पीएम मोदी को मारने की साजिश करते नक्सली, समर्थन अभिजात्य वर्ग का पीएम मोदी को मारने की साजिश करते नक्सली, समर्थन अभिजात्य वर्ग का
पीएम मोदी को मारने की साजिश करते नक्सली, समर्थन अभिजात्य वर्ग का
   दिनांक 11-जून-2018

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में पकड़े गए रोना विल्सन के घर से बरामद पत्र से पता चला है कि माओवादी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी रोड शो के दौरान हत्या की साजिश रच रहे थे।

 

इस साल जनवरी में हुई हिंसा की जांच की जांच कर रही पुणे पुलिस को मिले सबूत इसी तथ्य को साबित करते हैं कि नक्सलवाद को असली समर्थन शहरी इलाकों से ही मिल रहा है। दिल्ली के मुनिरका विहार के अभिजात्य फ्लैट से गिरफ्तार रोना विल्सन की जीवन शैली और उससे बरामद दस्तावेज इसी बात की तस्दीक करते हैं। पहले जी एन साईंबाबा और अब रोना विल्सन की गिरफ्तारी ने इसी तथ्य की तस्दीक की है कि नक्सलियों का असली आधार शहरी अभिजात्य वर्ग ही है। नक्सलवाद और उसके जरिए हो रही हिंसा को शहरी समर्थन का आरोप वे ताकतें लगाती रही हैं , जिनका समस्याओं के समाधान के लिए हिंसा के प्रयोग से परहेज रहा है। हालांकि शहरी अभिजात्य वर्ग वाले नक्सली समर्थक इसे बेबुनियाद बताते रहे हैं।

महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में शहरी नक्सली अभिजात्य वर्ग का हिस्सा हैं , समाज में ऊंचा रसूख रखते हैं और ठसक से साथ आलीशान जीवन शैली जीते हैं। यह बात और है कि उनके पहनावे देसीनुमा होते हैं। सूती कुर्ते-जीन्स के साथ सूती साड़ियों में लिपटा यह समाज बाहर से अहिंसा की प्रतिमूर्ति लगता है , देशभक्ति की बात करने वाली ताकतों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ महात्मा गांधी के अहिंसा के संदेश को उद्धृत करता है। लेकिन अंदरखाने में वह हिंसा का ही समर्थन करता है।

याद कीजिए , 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की टुकड़ी पर घात लगाकर हुए हमले को , जिसमें छत्तीसगढ़ पुलिस के दो सिपाहियों समेत केंद्रीय बल के 76 जवान शहीद हुए थे। इस लोमहर्षक कांड में मारे गए लोग उस बुर्जुआ समाज और कारपोरेट समाज के हिस्से नहीं थे , जिसके खिलाफ नक्सलवादियों ने हिंसा की राह अख्तियार कर चुकी है। इस कांड में शहीद लोग बेहद सामान्य परिवारों के ही लाड़ले थे , जिनके अधिकारों की कथित रक्षा के नाम पर नक्सलियों ने बंदूकें और बारूद को अपने हाथों में थाम रखा है। उस कांड के बाद नक्सलियों के खिलाफ सेना और वायुसेना के इस्तेमाल की जोरदार मांग उठी थी। तब इसका प्रतिवाद रोना विल्सन और जीएन साईंबाबा जैसे शहरी नक्सलियों ने ही किया था। अभिजात्य के पर्दे में छिपे नक्सलियों का तर्क था कि नक्सली भी अपने ही लोग हैं और अपने लोगों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उनका प्रेशर ग्रुप ऐसा है कि सैनिक कार्यवाही का मन बना चुकी सरकारों ने भी यह विचार टाल दिया था। हालांकि जनता का एक वर्ग चाहता था कि रोज-रोज की हिंसा से निबटने के लिए सैनिक कार्रवाई होनी चाहिए और इसे सदा के लिए खत्म कर देना चाहिए। इसी आम भावना को अभिव्यक्ति मशहूर फिल्मकार प्रकाश झा ने अपनी फिल्म चक्रव्यूह में दी , जिसमें बस्तर संभाग में स्थित नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई में हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया था।

