडिया के रुख और रुखाई की परतें ख्ांगालता यह स्तंभ समर्पित है विश्व के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद के नाम। मीडिया में वरिष्ठ पदों पर बैठे, भीतर तक की खबर रखने वाले पत्रकार इस स्तंभ के लिए अज्ञात रहकर योगदान करते हैं और इसके बदले उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता।

कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी जिसमें एक ठग को ताजमहल बेचते दिखाया गया था। फिल्म में यह कहानी हंसी-मजाक के लिए थी लेकिन भारतीय मीडिया ने इसे सच कर दिखाया। बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार ने सनसनीखेज शीर्षक लगाया कि ‘लालकिला बिक गया’ और बिना दिमाग लगाए मीडिया का एक पूरा झुंड इसे सही मान बैठा। विद्वान समाचार वाचकों ने लालकिला ‘बिकने’ पर चिंता जताई। चैनलों पर बहस शुरू हो गई। यह आज की भारतीय मीडिया की स्थिति है जिस पर तथ्य और सही सूचना के बजाय अधकचरी जानकारी और अपरिपक्व समझ हावी हो चुकी है।

कुछ ऐसी ही स्थिति कठुआ मामले में थी जहां पुलिस के आरोपपत्र में कही गई बेसिर-पैर की बातों को बिना जांचे-परखे दिखाकर मीडिया ने देश की छवि बिगाड़ने की कोशिश की। इस मामले का सच छन-छनकर सामने आ रहा है। जी न्यूज ने इस मामले में प्रशंसनीय रिपोर्टिंग की है। मौके पर बाकी चैनल भी गए, लेकिन किसी की रुचि उस सच्चाई को बताने में नहीं थी जिसका शक पहले से ही जताया जा रहा था। कुशीनगर में बच्चों की स्कूल वैन के साथ दुखद हादसा हुआ। मुख्यमंत्री घटनास्थल पर परिजनों से मिलने के लिए गए। वहां पर उन्होंने नारे लगा रहे अपने ही कुछ समर्थकों को यह कहते हुए फटकार लगाई कि ‘नौटंकी बंद करें, यह दुखद मौका है’। लेकिन कई चैनलों ने उनके बयान में से 11 सेकेंड का हिस्सा काटकर चलाया, जिसे सुनकर ऐसा लगता है मानो वे पीड़ित परिवारों को डांट रहे हैं।

उधर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देब भी वामपंथी मीडिया के निशाने पर हैं। उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर दिखाने और उनका मजाक उड़ाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि ‘बुद्ध के विचार भारत से जापान तक गए’, तो खबर बनाई गई कि बिप्लव देब ने कहा है कि ‘गौतम बुद्ध भारत से जापान गए थे।’ यह झूठी खबर सबसे पहले ‘द टेलीग्राफ’और समाचार एजेंसी पीटीआई ने फैलाई। ‘द टेलीग्राफ’ की पत्रकारिता का स्तर तो बीते कुछ साल में हमने बार-बार देखा है, लेकिन पीटीआई एक समाचार एजेंसी होकर भी जिस तरह से फर्जी खबरों की फैक्ट्री बनी हुई है वह चिंता की बात है।
पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनावों में 34 प्रतिशत सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बिना चुनाव लड़े ही जीत गए। इस चुनावी हिंसा की तस्वीरें भी सबने देखीं। लेकिन बात-बात पर लोकतंत्र का रोना-रोने वाले मीडिया ने इस समाचार को इतने सहज रूप में लिया कि हैरानी होती है।

जेएनयू में लव जिहाद पर फिल्म के प्रदर्शन पर वामपंथी हमले की खबर को दिल्ली के मीडिया ने लगभग पूरी तरह से गायब कर दिया। विवि के सुरक्षाकर्मी पर वामपंथी कार्यकर्ताओं ने अपनी कार चढ़ा दी। बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई, लेकिन मीडिया ने सच बताने के बजाय इसे दो छात्र संगठनों के बीच का झगड़ा बताया।

इसी तरह दिल्ली में राहुल गांधी की रैली में जेके न्यूज 24 ७7 चैनल के पत्रकार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया क्योंकि वे सभा में खाली पड़ी सीटें दिखाने की कोशिश कर रहा था। एकाध चैनलों को छोड़ दें तो किसी ने भी इसे मीडिया की आजादी पर हमला नहीं माना। पर पत्रकारीय स्वतंत्रता की पैरोकारी करने वाले तमाम संगठनों एडिटर्स गिल्ड और एनबीए ने अपनी आंखें मूंद लीं। अगर यह स्थिति है तो मीडिया के आत्मनियंत्रण के नाम पर बने इन क्लबों की जरूरत क्या है? क्या ये संगठन सिर्फ कुछ गिने-चुने पत्रकारों और संस्थानों के हितों की रक्षा के लिए हैं?