महाराणा की मृत्यु पर रोया था अकबर कहा था राणा जीत तेरी ही हुई
   दिनांक 15-जून-2018

महाराणा प्रताप की मृत्यु की सूचना पाकर अकबर की आंखों में भी आंसू आ गए थे। वह स्वयं उनकी बहादुरी की प्रशंसा करता था। एक गोभक्षी बघेरे को स्वयं महाराणा प्रताप ने धनुष द्वारा तीर चलाकर मारा। तीर चलाते समय प्रताप की आंतों में खिंचाव आया, जिसके कारण वे अस्वस्थ हो गए। दो मास की अस्वस्थता के पश्चात उन्होंने देह त्यागकर गोलोकवास किया। उन्होंने गोमाता की रक्षार्थ अपने प्राण समर्पित किए। 

मेवाड़ राजघराने की परम्परा थी कि पिता का स्वर्गवास होने पर युवराज दाहसंस्कार के समय उपस्थित नहीं रहते थे। लेकिन उस प्राचीन परम्परा को तोड़कर उनके पुत्र अमरसिंह ने अन्त्येष्टि क्रिया, जो श्रुति, स्मृति पुराण आदि शास्त्रोक्त विधि से आचार्य सम्मत थी, सम्पन्न की। पितृभक्त अमरसिंह के इस कृत्य को देखकर गुणवानों ने धन्य-धन्य कहा। महाराणा प्रताप का अंतिम संस्कार चावण्ड से 3 कि.मी. दूर बण्डोली ग्राम के पास स्थित केजड़ के तालाब में किया गया। वहां अब पुल बन गया है। वहां मुगल शासकों के वैभवपूर्ण स्मारक से इतर सफेद पत्थर की आठ खंभों वाली एक साधारण छतरी है, जो प्रताप के महान व्यक्तित्व का प्रतीक है। 'महाराणा यश प्रकाश' के अनुसार जब प्रताप की मृत्यु का समाचार (लाहौर में) अकबर के पास पहुंचा, तो वह स्तब्ध और उदास हो गया। उसका यह हाल देखकर दरबारी ताज्जुब में पड़ गए, वहां मौजूद प्रसिद्ध चारण कवि दुरसा आढ़ा ने सम्राट की भावना को ठीक तरह से समझा और उसी समय कहा-

आ लैगो अणदाग,

पाघ लेगो अणनामी,

गौ आड़ा गवड़ाय,

जिको बहतो धुर कामी।

नवरोजे नह गयो,

न गौ आंतसा नवल्ली,

न गौ झरोखा हेठ,

जेठ दुनियाण दहल्ली।

गहलोत राण जीती गयो,

दसाण मूंद रसणा डसी,

नीलाक मूक भरिया नयन,

तो मृत भाह प्रताप सी।।

अर्थात् ''तूने अपने घोडे़ को (शाही) दाग नहीं लगने दिया। अपनी पगड़ी तूने कभी भी किसी के सामने नहीं झुकाई। तू अपने यश के गीत गवा गया। अपने राज्य के धुरे को तू अपने बाएं से चलाता रहा। तू न तो नवरोज में गया और न शाही डेरों में। तू शाही झरोखे के नीचे नहीं गया। तेरी श्रेष्ठता के कारण दुनिया ही दहलती रही। हे प्रतापसिंह! तेरी मृत्यु पर शाह (अकबर) ने दांतों के बीच जीभ दबाई। नि:स्वासें छोड़ीं और आंखों में आंसू भर गए। गहलोत राणा (प्रताप) तेरी ही विजय हुई। तू जीत गया।''

इस प्रकार महाराणा प्रताप ने अपने तपस्वी, वीरव्रती जीवन से केवल मेवाड़ ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व व कृतित्व से पूरे विश्व में हिन्दुत्व का डंका बजाया। इसलिए उनके लिए लिखा गया है -

माई ऐहड़ा पूत जण,

जेहड़ा राणा प्रताप।

अकबर सूतो ओझके,

जाण सिरहाणे सांप।।

भारतवर्ष की प्रत्येक नारी महाराणा प्रताप जैसे यशस्वी पुत्रों को जन्म देकर अपनी कोख सार्थक कर मां भारती को गौरवान्वित करे, और हम सभी महाराणा प्रताप के श्रेष्ठतम जीवन आदर्शों को ऊपने जीवन में आचरण कर जीवन की सार्थकता का अनुभव करें।

(वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति, उदयपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'प्रताप गाथा' से साभार)