हल्दीघाटी युद्ध: मुगलों के माथे पर लिखी थी इस हार की कहानी
   दिनांक 14-जून-2018
                                                                                                                           के.एस. गुप्ता

हल्दीघाटी, नाथद्वारा से करीब 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। गोगुन्दा और खमनोर की पहाड़ी श्रेणियों के मध्य यह इतनी संकरी घाटी थी कि दो आदमी भी इसमें साथ-साथ नहीं चल सकते थे। एक घोड़े को भी इसे पार करने में दिक्कत आती थी। यहां की मिट्टी के रंग के हल्दी जैसा पीला होने के कारण इस स्थान को हल्दीघाटी कहा गया है। यह स्थान 18 जून, 1576 को प्रताप और मुगलों के मध्य निर्णायक युद्ध के कारण प्रसिद्ध हुआ।
राजा उदयसिंह की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रताप 28 फरवरी, 1572 को मेवाड़ के महाराणा बने। उस समय मेवाड़ की राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न थी। उसके समस्त उपजाऊ भाग पर मुगलों का अधिकार था। प्रताप को मेवाड़ राज्य के कुल क्षेत्रफल का 3 प्रतिशत भाग ही विरासत में मिला था। यह सम्पूर्ण क्षेत्र पहाड़ी इलाका था जहां कृषि उत्पादन आसान नहीं था। अकबर ने 1568 के तुरन्त पश्चात् मेवाड़ के अधीनस्थ हिस्से को अजमेर सूबे का भाग बना चित्तौड़ सरकार बना दी और वहां एक नया प्रशासकीय तंत्र स्थापित कर दिया। इस प्रकार राज्य के लिए परिस्थितियां एकदम प्रतिकूल थीं।
चित्तौड़ धावे के पश्चात् अकबर चित्तौड़गढ़ में तीन दिन ठहरा। इन तीन दिनों में उसने दुर्ग में उपस्थित निर्दोष असैनिक जनता के कत्लेआम का आदेश दिया। माना जाता है कि 30,000 से अधिक स्त्री, पुरुष एवं बालकों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस क्रूरतापूर्ण एवं अमानुषिक कार्य का उद्देश्य शासकों तथा वहां की जनता को आतंकित करना था। अकबर इस अनीति, अन्यायपूर्ण तथा लोमहर्षक कृत्य को भूलना प्रताप के लिए संभव नहीं था। प्रताप को ज्ञात था कि अगर वह ऐसा करता है तो मेवाड़ ही नहीं, अपितु समस्त भारतीय जनता के प्रति अन्याय होगा। इस प्रतिकूल परिस्थिति में समस्त जनमानस की निगाहें प्रताप की ओर टिकी हुई थीं। वही आशा की एक किरण थे।

उधर अकबर की मान्यता थी कि मेवाड़ में अव्यवस्था की स्थिति के बाद भी प्रताप से युद्ध करना आसान नहीं है। अत: उसने मेवाड़ को घेरने की नीति अपनाई। 1572 तक अकबर ने मेवाड़ की उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी सीमा की घेराबन्दी कर दी। अकबर का गुजरात पर अधिकार होने से मेवाड़ की दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर भी मुगल प्रभाव बढ़ गया। अकबर ने प्रताप के भाई जगमाल को जहाजपुर में स्थापित कर दिया तो पूर्वी भाग में स्थित मेवाड़ के हुरड़ा, शाहपुरा, बदनौर आदि को अजमेर की दरगाह को आर्थिक सहायता के रूप में प्रदान किया।

