प्रणब मुख़र्जी का नागपुर प्रवास उदारवाद की जीत, उन्होंने जो कहा वह हिंदू संस्कृति ही सिखाती है
   दिनांक 10-जून-2018
                                                                                                                                                                  
                                                                                                                                                रतन शारदा
 
सन 2014 को भारत के अर्वाचीन इतिहास का एक मील का पत्थर माना जा सकता है. इस काल में पहली बार स्थापित वामपंथी और छद्म सेक्युलर शक्तियां जड़ से हिल गयीं. उनके द्वारा थोपे गए राष्ट्र और जीवनमूल्यों को बहुत बड़ी चुनौती ही नहीं मिली वरन उनके आमूल उखड़ने का समय दूर नहीं यह उन्हें समझ आने लगा. और उसके बाद एक बहुत सोच समझ के साथ इन शक्तियों ने राष्ट्रवादी शक्तियों को अलग थलग करने की, बदनाम करने की पूरी कोशिश जारी कर दी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कई वर्षों से नक्सलवादी, देशद्रोही, अलगाववादी, चर्च और जिहादियों के इकठ्ठा आने की आगाही करता रहा है. कश्मीर, पूर्व, उत्तरपूर्व, मध्य, पश्चिम और दक्षिण भारत – सभी अंचलों से इनके आपसी सहयोग के बारे में खबरें मिलती रहीं और संघ सरकारों और राष्ट्र को सावधान करता रहा. परन्तु उसे साम्प्रदायिकता की दुहाई देकर ख़ारिज कर दिया जाता रहा. 2014 के बाद के काल मे इन सभी ताकतों को लगा कि अब उनपर ग्रहण लगने वाला है. इसलिए असहिष्णुता, चर्च पर आक्रमण, नन रेप को हिन्दू अतिरेक का जामा पहनाने में कोई कमी नहीं राखी गयी. इतना ही नहीं, आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति, अलगाववादियों का साथ, भारत के टुकड़े करने वालों की हिमायत इत्यादि कृत्यों से राष्ट्रवादी शक्तियों और हिन्दुओं को कटघरे मे खड़े करने की मुहिम ही चल पड़ी. इन विचारों को शहरी नक्सलियों और कांग्रेस ने भी खूब सींचा. इस तरह से भारत में अराजकता का भाव और विश्व भर में बढ़ती भारत की प्रतिमा को धूमिल करने का कोई प्रयास नहीं छोड़ा गया.
सार्वजनिक चर्चा का स्तर इतना पश्चिम-पूर्व के छोरों पर ले जाया गया की कोई संवाद संभव ही नहीं रह गया. सार्वजनिक माध्यमों में जिस तरह की बहस चलने लगी है वह लज्जास्पद और निराशाजनक है. इस बारे में मैंने एक लेख भी लिखा था (http://www.newsbharati.com//Encyc/2017/9/28/In-search-of-a-healthy-public-discourse.html). अपने इस कुचक्र में इन वामपंथी और उनकी सहयोगी ताकतों ने राष्ट्रवादियों को राजनैतिक अछूत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह प्रयत्न 1947 से चल रहे थे, पर अब इनमे एक नई तेजी आ गयी. पश्चिमी माध्यम,जिनसे स्थापित तत्वों से पुराने सम्बन्ध थे, उन्होंने भी सहयोग दिया. पाकिस्तान हो या चर्च सभी का उपयोग हुआ. यहाँ तक कि समाज को विभाजित करने और दंगे करवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई. कुछ हद तक इसमें यह गुट सफल भी हुए. हिन्दू विरोध और मोदी विरोध ने राष्ट्रविरोध का रूप ले लिया.उदारवाद के नाम पर अति अनुदारवाद का बोलबाला हो गया.
