बुद्ध के बताए मार्ग पर चलने की जरूरत
   दिनांक 08-मई-2018
कार्यक्रम में उपस्थित (दाएं से) श्री आलोक कुमार, श्री भिक्षु भदंते करुणानंद महाथेरो एवं श्री विनोद बंसल 
‘‘भगवान बुद्ध की प्रज्ञा, करुणा व समता की शिक्षा से ही विश्व शान्ति संभव है। समाज को इसे आत्मसात करना होगा।’’ उक्त बात विहिप कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने कही। वे पिछले दिनों बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर दक्षिणी दिल्ली के बुद्ध विहार में दर्शन-पूजन के उपरान्त कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि भारत की पावन धरा पर अवतरित भगवान बुद्ध ने दुनिया को सत्य, अहिंसा, करुणा, प्रज्ञा, सामाजिक समरसता का संदेश देकर एक भेदभाव मुक्त समाज की स्थापना की थी। विश्व शान्ति के लिए आज उन सिद्धांतों की पुन: प्रतिष्ठा की महती आवश्यकता है। इस अवसर पर प्रमुख रूप से उपस्थित जगतज्योति बौद्ध विहार के प्रभारी श्री भिक्षु भदंते करुणानन्द महाथेरो ने कहा कि जिस पवित्र स्थल पर आज हम बैठे हैं, सैकड़ों वर्ष पूर्व, भगवान बुद्ध स्वयं यहां पर आए थे। यह अनेक बौद्ध भिक्षुओं की तपो स्थली भी रही है। प्रतिनिधि


‘‘मातृ भूमि की सेवा हमारा परम कर्तव्य’’
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, देहरादून महानगर द्वारा पिछले दिनों विद्यार्थी शाखा दर्शन के कार्यक्रम में 51 शाखाओं के 954 स्वयंसेवकों ने भाग लिया। अनेक प्रेरक कहानियों व अपने जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों के माध्यम से मातृभूमि की सेवा को परम कर्तव्य बताते हुए संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख श्री सुरेश चन्द्र ने कहा कि जिस प्रकार हम अपनी जन्म देने वाली मां की सेवा करते हैं, उसी प्रकार हम इस मातृभूमि की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहें। उन्होंने कहा कि संघ शाखाओं के माध्यम से बिना किसी भेदभाव के स्वयंसेवकों को तैयार करता है ताकि वे चरित्र, व्यवहार से साहसी व अनुशासित स्वयंसेवक बन कर जन्म देने वाली मां के समान ही भारत मां की सेवा कर सकें। कार्यक्रम में क्षेत्रकार्यवाह श्री शशिकान्त दीक्षित एवं क्षेत्र सामजिक समरसता प्रमुख श्री लक्ष्मीप्रसाद उपस्थित थे।

‘‘समाज में पूजा भाव से हो सेवाकार्य’’

पुरस्कृत लोगों के साथ (बाएं से दूसरे) श्री भैयाजी जोशी
 
गत दिनों नागपुर स्थित साइंटीफिक सभागृह में स्व़ रंजना भालचंद्र मार्डीकर तथा स्व़ भालचंद्र प्रभाकर मार्डीकर स्मृति पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी उपस्थित थे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हम निरपेक्षभाव से जैसे ईश्वर की पूजा करते हैं, उसी भाव से समाज में किया गया सेवाकार्य श्रेष्ठ होता है। लेकिन थोड़ा-सा कुछ कार्य करके बहुतांश लोग उसके फल की अपेक्षा करने लगते हैं, ऐसे लोगों की समाज में कमी नहीं है। बहुत बार अच्छे कामों में भी कुछ पाने की वृत्ति दिखाई देती है। ऐसी वृत्ति से अपने आपको दूर रखने की आवश्यकता है और यही एक प्रकार की साधना है। ऐसे ही लोगों द्वारा सेवा का व्रत लिया जाता है और निरपेक्षभाव से अंत तक निभाया भी जाता है। मंदिर में जाना, पूजा-अर्चना करना यह तो ठीक है, परन्तु उससे आगे बढ़ कर मनुष्य के अन्दर के भगवान को पहचान कर उसकी सेवा करना ही श्रेष्ठ सेवाकार्य होता है। उन्होंने कहा कि समाज सेवा के लिये प्राय: कुछ मुख्य बातों को देखना पड़ता है। जिसकी सेवा करनी है उसकी आवश्यकता, समझ तथा मुख्य कठिनाई इसकी पहचान करनी होगी। उसके लिये प्रखर संवेदना की आवश्यकता होती है। इसी संवेदना से हम आने वाली हर कठिनाई का मुकाबला करते हुए खुद को सेवाकार्य में समर्पित कर समाज के दीन-दुखियों, जरूरतमंदों की सेवा कर सकते हैं। सेवा कार्य करते-करते हम उस विषम परिस्थिति को सम-परिस्थिति में परिवर्तित कर समाज को बराबरी की रेखा पर लाकर खड़ा करते हैं।

गोमय समृद्धि कार्यशाला संपन्न

कार्यक्रम को संबोधित करते विशिष्ट अतिथि
 
पिछले दिनों 20-21 अप्रैल को नागपुर स्थित देवलापार ‘गो -अनुसंधान’ केंद्र में गोमय समृद्धि कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में गोबर-गोमूत्र से बनी विभिन्न औषधियां और अन्य वस्तुएं प्रदर्शनी के रूप में रखी गई थीं। कार्यशाला का शुभारंभ डॉ़ रविंद्र कुमार बोपचे ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय का सम्मान है। वह एक मां की तरह ही हम सभी का पालन करती है। इसके अलावा यहां गोमय से अनेक उपयोगी तथा मूल्यवान एवं पर्यावरणपूरक वस्तुओं का निर्माण देख आनंद का अनुभव हो रहा है। कार्यक्रम में उपस्थित ग्रामायण के सचिव संजय सर्राफ ने कहा कि भविष्य में देश में इसी तरह प्रशिक्षण और कार्यशालाएं कराने की योजना है। ऐसे अभियान गोधन निर्माण करने वाले किसानों के लिए आजीविका का आधार बन सकते हैं। गोबर और गोमूत्र से अनेक औषधियों का निर्माण हो रहा है। ये औषधियां कई रोगों में कारगर साबित हुई हैं। लेकिन इसके बाद भी कुछ लोग गोधन की उपयोगिता को नहीं समझते। ग्रामायण के अध्यक्ष अनिल जी सांबरे ने कहा कि कार्यशाला में निर्मित वस्तुओं की बिक्री से प्रशिक्षणार्थियों के अंदर आत्मविश्वास की वृद्धि होती है। इससे वह और ऊर्जा के साथ इस काम में लगते हैं। इस अवसर पर सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र भी वितरित किए गए।