उसने सोचा कि इन समस्त घटनाओं से प्रताप का मनोबल गिरेगा और वह अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश होगा। उसे प्रताप से बिना युद्ध के अधीनता में लाने की संभावना प्रतीत हुई और उसने अपनी ओर से पहल कर समझौते के लिए एक-एक करके एक वर्ष की अवधि में चार शिष्टमंडल इस उद्देश्य से भेजे लेकिन प्रताप ने उन्हें नकार दिया।
मेवाड़ की ओर मुगल सेना
वास्तव में प्रताप की दृढ़ता, साहस, शौर्य और उद्देश्य के प्रति निष्ठा को अकबर समझने में एकदम असफल रहा। प्रताप का मुख्य उद्देश्य किसी भी मूल्य पर स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा करना था तथा साथ ही विश्व के सर्वशक्तिमान शासक से अपनी सार्वभौमिक स्थिति को बनाए रखना था। वह इसे अपना एक ऐतिहासिक दायित्व मानते थे। गत अनेक शताब्दियों से विदेशी आक्रान्ताओं से देश को बचाने में मेवाड़ का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। वह इसको कभी भुला नहीं सकते थे और अकबर की अधीनता स्वीकार कर अपने पूर्वजों की गरिमा को कलंकित नहीं कर सकते थे। इसलिए राणा ने राज्य की रक्षा के लिए तैयारियां प्रारम्भ कर दीं और जनता को पहाड़ी क्षेत्रों में जाने की आज्ञा दे दी। साथ ही मैदानी क्षेत्र नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया ताकि मुगल सैनिकों को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री तथा उनके जानवरों को घास प्राप्त न हो सके।
उन्होंने सभी प्रमुख सामरिक स्थानों की किलाबंदी की।
उधर अकबर जब प्रताप के विरुद्ध की कार्रवाई से सन्तुष्ट हो गया और भारत के अन्य क्षेत्रों से बेफिक्र हो गया तब उसका ध्यान मेवाड़ की ओर गया। वह इसी उद्देश्य से 18 मार्च, 1576 को फतेहपुर सीकरी से अजमेर के लिए रवाना हुआ और अजमेर पहुंच विभिन्न स्तरों पर विचार विमर्श करते हुए मुगल अभियान के नेतृत्व का उत्तरदायित्व मानसिंह को सौंपने की घोषणा की।
मानसिंह को मेवाड़ के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व देने के पीछे दो प्रमुख कारण थे। एक तो प्रताप को अपना सुरक्षित स्थान छोड़ युद्ध के लिए मैदानी क्षेत्र में लाना क्योंकि मुगल सेनाओं को मैदानी युद्ध क्षेत्र में अपनी सफलता की संभावना दिखती थी। किन्तु प्रताप ने युद्ध के लिए उपयुक्त स्थान को छोड़ना उचित न मान मुगल सेना को मेवाड़ के आन्तरिक भाग में आने को बाध्य किया। इस प्रकार मानसिंह को भेजने की निरर्थकता सिद्ध हो गई।

मानसिंह दो मास तक माण्डलगढ़ में ठहरा रहा। यहां विभिन्न स्थानों से मुगल सेनाएं आकर मिलीं और फिर बनास नदी के किनारे-किनारे मोलेला गांव में आकर मानसिंह ने अपना शिविर स्थापित किया। यहां से उसका उद्देश्य कुछ दिनों विश्राम कर स्थिति का जायजा लेते हुए गोगुन्दा पहुंचने का था।
उधर प्रताप अपने गुप्तचरों के माध्यम से मुगल गतिविधियों से बराबर परिचित हो रहे थे। प्रताप ने कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा होते हुए लोसिंग पहुंचकर अपना पड़ाव डाला। इसके पूर्व गोगुन्दा में रणनीति तय करने के लिए युद्ध परिषद् आमंत्रित की गई। मुगल सेना के विरुद्ध किस सामरिक नीति का अनुसरण किया जाए? यहां भी दो स्पष्ट मत थे। नवयुवक वर्ग चाहता था कि मानसिंह से आमने-सामने का युद्ध किया जाए तो दूसरा पक्ष मारो और भागो की नीति जिसे आधुनिक युद्ध रणनीतिकार 'गुरिल्ला' नीति कहते हैं? का पक्षधर था। मुगलों की सैनिक संख्या और उनकी क्षमताओं को देखते हुए अनुभवी व्यक्तियों ने दूसरे पक्ष का समर्थन किया।
इस प्रकार दो स्पष्ट विचारधाराओं के बीच जिस प्रकार प्रताप ने युद्ध नीति का समन्वय किया, वह अत्यधिक आश्चर्यजनक है। प्रताप लोसिंग से रवाना हो हल्दीघाटी के क्षेत्र में पहुंचे और 18 जून, 1576 को प्रात: ही मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध को हल्दीघाटी युद्ध की संज्ञा दी जाती है।