ऐसे समय में भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुख़र्जी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में आने की स्वीकारोक्ति देना मानो इस सारे भ्रमजाल को तोड़ने का काम कर गयी. अपने राजनैतिक जीवन में धुर संघ विरोधी रहे एक व्यक्ति को संघ के मंच पर लाने का एक उदारवादी साहस संघ के नेताओं ने किया. इन दिनों की राजनीति में यह एक अत्यंत साहसी और अभिनव पहल थी. परन्तु राजनैतिक छुआछूत मानाने वाले अनुदारवादी लोगों ने आखिर तक ऐसे वरिष्ठ कांग्रेसी को शर्मिंदा करने और रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस सबके बावजूद प्रणबदा ने जो स्थितप्रज्ञता दिखाई वह सराहनीय है. संघ के लिए यह कोई नहीं पहल नहीं थी, न ही संघ को बदनाम करने की और अस्पृश्य बनाने के प्रयत्नों से संघ नावाकिफ था. संघ विरोधी अपनी अल्प स्मृति के कारण अन्य विचारधाराओं के महानुभावों के संघ मंच पर आने के अवसर विस्मृत कर चुके थे या याद नहीं करना चाहते थे. ऐसे सारे वातावरण के कारण राजनीती के प्रखर ध्रुवीकरण को नरम करने की इस पहल को राष्ट्रीय कार्यक्रम का स्वरुप मिल गया,जिसे अनापेक्षित प्रसिद्धि भी माध्यमों ने दी. प्रणब दा संघ को कोई उपदेश देंगे या स्वयं संघी बन जायेंगे? यह अटकलें लगती रहीं. यह सारा उत्सवमय वातावरण संघ के कारण नहीं बल्कि संघ विरोध के कारण हुआ.
संघ तो समाज में संवाद चाहता है. सभी भारतीय आज नहीं तो कल संघ के विचारों को मानेंगे इस भाव से सभी को स्नेह से मिलता है. प्रणबदा संघ की पीठ थपथपायेंगे या संघ की भाषा बोलेंगे ऐसी अपेक्षा संघ को नहीं थी. परन्तु जो भूतपूर्व राष्ट्रपति ने कहा वह संघ के विचारों से मिलता जुलता ही कहा और अपने कांग्रेसी संस्कारों के दायरे में रह कर कहा.
आदरणीय सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि संघ ने हमेशा भारत में विविधता में एकता के भाव को अपना आदर्श मानता है और इस अंतर्भूत एकता को सानंद मानता है. इस धरती पर पैदा हुआ हर व्यक्ति भारतवासी है, चाहे वह किसी भी पंथ या सम्प्रदाय का हो, हम सभी इसी भारतमाता की संतान हैं और सब को साथ लेकर चलना यही संघ का ध्येय है. संघ शक्ति भारत की उन्नति के लिए समर्पित है. अलग-अलग विचारों को संयोजित करना, सच्चरित्र व्यक्ति का निर्माण करना यह संघ का काम है. संघ शक्ति किसी को दबाने या अपने बल प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि भारतमाता की उन्नति के लिए समर्पित है.
श्री प्रणब मुखर्जी ने अत्यंत विद्वत्तापूर्ण विषय रखा जिसमे अधिकतम तर्क संघ के विचार और विश्वास को ही दोहराते हैं. इससे यह पता चलता है, की विषय रखने का तरीका कुछ भिन्न हो सकता है, एकाध विषय पर थोडा-बहुत मतभेद हो सकता है, परन्तु सर्वसाधारणरूप से एक आम राय इस देश के इतिहास और सांस्कृतिक तथा वैज्ञानिक परंपरा को लेकर और इसके भविष्य के बारे में बन सकती है. शर्त है कि उदार संवाद के द्वार खुले रहें. केवल ‘मेरा ही सत्य’ यह कुछ नवसृजित धर्मों की भूमिका हो सकती है, परन्तु हिन्दू संस्कृति से उत्पन्न किसी भी धर्मं या संप्रदाय की नहीं हो सकती.
भूतपूर्व राष्ट्रपति जी ने हजारों साल की अखंड राष्ट्रीयता और संस्कृति की बात की. उन्होंने भारत की अभूतपूर्व शिक्षण पद्धति, वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात की. इस राष्ट्र की यह विशेषता है की जो यहाँ आया उसे हमने अपना बनाया, आत्मसात किया. उन्होंने मुस्लिम आक्रमणों का भी जिक्र किया, जिसे नेहरूवादी विचारक नकारते आये हैं. उन्होंने भारतवर्ष के महान प्रजातंत्र की गहरी जड़ों की और सहिष्णु परंपरा की बात की.इन विचारों से यह देश १९४७ में बना एक नया राष्ट्र नहीं बल्कि हजारों साल से अविरल चला आ रहा राष्ट्र है या अभिव्यक्ति स्पष्ट है. यही संघ का कहना है. संघ इस राष्ट्र को बंधे रखने वाली एकात्म आत्मा को हिन्दू नाम देता है, प्रणब दा ने इसे भारतीय कहा. संघ हिन्दू शब्द को सांस्कृतिक और भौगोलिक से जोड़ता है, और आम सोच जो कि पश्चिम की शब्दावली है, इसे पंथ और पूजा पद्धति से जोड़ती है. परन्तु यह ऐसा मूलभूत अंतर नहीं जिसे संवाद द्वारा समान धरातल पर नहीं लाया जा सकता. हां, उन्होंने कुछ हद तक अपनी कांग्रसी सोच के आधार पर ‘आर्य आक्रमण’ वाली व्याख्या में इस देश में तीन वंश (races), कौकेशियन, द्रविड़ और मंगोल, चले आ रहे हैं ऐसा कहा. जबकि आज का विज्ञान मानता है की हम सभीका डीएनए हजारों वर्षों से (लगभग 40000) एक ही है. अतः अलग-अलग वंश की बात अब वैज्ञानिक नहीं रह गयी.
