सो गए, प्यार से जगाने वाले

 

एक अनुष्ठान संपन्न करते गुरुजी 

 

गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध रविंद्र शर्मा ने गांव और ग्रामीणों की भलाई के लिए कभी खुद की परवाह नहीं की। वे मानते थे कि गांव समृद्ध होता है तो वहां रहने वाले लोग भी समृद्ध होते हैं, पर आजकल गांव को छोड़ केवल व्यक्ति की समृद्धि पर जोर है

‘‘प्रलय आने वाला था। कुछ विद्वान जल्दी-जल्दी सारी चीजों के बीज इकट्ठे कर नाव में चढ़ दूर निकल गए। प्रलय आया, धरती डूब गई। प्रलय शांत हुआ तो विद्वान पुन: आए और उन्हीं बीजों से एक नई सृष्टि का निर्माण किया।’’ पुराणों में लिखी प्रलय की यह कहानी अक्सर कथाओं में सुनी जाती है नैमिषारण्य की कथा के नाम से। पर जब रविंद्र शर्मा, जिन्हें सामान्यत: गुरुजी के नाम से पुकारा जाता है, यह कहानी सुनाकर उसे आज की व्यवस्था से जोड़ते तो सुनने वालों को एक नई दृष्टि मिलती। वे इस पौराणिक कथा को बड़ी सहजता से आज की व्यवस्था से जोड़ते हुए बताते, ‘‘आज भी एक प्रलय आया हुआ है। उसे कोई भी नाम दे दें, आधुनिकता का प्रलय, विकास का प्रलय या पश्चिम का प्रलय, इस प्रलय में कुछ बचेगा नहीं। इसलिए जल्दी-जल्दी सारी सभ्यता के बीजों को इकट्ठे कर लेने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रलय के बाद जब नई सृष्टि रचने बैठे तो उसे मदद मिले।’’ गुरुजी की इस कहानी को देशभर में व्यवस्था परिवर्तन के काम में लगे हजारों लोगों ने सुना। जिन्होंने सुना उनमें से अनेक इसी दृष्टि से अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

 

5 सितंबर, 1952 को तेलंगाना के आदिलाबाद में जन्मे रविंद्र शर्मा का 29 अप्रैल को निधन हो गया। वे मूलत: पंजाबी ब्राह्मण थे। पिछली एक पीढ़ी से उनका परिवार आदिलाबाद में रह रहा है। आजादी के पहले ही उनके पूर्वज पंजाब के किसी गांव से आकर यहां बसे। उनके ताया निजाम के कारिंदे थे। आदिलाबाद में 10वीं तक पढ़ाई के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए हैदराबाद गए। वहां जवाहर लाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल विश्वविद्यालय से कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बाद में ललित कला अकादमी, हैदराबाद की छात्रवृत्ति पर वडोदरा के एम़ एस़ विश्वविद्यालय से ललित कला में स्नातकोत्तर की उपाधि ली। पढ़ाई के दौरान भी गुरुजी का मन आदिलाबाद में ही रमा रहा। वे आदिलाबाद क्षेत्र की कई शिल्प कलाओं और कारीगरी विधाओं में भी पारंगत होते गए। बड़ौदा में पढ़ाई के दौरान का जीवन बहुत रोचक रहा। एम़ एस़ विश्वविद्यालय के बारे में कहा जाता है कि चित्रकला के क्षेत्र में आधुनिकता को स्थापित करने का काम यहीं से हुआ, लेकिन ऐसी उच्च पढ़ाई और आधुनिकता के वातावरण का गुरुजी पर रंच मात्र असर नहीं था। वे प्रत्येक शाम अपने सहपाठियों और शिक्षकों को महाभारत की कथा सुनाते। उनका गुरुजी नामकरण किशोरावस्था में ही हो गया था, जब वे आदिलाबाद में अपने अखाड़े में पहलवानों के उस्ताद हुआ करते थे और लाठी भांजना सिखाते थे।

 

वे कला की आधुनिक पढ़ाई के बाद पेरिस में काम करने के अवसर और बडोदरा में लेक्चरर की नौकरी के अनुरोधों को ठुकरा कर आदिलाबाद आकर यहीं रम गए। 1979 में उन्होंने कला आश्रम की स्थापना की। उनकी कथा, आदिलाबाद क्षेत्र के 20 किलोमीटर के दायरे में घूमकर देखी गई व्यवस्था की कहानी है, जिसमें हर सुनने वाले को अपने गांव की कहानी नजर आती है। यह उनकी विशिष्ट दृष्टि ही थी कि जिस आदिलाबाद को नक्सलवाद के गढ़ के रूप में जाना जाता था, उसे उन्होंने सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था से समृद्ध क्षेत्र के रूप में देखा-पहचाना।