नक्सली संगठन नए चीन के संगठक माओत्से तुंग के उस विचार से प्रभावित हैं , जिसमें उन्होंने कहा है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसलिए वे झारखंड , उड़ीसा , छत्तीसगढ़ , आंध्र और तेलंगाना से लेकर उत्तर प्रदेश के जंगलों में आए दिन अपनी सत्ता की खोज करते रहते हैं। यह बात और है कि इन दिनों सरकारों और सुरक्षा बलों ने भी कठोर रूख अख्तियार कर रखा है , इसलिए उनके खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई तेज हो गई है। इसलिए वे हताश भी हैं और अपने संगठन में जान फूंकने के लिए नए-नए विचारों पर काम कर रहे हैं।

शहरी नक्सली समाज को केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार का बनना कभी नहीं सुहाया। अगर यह बात वैचारिक विरोध की होती तो लोकतांत्रिक समाज में इसे स्वीकार कर लिया जाता। अगर वे भारतीय जनता पार्टी का लोकतांत्रिक तरीके से चुनावी मैदान में विरोध करते तो बात समझ में आती। लेकिन उन्होंने हत्या और बारूद का रास्ता अख्तियार कर रखा है। भीमा कोरेगांव की घटना की जांच कर रही पुलिस को रोना विल्सन से जो दस्तावेज मिले हैं , उसमें एक पत्र किसी "कॉमरेड प्रकाश " को सम्बोधित है। पुलिस के मुताबिक इस पत्र में बिहार और पश्चिम बंगाल की हार के बावजूद भाजपा की 15 से अधिक राज्यों में जीत पर चिंता जताई गई है। पत्र में कहा गया है , "यदि यही गति रही तो हर तरफ से पार्टी की परेशानी का सबब बनेगी। मोदी राज का अंत करने कॉमरेड किशन और कुछ अन्य वरिष्ठ कॉमरेड्स ने कड़े कदम अर्थात "कॉन्क्रिट स्टैप्स " सुझाये हैं। हम राजीव गाँधी जैसी एक और घटना के बारे में सोच रहे हैं।"

यहां याद दिला देना जरूरी है कि 21 मई 1991 को आम चुनावों के वक्त प्रचार करने तमिलनाडु के श्री पेरुंबुदूर पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिल उग्रवादियों ने आत्मघाती विस्फोट के जरिए उड़ा दिया था। रोना विल्सन के पास से हासिल यह दस्तावेज नक्सलियों की हिम्मत और साजिश की ही जानकारी मिलती है। पुलिस को मिले दस्तावेज बताते हैं कि हथियार खरीदने के लिए पैसे तक जुटाने की किस तरह कोशिश कर रहे हैं। रोना विल्सन के पास से मिले दस्तावेजों में पुलिस के मुताबिक हथियार खरीदने के लिए आठ करोड़ रूपए की जरूरत भी बताई गई है।

सवाल यह है कि इतनी मोटी रकम नक्सलियों के पास कहां से आती है। इसी साल 12 जनवरी को केंद्रीय गृहमंत्रालय ने नक्सली इलाकों के पुलिस अफसरों की बैठक बुलाई थी। इसमें प्रवर्तन निदेशालय की टीम भी शामिल हुई थी। इससे पता चला कि नक्सलियों ने रंगदारी और नशे के कारोबार के जरिए काफी कमाई की है। इस बैठक में बिहार पुलिस ने कई बड़े नक्सल नेताओं की सूची ईडी को सौंपी है। इसमें बिहार का सबसे बड़ा नक्सली नेता अरविंद जी उर्फ देवी जी भी शामिल है। देव जी प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी का सदस्य है। उसके अलावा गया के संदीप यादव , प्रद्युम्न शर्मा , मुसाफिर सहनी , उत्तरी बिहार का माओवादी कमांडर विजय यादव उर्फ मुराद जी , झारखंड के हजारीबाग का चिराग दा उर्फ रामचंद्र महतो , वशीर दा उर्फ सिंह जी , माओवादियों के गुरिल्ला दस्ते का कमांडर लाल मोहन यादव , स्पेशल प्लाटून कमांडर मनोज हांसदा व बाबूराम उर्फ राजन जी की संपत्ति की जांच हो रही है। इसके बाद झारखंड सरकार और सीमा सुरक्षा बल को झारखंड में 500 एकड़ में गांजा और अफीम की खेती का पता चला तो इसी साल मार्च में उसे नष्ट करा दिया। पता चला कि यह खेती नक्सली करा रहे थे , जिससे उन्हें 55 करोड़ रूपए की आमदनी हो सकती थी।

