मेवाड़ के लिए भामाशाह के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता
   दिनांक 17-जून-2018

18 जून, 1576 को हल्दीघाटी में एक हिंदू क्षत्रिय मानसिंह अपनी और अपने फूफा म्लेच्छ अकबर की सारी सैनिक शक्ति लेकर अपने पिता और पूर्वजों के स्वामी रहे मेवाड़ राजवंश के उत्तराधिकारी हिंदू कुल गौरव महराणा प्रताप को पकड़ कर अकबर का गुलाम बनाने आ खड़ा हुआ था। दूसरी ओर दोनों भाई, भामाशाह और ताराचंद प्रताप के सहयोगी और सजग प्रहरी की तरह महाराणा के पीछे खड़े थे। दोनों भाइयों ने जम कर तलवार के जौहर दिखाए। पहले ही हमले में मुगल सेना तितर-बितर होकर भेड़-बकरियों की तरह बनास नदी के पार भाग खड़ी हुई।
मुगलों को हराया और महाराणा को दिया धन
महाराणाा प्रताप के आदेश से पूरे युद्धकाल मेंन मेवाड़ में खेती-बाड़ी, व्यापार आदि निषिद्ध था, ताकि मुगल सेना को किसी प्रकार से रसद प्राप्त न हो सके। ऐसी स्थिति में मेवाड़ के लिए धन जुटाने हेतु भामाशाह ने युक्ति निकाली और मालवा के मुगल इलाकों में धावे मारने निकल पड़े। उन्होंने रामपुरा, भाणपुरा, मंदसौर, मालपुरा आदि शाही थानों पर धावे मार कर वहां के जागीरदारों शाही थानेदारों से दंड वसूल कर भारी धनराशि एकत्र की। धनराशि लेकर वे चूलियां ग्राम में महाराणा की सेवा में उपस्थित हुए। स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने 25 लाख रुपए की धनराशि, 20,000 अशर्फियां और अन्य युद्ध सामग्री महाराणा को भेंट की। प्रताप ने भावविभोर हो भामाशाह को गले लगा लिया और कहा, ''स्वतंत्रता संग्राम की इस विकट घड़ी में आपका यह सर्वस्व समर्पण अद्भुत है। आपका यह त्याग और देशहित में सर्वस्व समर्पण विश्व कभी भूलेगा नहीं। आपका यश अमर रहेगा।'' भामाशाह के सर्वस्व समर्पण जैसा प्रेरक उदाहरण विश्व में अद्वितीय है। युगों तक नई पीढि़यों को मार्ग दिखाने वाला है।
प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया, उन्हें उसी वक्त मेवाड़ राज्य का प्रधान अर्थात् महामंत्री नियुक्त किया। प्रताप द्वारा अत्यंत सम्मानपूर्वक दिया गया यह पद वंश परंपरा से भामाशाह के उत्तराधिकारियों के ही पास रहा। इस संबंध में एक तत्कालीन कवि द्वारा कहा गया यह दोहा बहुत प्रसिद्ध है-
भामो परधानो करे, रामो कीधो रद्द। मुगलां बाहर करण नूं मिलिया आय मरद्द॥
भामाशाह की आक्रामक नीति
भामाशाह द्वारा समर्पित धनराशि से सेना और सैन्य सामग्री एकत्रित कर अकबर को खदेड़ने की जो योजना प्रताप ने बनाई, उसका प्रारंभ दिवेर से किया गया। अब तक जो रक्षात्मक युद्ध नीति थी, उसके स्थान पर आक्रामक नीति अपना कर अकबर पर आक्रमण किया गया जिससे दुश्मन स्वयं भयभीत हो भाग जाए। महाराणाा प्रताप, कुंवर अमरसिंह और अनेक वीरों सहित भामाशाह और छोटे भाई ताराचंद स्वयं इस अभियान में शामिल हुए। कुंवर अमरसिंह के भाले के एक ही वार से अकबर का चाचा सुल्तान खां भाले सहित जमीन में गड़ गया। मुगल सेना के अनेक योद्धा प्रताप और भामाशाह के हाथों मारे गए। शाही सेना अपने सेनापतियों की ऐसी दुर्दशा देख सिर पर पांव रख भाग खड़ी हुई।