 

उनकी यह विशिष्ट दृष्टि एक छोटी-सी घटना से निर्मित हुई। वे एक दिन किसी के अंतिम संस्कार में गए हुए थे। अचानक उन्हें ध्यान आया कि यहां तो पूरा गांव, हर जाति के लोग मिलकर उसका संस्कार कर रहे हैं। इस बात पर ध्यान जाते ही उन्होंने अन्य संस्कारों की ओर नजर दौड़ाई। सहज ही दिखाई दिया कि भारतीय समाज में एक मानव के जीवन में होने वाले सभी संस्कार ही कारीगरों का बाजार है। दूसरा, बचपन से लेकर मृत्यु तक कारीगरों से परिचय का काम भी संस्कारों के माध्यम से होता है। कभी, किसी संस्कार में कारीगर खुद अपना सहयोग लेकर खड़ा रहता है तो कभी किसी संस्कार में कारीगर के यहां से जाकर चीजों को लाना पड़ता है। भारतीय समाज की इस सुंदर व्यवस्था का आभास होते ही गुरुजी आदिलाबाद के 20 किलोमीटर के दायरे में घूमकर समाज व्यवस्था, जातियों की व्यवस्था, कारीगरी व्यवस्था और उनके आपसी संबंध की जानकारियां इकट्ठा करने लगे। उन्होंने इन्हीं जानकारियों में से व्यवस्थाओं को समझने के सूत्र निकाले।

 

सभ्यता, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, समाज, सामाजिकता, ग्राम ऐसे अनेक शब्द हैं जिनसे सामान्य से सामान्य भारतवासी परिचित हैं। वे अपने दैनंदिन जीवन में अनेक बार इनका उच्चारण करते हैं। लेकिन सामान्य तो दूर, क्या विशिष्ट जन भी इन शब्दों की सटीक व्याख्या करने की स्थिति में होते हैं? वहीं गुरुजी बड़ी ही सहजता से इनके बारे में समझाते। यही नहीं, भारतीय समाज व्यवस्था की अनेक उलझी हुई गुत्थियों को वे बड़ी आसानी से सुलझाते थे, इसलिए उन्हें भारतीय समाज व्यवस्था का सटीक व्याख्याकार कहा गया।

 

गांव किसे कहेंगे? एक गांव की परिभाषा देते हुए वे अनेक सूत्र बताते। गांव के लिए सभी भारतीय भाषाओं में अलग शब्द हैं। इसे ग्राम कहते हैं, पंजाब में पिंड बोलते हैं, देहात भी कहते हैं। इन सबका अर्थ है शरीर। अर्थात् जिस तरह से एक शरीर व्यवस्थित रहता है, वैसे ही हमारे गांव भी व्यवस्थित हैं। गांव यानी वह स्थान, जहां व्यक्ति, परिवार और समूह के आहार (रोजगार) की सुरक्षा हो और उनके मान की व्यवस्था हो, उनमें गौरव का भाव हो। एक सूत्र दिया, गांव समृद्ध होता है तो हर व्यक्ति संपन्न होता है लेकिन जब व्यक्ति संपन्न होता है तो गांव कंगाल होते हैं।

 

गुरुजी किसी विचारधारा या दल से बंधे नहीं थे। वे दृष्टि और दर्शन वाले एक साधारण इनसान थे। पांव में चमड़े की चप्पल, सफेद सूती धोती-कुर्ता, कंधे पर पटका, माथे पर रोली का लंबा तिलक और आंखों पर चश्मा। ठीक वैसे ही जैसे हमारे गांव का कोई पुरोहित घरों में जाकर कथा सुनाता है। गुरुजी भी भारत की कथा सुनाते थे।

 

भारतीय समाज व्यवस्था के वैभव का वर्णन वे इस तरह से करते कि हमारे मानस में हमारी व्यवस्था का एक सुंदर चित्र बनता और सुनने वाले स्मृतियों में खो जाते। वे स्मृति जागरण की कथा सुनाकर चले गए। उनका जाना बुरी तरह अखर गया। कुछ दिन और रहते तो शायद कुछ और सूत्र पकड़ में आते। गुरुजी गए पर वह सब कर गए जो एक साधारण भारतीय को करना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और वर्ष 2000 से ही ‘गुरुजी’ के संपर्क-सान्निध्य में भारतीय समाज व्यवस्था के अध्येता रहे हैं)