सोशल मीडिया के युग में सच छिपाना आसान नहीं
   दिनांक 11-जून-2018

कुछ दिन पहले तक विजय माल्या और नीरव मोदी के भागने पर बेहद चिंतित दिखने वाले मीडिया ने अचानक आंख-कान बंद कर लिए हैं। शायद इसलिए कि देश को लूटने वालों की धर-पकड़ का काम अब कांग्रेस नेता अहमद पटेल के दरवाजे तक जा पहुंचा है। मीडिया समूहों में पटेल की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके खिलाफ मुश्किल से कोई नकारात्मक खबर छपती है। चाहे वह सत्ता में हों या सत्ता से बाहर। तमाम बड़े चैनलों, अखबारों में उनकी सिफारिश पर भर्ती पत्रकार निष्पक्षता का मुखौटा लगाकर काम कर रहे हैं। यही वजह है कि अधिकांश चैनलों, अखबारों ने बैंकों के करीब 5,000 करोड़ रुपये हड़प कर बैठे संदेसरा समूह की संपत्ति जब्त होने की खबर नहीं दी, क्योंकि इसमें पटेल के कथित करीबी रिश्तेदार का नाम है।


 

मीडिया का यह वर्ग विजय माल्या व नीरव मोदी की चर्चा सिर्फ केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रम फैलाने के लिए करता है। मुंबई में आयकर विभाग के दफ्तर में आग लगने पर द ट्रिब्यून समेत कई अखबारों व न्यूज पोर्टल ने कहा कि नीरव मोदी व मेहुल चोकसी के खिलाफ जांच की सारी फाइलें जल गईं, जबकि उस दफ्तर का इन मामलों से कोई वास्ता नहीं था।क्या इन पत्रकारों से यह पूछा नहीं जाना चाहिए कि उन्होंने किसके इशारे पर झूठ फैलाने का प्रयास किया? बंगाल में भाजपा समर्थकों की हत्या पर दर्शकों के दबाव में थोड़ी-बहुत खबरें दिखानी पड़ीं, पर अब वे इस 'गलती' की यथाशीघ्र भरपाई की कोशिश में है। मीडिया इस इंतजार में है कि छोटा-मोटा नेता ही ममता बनर्जी को लेकर कुछ ऐसा कह दे, जिससे उनके लिए सहानुभूति पैदा करवाई जा सके।

कुछ मीडिया घरानों ने स्थानीय ब्यूरो से ऐसे बयानों पर नजर रखने को कहा है। बांकुरा जिले में भाजपा के स्थानीय पदाधिकारी ने ममता को लेकर थोड़ी तीखी टिप्पणी की तो कई चैनलों, अखबारों, वेबसाइटों पर 'आपत्तिजनक' बताते हुए उसे उछालने की कोशिश की गई। दरअसल, मीडिया का बड़ा वर्ग खबर दिखाने से ज्यादा उन्हें छिपाने के धंधे में है। वे उन्हीं खबरों को दिखाते हैं, जिनसे उनके राजनीतिक आका खुश हों व कारोबारी फायदा हो। बाकी खबरें दबा दी जाती हैं। इसका ताजा उदाहरण हरियाणा के यमुनानगर में कांग्रेस के पूर्व मंत्री के फार्म हाउस में 7 वर्षीय बच्ची से बलात्कार और हत्या का मामला है। जिन चुनिंदा माध्यमों से खबर आई भी तो यह छिपाया गया कि फार्म हाउस किसका है? यही रवैया अखिलेश यादव, मायावती के सरकारी बंगले खाली न करने की खबर पर दिखा। अधिकांश ने खबर छिपाने की पूरी कोशिश की। सच्चाई बाहर आने पर ऐसे दिखाया, मानो उनके साथ ज्यादती हो रही है। दोनों की बेतुकी दलीलों पर भी मीडिया का नजरिया 'सहानुभूतिपूर्ण' रहा। बाद में पता चला कि अखिलेश ने बंगला खाली तो कर दिया, पर अंदर सब कुछ तहस-नहस करके। ज्यादातर चैनलों ने इस बारे में कुछ नहीं बताया। अगले ही दिन नए घर में अखिलेश की क्रिकेट खेलते तस्वीरें कई जगह दिखीं।

बीते हफ्ते अधिकांश चैनलों पर किसानों की कथित हड़ताल से जुड़ी खबरें छाई रहीं। सब्जियां व दूध फेंकने के वीडियो प्रमुखता से छाए रहे। पर यह अधूरी तस्वीर थी। सब्जियां या दूध फेंकने से पहले उन्हें या तो कम कीमत पर किसानों से खरीदा गया था या उनसे छीना गया था, पर मीडिया ने वह नहीं दिखाया। ऐसे कई वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर आए। आंदोलन प्रायोजित था, जिसका किसानों से कोई वास्ता नहीं था। मकसद खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ाना था ताकि सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़काया जा सके। चिंता की बात है कि मीडिया ने सच को सामने लाने के बजाय साजिशकर्ताओं का साथ दिया, पर शायद उन्हें आभास नहीं कि सोशल मीडिया के इस युग में सच छिपाना उतना आसान नहीं रहा।