प्रणब दा ने डा. हेडगेवार ही नहीं बल्कि भगवा ध्वज के सिद्धांत का भी सम्मान किया

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समारोह में हिस्सा लेेना केवल वैचारिक सहृदयता व संवाद स्थापना की स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के पुनर्जन्म के रूप में ही याद नहीं किया जाएगा , बल्कि संभावना बनी है कि इससे देश में अब तक चली आ रही कुछ वैचारिक कुंठाओं के निराकरण की भी भूमिका तैयार होगी।

प्रणब दा ने संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार को भारत का महान सपूत बता कर जहां उनके प्रति वर्जनाओं को तोड़ा वहीं हिंदूराष्ट्र व भगवा ध्वज के प्रति संघ की विचारधारा का सम्मान करते भी दिखे। कुछ लोग इसे अति उत्साह या कुछ और संज्ञा दे सकते हैं परंतु समारोह के दौरान मुखर्जी द्वारा भगवा ध्वज व संघ प्रार्थना के प्रति व्यक्त किया सम्मान अपने आप में बहुत कुछ कहता दिख रहा है। डा. हेडगेवार , हिंदू राष्ट्र के सत्य सनातन सिद्धांत व भगवा ध्वज को लेकर संघ के शैशवकाल से ही विरोधियों ने इतना थूक उछाला कि सचाई का दर्पण ही धूमिल हो गया। हिंदू राष्ट्र का सिद्धांत विविधता में एकता व धर्मनिरपेक्षता विरोधी है और न ही भगवा ध्वज तिरंगे का प्रतिद्वंद्वी परंतु विरोधियों ने अभी तक इनको अनर्थ के रूप में ही पेश किया है।

डा. मुखर्जी ने ध्वजारोहण व संघ प्रार्थना के समय पद्धति अनुसार सम्मान में खड़े हो हिंदू राष्ट्र व भगवा ध्वज के सिद्धांतों को भी सम्मानित किया है। आशा की जानी चाहिए कि इस नई पहल पर राष्ट्रीय चर्चा की शुरूआत होगी और अंतत: सचाई देश के सामने आएगी।

संघ की प्रार्थना में भारत का हिंदू भूमि और यहां के निवासियों का हिंदू राष्ट्र के अंग के रूप में वर्णन है। प्रार्थना की दूसरी पंक्ति में आता है- त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम।अर्थात हे सुखपूर्ण पालन करने वाली , सुखों में वृद्धि करने वाली मातृभूमि जो हिंदू भूमि है मैं तुम्हें नमस्कार करता हूं। इसी तरह प्रार्थना के पहले पहरे की पहली ही पंक्ति में आता है कि- प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्रांगभूता , इमे सादरं त्वां नमामो वयम्।अर्थात हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर! हम हिन्दूराष्ट्र के अंगभूत तुझे सादर प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें अपना शुभाशीर्वाद दें।

संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी ने 1939 में अपनी किताब "नेशनलिस्ट थॉट ऑफ अवर नेशनहुड डिफाइंड " में उन्होंने राष्ट्र को परिभाषित किया। यह राष्ट्र युगों से चली आरही संस्कृति के मूल्यों को धारण करने वाला हिंदू राष्ट्र है। विनायक दामोदर सावरकर उपाख्य वीर सावरकर ने 1937 में कर्णावती (अहमदाबाद) में हिंदू महासभा के 19वें सत्र को संबोधित करते हुए हिंदुत्व व हिंदूराष्ट्र की परिभाषा दी।

आसिंधूसिंधुपर्यता यस्य भारत भूमिका। पितृ भू:पुण्यभूयैश्चैैव सवै हिंदुरितिस्मृत:।।

अर्थात वे सभी लोग हिंदू हैं जो सिंधु नदी से हिंद महासागर तक फैली भारतभूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानते हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जेएस वर्मा ने भी साल 1996 में दी गई अपनी व्यवस्था में कहा कि हिंदुत्व इस धरती पर पांच हजार सालों से चली आ रही जीवन पद्धति का नाम है , इसे किसी विशेष उपासना पद्धति से नहीं जोड़ा जा सकता। हिंदुत्व इस देश में रहने वाले लोगों की नागरिकता का नाम है , लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता व वैचारिक बेईमानी के चलते हिंदुत्व को धर्म तक सीमित कर उसे सांप्रदायिकता का जामा पहनाने की कोशिश हुई। सत्य सनातन हिंदूराष्ट्र की अवधारणा से किसी दूसरी उपासना पद्धति या विचार या संप्रदाय को कहीं कोई खतरा नहीं , बल्कि यह सिद्धांत सभी की सुरक्षा व स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। आशा है कि डा. मुखर्जी की मूक स्वीकृति से हिंदुत्व व हिंदूराष्ट्र को लेकर विदेशियों , वामपंथियों व छद्मधर्मनिरपेक्षता वादियों द्वारा फैलाए गए भ्रम से देश को मुक्ति मिलेगी।

