महाराणा की महागाथा
   दिनांक 11-जून-2018

पढ़े-लिखे लोग भी अक्सर जिस एक पहेली पर गच्चा खा जाते हैं, वह भारतीय इतिहास से जुड़ा एक छोटा-सा सवाल है।

हम कितने वर्ष गुलाम रहे? इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए ज्यादातर लोग 1947 की ताजा यादों तक ही लौट पाते हैं जबकि तथ्यत: यह बात गलत है।

वास्तव में यह 1192 ई. में तराइन का दूसरा युद्ध था जिसने पहली बार भारतीयों पर किसी विदेशी वंश का 'शासन' थोपा।

 

राजकुमारी संयोगिता के 'हरण' से तिलमिलाए जयचंद और एक वर्ष पहले तराइन की पहली लड़ाई में मुंह की खाने वाले मोहम्मद गौरी की छटपटाहट का मिलना वह संयोग था जिसने पहली बार भारत में विदेशी राज के लिए रास्ता बनाया। हमले पहले भी हुए, इनकी खंगाल करते हुए हम 712 ई. में सिंध में राजा दाहिर के राज्य पर मुहम्मद बिन कासिम के हमले तक जा सकते हैं, किन्तु यह ध्यान रखने वाली बात है कि उन हमलों में आक्रमण और लूट भले रही हो, भारत में किसी विदेशी शासक का बीज नहीं जमा।

इस मायने में तराइन का दूसरा युद्ध गद्दारी, धोखे, कुछ लोगों को एक ओर कर समाज को बांटने और फिर जीत हासिल कर इस समाज, इस देश, भारत की भारतीयता को रौंदने और विदेशी वंश का राज स्थापित करने का पहला मामला लगता है।

सो जाहिर है, भारत की स्वतंत्रता और इसके लिए संग्राम अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने जितनी नई बात नहीं है, जैसा कि आमतौर पर बताया-पढ़ाया जाता है। इस बात की अनदेखी कैसे की जा सकती है कि अंग्रेजों से पहले इस देश और संस्कृति पर मुस्लिम आक्रमण हुआ था। उन्होंने भी आठ सौ साल हम पर शासन किया। इस निरंतर गुलामी के खिलाफ हिन्दुओं का अनवरत संघर्ष चलता ही रहा। मेवाड़ के महाराणा प्रताप इस अनवरत चले स्वतंत्रता संग्राम के अनूठे नक्षत्र थे।

कुनबे से भी बढ़कर करनी बोलती है, और इसीलिए 'हिन्दुआ सूरज,' महाराणा का यह सर्वनाम स्वतंत्रता और सम्मान का उद्घोष बना। उनका नाम यानी स्वतंत्रता के लिए जान झोंकने वाला शौर्य, कभी पराजित न होने वाली जिजीविषा का पर्याय। मुगलकाल भारतीय इतिहास का काला अध्याय था।

देश मुगल साम्राज्य की बढ़ती हुई शक्ति के आगे असहाय हो चुका था, उस समय तो हिन्दुओं के लिए स्वतंत्रता की बात सोचना ही पागलपन था। अकबर ने भारी ताकत और कूटनीति के जरिये देश में सबसे बड़ा मुगल साम्राज्य खड़ा किया था। सारे हिन्दू राजाओं को उसने बड़े-बड़े पद देकर अपने अधीन कर लिया था। इस तरह वह मुगल सल्तनत को हिन्दू मुस्लिमों के मिले-जुले साम्राज्य के रूप में पेश कर रहा था मगर उसकी असली मंशा मुगल सल्तनत को ही मजबूत बनाने की थी। लेकिन राणाप्रताप अकबर की चालबाजी को भलीभांति जानते थे। आखिरकार शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के सामने सब झुक गए मगर राणा प्रताप की तलवार कभी नहीं झुकी। विदेशी गुलामी के इस महासागर में भी मेवाड़ हिन्दू प्रतिरोध और स्वतंत्रता का जगमगाता द्वीप बना रहा। प्रताप के बाद सोलहवीं सदी में मुगलों को बहुत सफल चुनौती महाराष्ट्र से जुझारू योद्धा छत्रपति शिवाजी द्वारा मिली। यह ध्यान देने वाली बात है कि उन्होंने राज्याभिषेक से पहले अपने को सिसोदिया वंश का ही बताया था जो प्रताप का वंश था। यानी कहा जा सकता है कि महाराणा प्रताप का संघर्ष और नायकत्व ऐसा था जो आने वाली सदियों में आजादी के दीवानों को हमेशा प्रेरणा देता रहा।