मुगल सेना में भगदड़

बदायूंनी के अनुसार पहाड़ के पश्चिम की ओर से निकल कर मुगलों की अग्रिम पंक्ति पर मेवाड़ सेना ने आक्रमण किया। यह आक्रमण इतना जोरदार था कि अग्रिम पंक्ति पूर्णरूप से पराजित हुई। हरावल में नियुक्त सैयद हाशिम के नेतृत्व वाली सेना पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। लूणकरण के नेतृत्व वाली सेना, जो वामपार्श्व में थी, भेड़ों के झुण्ड के समान भाग खड़ी हुई। वह अपनी जीवन रक्षा के लिए दक्षिणी पार्श्व की तरफ दौड़ी। सेना में अफरा-तफरी मच गई। मुगल व प्रताप के राजपूत सैनिकों के पहनावे के एक जैसा होने से उनमें भेद करना संभव नहीं हो रहा था।
मुगल सैनिक बनास के दूसरे किनारे से 10-15 कि़मी़ तक भागकर अपनी जान बचा पाए। इस प्रकार मुख्य युद्ध खमनोर के पास में हुआ। युद्ध में इतना रक्तपात हुआ कि सारा क्षेत्र रक्तमय हो गया। तभी इस स्थल को रक्त तलाई के नाम से जाना जाता है।
युद्ध की तीव्रता का वर्णन करते हुए अबुल फजल ने लिखा है कि वहां जान सस्ती और इज्जत महंगी हो गयी थी। बदायूंनी ने माना कि रामशाह तंवर ने ऐसी वीरता का प्रदर्शन किया कि जिसका वर्णन करना उसकी लेखन क्षमता से बाहर है। युद्ध में प्रताप और मानसिंह का भी आमना-सामना हुआ और मानसिंह प्रताप के भाले के वार से हाथी के हौदे में छिप जाने की वजह से बच सका। हालांकि उसके हाथी का महावत मारा गया। भागते हाथी को वश में करने के लिए मानसिंह महावत की जगह बैठ गया। हाथी के युद्ध क्षेत्र से भाग जाने से ही मानसिंह सुरक्षित बच पाया।
इस संघर्ष में प्रताप के घोड़े चेतक को भी पैर में चोट आई। प्रताप को मुगल सेना ने घेर लिया। लेकिन प्रताप ने संतुलन बनाए रखा तथा अपनी शक्ति का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। मुगल सेना के बलिष्ठ पठान बहलोल खां ने अपनी पूरी ताकत से प्रताप पर वार किया। प्रताप ने सतर्कता से उस वार को बेकार ही नहीं किया अपितु पलटकर ऐसा वार किया कि बहलोल खां को जिरहबख्तर व घोड़े सहित दो फांक में चीर डाला। प्रताप के हाथियों ने भी मेवाड़ी सेना के अनुरूप कमाल का प्रदर्शन किया जैसा कि अबुल फजल ने माना है कि सैनिक जिस वीरता से लड़े, उसी वीरता का प्रदर्शन हाथियों ने भी किया।

अब मुगल पुन: व्यवस्थित होकर युद्ध करने की तैयारी कर रहे थे, तब प्रताप ने युद्ध को मैदान की बजाय पहाड़ की ओर मोड़ने का प्रयास किया। उनकी सेना के दोनों भाग एकत्रित हो पहाड़ों की ओर मुड़े और अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंचे। उस वक्त तक मुगल सेनाओं को रोके रखने के लिए झाला मान के नेतृत्व में कुछ सैनिकों ने मोर्चा संभाला। झाला मान ने अपना जीवन का उत्सर्ग करके भी अपका उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। उधर मुगल सेना ने डर के कारण प्रताप की सेना का पीछा नहीं किया।
बदायूंनी ने इसके तीन प्रमुख कारण बताए हैं। एक तो प्रचण्ड गर्मी। उसने लिखा कि उस समय ऐसी गर्मी थी कि दिमाग पिघल जाए।
दूसरा कारण मुगल सेनाएं इतनी थक चुकी थी कि उनमें अब लड़ने का साहस व सामर्थ्य नहीं बचा था। तीसरा मुख्य कारण था कि उन्हें इस बात का डर था कि प्रताप की सेना घात लगाए बैठी होगी और पीछा करते हुए अचानक आक्रमण हुआ तो कोई जीवित नहीं बच सकेगा। अत: प्रताप का पीछा करने की बजाय अपने शिविर में लौट जाना ही उन्हें श्रेयस्कर लगा। इस प्रकार हल्दीघाटी का युद्ध दोपहर तक ही समाप्त हो गया। इस बीच राणा पूंजा के नेतृत्व में भीलों ने मुगलों के शिविर पर आक्रमण कर दिया था। सारी खाद्य सामग्री लूट ली।

मुगल सैनिकों को पड़ गए थे खाने के लाले
मुगल शिविर की स्थिति इतनी खराब हो गई कि सैनिकों को खाने के लाले पड़ने लगे। घायल सैनिकों की सेवा सुश्रुषा तथा युद्ध की समीक्षा करने के बजाय उनके लिए जीवित सैनिकों के खाने की चिंता करना आवश्यक हो गया। प्रताप की सेना के भय के कारण शिविर में रात बिताना भी उनके लिए भारी हो गया और इसलिए वे दूसरे दिन प्रात:काल गोगुन्दा के लिए रवाना हो गये।
वहां भी सैनिकों को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। मेवाड़ की सेना के अचानक आक्रमण को रोकने के लिए जगह-जगह आड़ खड़ी की गईं। शिविर के पास दीवारें इतनी ऊंची बनाई गई ताकि घुड़सवार उनको फांद न सके। उनको एक तरह से कैदी जैसा जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ा। प्रताप ने उनके रसद मार्ग को भी काट दिया। सैनिक खाद्य सामग्री के अभाव में अपने जानवरों को मारकर उदरपूर्ति कर रहे थे। इसका असर सैनिकों के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा। गोगुन्दा को खाली करने के अतिरिक्त मुगलों के पास अन्य कोई विकल्प नहीं रहा। जैसे ही मुगलों की सेना गोगुन्दा से हटी, महाराणा ने पुन: गोगुन्दा को अधीन कर लिया। इस प्रकार युद्ध का पटाक्षेप हुआ।

(लेखक मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर में प्रोफेसर व इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे हैं)