हिंदू राष्ट्र की तरह भगवा ध्वज को लेकर भी बेईमान बौद्धिकता ने खूब झूठ की जुगाली की है। 22 जुलाई , 1947 को संविधान सभा ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता दी और तब से लेकर आज तक कुछ लोग पूरे मामले को भगवा बनाम तिरंगा बना कर पेश करते आ रहे हैं। संघ का विचार रहा है कि तिरंगे का जन्म 1930 में हुआ परंतु उससे पहले भी तो भारत का कोई न कोई राष्ट्रीय ध्वज था। भगवान श्रीराम से लेकर , महाभारत में श्रीकृष्ण-अर्जुन , शकों-कुषाणों के खिलाफ चंद्रगुप्त मौर्य , अलक्षेंद्र (सिकंदर) के खिलाफ पर्वतेश्वर राज (पोरस) , गौरी के खिलाफ पृथ्वीराज , मुगलों के खिलाफ प्रताप और शिवाजी ने इसी भगवा ध्वज के तले युद्ध लड़ा। भगवा ध्वज संघ का अविष्कार नहीं बल्कि देश का प्रतीक है।

संघ तिरंगे का विरोधी नहीं

तिरंगा भारतीयों द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय ध्वज है और वर्तमान में इसे सभी स्वीकार व इसका सम्मान करते हैं। संघ को लेकर सदैव यह साबित करने का प्रयास होता रहा है कि वह तिरंगे का विरोधी है जबकि एतिहासिक सत्य इसके विपरीत है।

संघ स्वयंसेवकों ने फहराए तिरंगे यहीं नहीं तिरंगे के लिए शहीद भी हुए

14 अगस्त , 1947 को पाकिस्तान का जन्म हुआ तो श्रीनगर में पाकिस्तान समर्थकों ने अनेक इमारतों पर पाकिस्तानी झंडे लगा दिए। तब संघ के स्वयंसेवकों ने कुछ ही घंटों के अंदर तीन हजार तिरंगे तैयार करवा कर पूरे श्रीनगर में फहराए और पूरे राज्य का माहौल बदल दिया। 22 नवम्बर ,1952 को युवराज कर्णसिंह के जम्मू आगमन पर शेख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपनी पार्टी के झंडे फहराने की चाल चली तब संघ के स्वयंसेवकों ने तिरंगा फहराए जाने को लेकर सत्याग्रह किया। शेख अब्दुल्ला के इशारे पर पुलिस ने गोली चलाई , जिसमे 15 स्वयंसेवक शहीद हो गए। 2 अगस्त , 1954 को स्वयंसेवकों ने पुणे के संघचालक विनायक आप्टे के नेतृत्व में दादरा और हवेली की बस्तियों पर धावा बोलकर 175 पुर्तगाली सैनिकों को हथियार डालने पर विवश किया और वहां तिरंगा फहरा कर वह प्रदेश केंद्र सरकार के हवाले कर दिया।

1955 के गोवा मुक्ति संघर्ष में संघ के स्वयंसेवकों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसी सत्याग्रह में तिरंगा लहराते हुए सीने पर पुर्तगालियों की गोली खाकर पहला बलिदान देने वाले उज्जैन के स्वयंसेवक राजाभाऊ महांकाल थे। संघ के स्थापना काल से ही देश के इस युगों-युगों से चले आरहे राष्ट्रीय ध्वज भगवा को गुरु के रूप में स्वीकार किया गया जिसके समक्ष स्वयंसेवक प्रतिदिन एकत्र होकर अभ्यास -चिंतन करते हैं। 1927 में संघ में भगवा ध्वज को गुरु की मान्यता दी गई। इसके बीस वर्ष बाद 1947 में तिरंगा राष्ट्र ध्वज बना तब संघ मुख्यालय पर भी तिरंगा फहराया गया। संघ तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज और भगवा ध्वज को गुरू रूप में स्वीकार करता है। अब प्रणब मुखर्जी ने भी भगवा ध्वज व हिंदू राष्ट्र के सिद्धांत को सम्मान देकर इस अनावश्यक विवाद पर विराम लगाने का प्रयास किया लगता है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।