कितनी हैरतअंगेज बात है कि दिल्ली और दूसरे शहरों में बैठकर ऑपरेट कर रहे नक्सलियों के अभिजात्य विचारक हिंसा की मुखालफत करते हैं , नशे का सार्वजनिक तौर पर विरोध करते हैं , लेकिन अपनी ही कमाई और अपनी गतिविधियों को संचालित करने के लिए नशे और रंगदारी को ही जरिए बनाते हैं। नक्सली इलाकों के भोले-भाले लोगों को हथियार उठाने के लिए बरगलाते हैं और मौका आने के बाद उन्हीं की लड़कियों या गुरिल्ला दल में शामिल अपनी साथियों को ही सेक्स के लिए इस्तेमाल करते हैं। झारखंड के नक्सली इलाके में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके पत्रकार विनोद कुमार का 2015 में आये उपन्यास रेडजोन में नक्सलियों की ऐसी काली करतूतों का विवरण भरा पड़ा है। जिसे नक्सलियों के शराब , सेक्स और उसके कॉकटेल पर संदेह हो , उसे यह उपन्यास पढ़ना चाहिए।

नरेंद्र मोदी सरकार से नक्सली कितना परेशान हैं , इसका सबूत तो रोना विल्सन की गिरफ्तारी और उससे मिले दस्तावेजों से पहली बार मिला है। लेकिन जिस तरह उनकी ही वैचारिक सहयोगी रही गौरी लंकेश की हत्या को सांप्रदायिकता से शहरी अभिजात्य वर्ग ने जोड़ा था , उसी समय शक की सूई नक्सलियों की ओर गई थी। यह बात और है कि इस हत्या के पीछे भी नक्सली ही हाथ नजर आ रहा है। भीमा कोरेगांव की हिंसा हो या जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे या फिर हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित बेमुला का मामला हो या काशी हिंदू विश्वविद्यालय में लड़कियों से होने वाली छेड़खानी के बहाने आंदोलन हो या फिर दिल्ली के रामजस कॉलेज की हिंसा हो , या फिर गुजरात के ऊना की हिंसा का मामला हो या फिर उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक से मारपीट का मामला , हर मामले को उठाने और उसे गलत मोड़ देने में शहरी नक्सली ही आगे रहे। सड़कों पर मोमबत्तियां लेकर उतरने में आगे यही तबका रहा। तब हिंसा विरोधी ताकतों को समझ में आ रहा था कि इस पूरे जंजाल के पीछे नक्सली सोच का हाथ है। लेकिन ठोस सबूत पहली बार रोना विल्सन की गिरफ्तारी के बाद मिले हैं। पुणे में दलितों के नाम पर भीमा कोरेगांव की हिंसा फैलाने की वजह केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार को बदनाम और अस्थिर करना रहा।

बहरहाल एक जनवरी 2018 को हुई भीमा कोरेगांव की हिंसा के मामले में पुलिस ने छह जून दिल्ली के मुनिरका से जेएनयू के पूर्व छात्र और सीमीएमएल के रोना जैकब विल्सन को गिरफतार किया। इसी दिन सुधीर ढावले , सुरेंद्र गाडगिल सहित चार और लोगों को गिरफ्तार किया गया था। ढावले को पुलिस ने मुंबई जबकि गाडगिल , शोमा सेन और महेश राउत को नागपुर से गिरफ्तार किया गया था। इसके पहले नक्सलियों से सहयोग करने के जुर्म में सात मार्च 2018 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की एक अदालत दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा , जेएनयू के छात्र हेम मिश्रा , पत्रकार प्रशांत राही समेत पांच लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा सुना चुकी है। कोर्ट ने इन सभी को माओवादियों से संपर्क रखने और भारत के खिलाफ षडयंत्र रचने का दोषी क़रार दिया थे। इसके साथ महेश तिर्की और पांडु नरोटे को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इसी मामले में एक और आरोपी विजय तिर्की को 10 साल की सज़ा सुनाई गई। सबको आतंकवादी समूह या संगठन का सदस्य होने तथा किसी आतंकवादी संगठन को समर्थन देने के अपराध से संबंधित गैर कानूनी गतिविधियां (निवारक) कानून की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया।

बेशक नक्सल विरोधी कार्रवाई तेज हुई है। इससे नक्सली पस्त पड़े हैं। लेकिन यह भी सच है कि शहरी अभिजात्य वर्ग से उनका समर्थन और उन्हें सहयोग जारी है। कई बार यह वर्ग उनकी काली कमाई ने निवेश का माध्यम भी बनता है। इसलिए जरूरी है कि अब इस तबके पर कड़ी निगाह रखी जाय और उनका पर्दाफाश किया जाए।