प्रणब दा ने सहिष्णुता की आवश्यकता और हिंसा पर चिंता व्यक्त की. यदि हम देखे इन तो स्वयं उन्हें संघ के कार्यक्रम में न जाने देने और उन्हें इस पर निन्दित करने का काम तो कांग्रेसी और वामपंथी खेमे ने किया. यह असहिष्णुता का उदाहरण ही है. समाज में विभेद करने और हिंसा द्वारा सत्ता पलटने का काम, नक्सली और आतंकवादियों को पोषित करने का काम भी वामपंथी और कांग्रेसी एजेंट कर रहे हैं. कल ही अत्यंत चिंतित करने की खबर मिली कि प्रधानमंत्री की हत्या करने की साजिश नक्सलवादी एवं उनके सहयोगी शहरी नक्सली अन्य देशद्रोही तत्वों के साथ मिलकर कर रहे हैं. अफ़सोस कि कांग्रेस के नेता जिनकी पार्टी स्वयं दो प्रधानमंत्री हिंसक तत्वों के हाथों खो चुकी है, ऐसे तत्वों को सहयोग दे रही है ऐसी भी खबर है. अतः उनका उपदेश इसी खेमे के लिए था ऐसा मैं मानता हूं.
जिस pluralism (या बहुमतवाद के प्रति आदर) की बात प्रणब दा ने की वह भी केवल हिन्दू संस्कृति ही सिखाती है. इस्लाम या ईसाई धर्म तो ‘केवल उनका सत्य ही एकमात्र सत्य है’ और बाकी सभी झूठ है और ‘काफिर’ या ‘गिरे हुए’लोगों उद्धार करने के लिए उनका धर्मं परिवर्तन करना या उन्हें नष्ट करना ऐसा विचार लेकर चलते हैं. ‘एकम सत विप्र बहुधा वदन्ति’ यह केवल हमारे उपनिषद् ही कहते हैं. कम्युनिज्म भी एक कट्टर पंथ ही बन गया है, जो अन्य किसी विचार को मानाने वाले को अपना शत्रु मानता है और समाप्त करने के लिए तत्पर रहता है. अतः उनका pluralism का पाठ भी ऐसे ही गुटों के लिए प्रेषित किया गया, यह मानना उचित होगा. यह राष्ट्र केवल प्रजातंत्र के आधार पर चल पायेगा, किसी एक पंथ या धर्म के आधार पर नहीं, यह भी भारतीय या हिन्दू धारणा है. यही इस राष्ट्र परंपरा है, क्योंकि हिन्दू धर्म किसी पंथ विशेष के शासन (theocratic rule) को पोषित नहीं करता. धर्म यह समाज को नियमों से चलाने का मार्ग है, जो कि पंथ विशेष या पूजा पद्धति से बिलकुल सम्बंधित नहीं है.
हम यह मान सकते हैं, की देश में वैचारिक छुआछूत को समाप्त करने का एक और नूतन प्रयत्न संघ और श्री प्रणब मुख़र्जी ने किया है. उदारवादी भारतीय संस्कृति को आगे रखते हुए अनुदारवादी कट्टरपंथियों को संवाद का मार्ग फिर दिखाने का प्रयत्न किया है. हम आशा करते हैं कि भारतीय समाज जीवन को अनुदारवादी अंधेरे में से निकालने का यह प्रयत्न आगे भी चलेगा और हम एक आदर्श और समृद्ध समाज और राष्ट्र के स्वप्न को साकार कर पाएंगे.