देशभर के साहित्यकारों ने प्रताप की गौरव गाथा लिखी है। हिन्दी में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे साहित्य शिरोमणियों ने महाराणा का गौरवगान किया है। महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास में वीरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के पर्याय हैं। वे एक कठिन और उथल-पुथल भरे काल-खंड में पैदा हुए थे, जब मुगलों की सत्ता समूचे भारत में छाई हुई थी और मुगल सम्राट अकबर की तेजी की तूती बोल रही थी। लेकिन महाराणा प्रताप इस तेजी के पीछे छिपी साम्राज्यवादी आकांक्षा के विरुद्ध थे, इसलिए उन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की।

परिणामस्वरूप अकबर उनके विरुद्ध युद्ध में उतरा। इस प्रक्रिया में महाराणा प्रताप ने जिस वीरता, स्वाभिमान और त्यागमय जीवन का वरण किया, उसी ने उन्हें एक महान लोकनायक और वीर पुरुष के रूप में सदा-सदा के लिए भारतीय इतिहास में प्रतिष्ठित कर दिया। तीस साल तक संघर्ष कर मेवाड़ में स्वतंत्रता की अलख जगाए रखने वाले महाराणा की वीरता के किस्से आप सुनेंगे तो इस गर्वीले नायक के प्रति श्रद्धा से भर उठेंगे। मगर इस आजादी के मतवाले योद्धा के खिलाफ हमारे इतिहास ने बड़ा अन्याय किया है।

इतिहास को समग्ररूप में देखे बिना महाराणा प्रताप का जो एकांगी चित्रण इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में हुआ है, वह लोक ख्याति और तथ्यों से परे तथा मुगलिया दृष्टिकोण से प्रभावित लगता है। दिलचस्प बात यह है कि अकबर और राणा प्रताप के बीच हुए हल्दीघाटी के युद्ध में राणा प्रताप की कथित हार जिस आग्रह से यह इतिहासकार बताते हैं, उसे खुद अकबर के दरबारी इतिहासकारों तक का लेखन नकारता है।

महाराणा ने अकबर की कथित महानता को मिट्टी में मिलाते हुए सारे मेवाड़ पर कब्जा कर लिया था, यह अनूठी बात शातिर तरीके से दबा दी जाती है। चे-ग्वेरा का नाम जपने और उसे गुरिल्ला युद्ध का पुरोधा बताने वाले महाराणा के मारक दस्तों की छापामार शैली का जिक्र भला क्यों करना चाहेंगे?

जयचंद की गद्दारी के बूते पृथ्वीराज को पराजित करने की मुहम्मद गौरी की चाल के बरअक्स जब महाराणा के लिए जान की बाजी लगाते भीलों की कहानियां और एकजुट समाज का चित्र सामने आता है तो चंद इतिहासकार उस पर धूल डालने लगते हैं।

ऐसे में प्रताप जयंती पर पाञ्चजन्य का यह महा-आयोजन महाराणा के संघर्षपूर्ण जीवन के हर पहलू से साक्षात्कार कराएगा। इतिहास पर पड़ी धूल हटाता, तथ्यों को सामने रखता हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा, बताइएगा जरूर।