प्रताप का यह विजय अभियान भामाशाह के सहयोग से सारे मेवाड़ से मुगल सेना को खदेड़ कर चावण्ड में सुरक्षित राजधानी स्थापित करने तक जारी रहा। मेवाड़ में एक कहावत बहुत प्रचलित है जिसने इस बात को गलत साबित कर दिया कि राजधानी जीत लिए जाने मात्र से देश जीत लिया गया। युद्ध के समय महाराणा राजधानी छोड़कर सुरक्षित पहाड़ों में चले जाते और वहीं से संघर्ष जारी रखते। अत: कहावत हो गई, 'जठे राणाजी वठेई उदयपुर'
नवनिर्माण और भामाशाह
भामाशाह ने आर्थिक सुदृढ़ता, नवनिर्माण, कृषि का विकास, खदानों आदि के कुशल प्रबंधन से राजस्व बढ़ाने की एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली प्रारंभ की। जावरमाता की खदानों से चांदी प्राप्त कर राजकोष को संपन्न किया गया। राजपरिवार के लिए महलों और कर्मचारियों के लिए भवनों के निर्माण सहित चावण्डा माता का मंदिर और जैन मंदिरों का निर्माण कराया गया।
भामाशाह के प्रधानमंत्रित्व काल में शांति और सुशासन से मेवाड़ की श्रीवृद्धि होेने लगी। लेकिन इसी बीच एक दिन वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। चावण्ड में ही 18 जनवरी, 1597 को महाराणा प्रताप ने इस दुनिया को छोड़ दिया। उनका जाना भामाशाह के लिए अत्यंत दु:खदायी था। उस विषम परिस्थिति में भी भामाशाह ने धैर्य नहीं खोया, उनकी स्वामिभक्ति अविचलित रही।
प्रताप के अंतिम समय में उनके हृदय में था कि मेरी मृत्यु के बाद कहीं संघर्ष के कष्टों से घबरा कर मेरा उत्तराधिकारी अमरसिंह मुगलों के हाथ में मेवाड़ की स्वतंत्रता बेच न दे, तब भामाशाह और अन्य सरदारों ने उनके सम्मुख प्रतिज्ञा ली थी कि हम अपने जीतेजी कभी मेवाड़ को परतंत्र नहीं होने देंगे, हम आपके इस स्वतंत्रता संघर्ष को सदैव कायम रखेंगे, मेवाड़ को सुखी-समृद्ध और शक्तिशाली बनाएंगे। अमरसिंह ने भामाशाह को बचपन से अपने पिता के साथ मेवाड़ के लिए संघर्षरत और अपना सर्वस्व न्योछावर करते देखा था अत: उनके प्रति पूर्ण: विश्वास और अपने पिता की ही तरह उनका सम्मान करते थे। भामाशाह भी अपने समस्त जीवन के अनुभव, बुद्धिबल और सामर्थ्य से मेवाड़ के चहुंमुखी विकास के लिए अपने शेष जीवन के अंतिम क्षण तक लगे रहे। उदयपुर के चारों ओर पर्वत घाटियों की किलाबंदी, किलों की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण, खेती और सिंचाई की सुव्यवस्था, व्यापार वाणिज्य के लिए उचित वातावरण और विश्वास, वनों और खदानों का उचित प्रबंधन कर उन्होंने राजकोष के लिए राजस्व का समुचित प्रबंध किया। मेवाड़ राज्य के प्रधान का पद वंश परंपरा से भामाशाह के उत्तराधिकारियों के पास लंबे काल तक रहा।
11 जनवरी, 1600 को इस विलक्षण महापुरुष ने अपने कर्मशील जीवन की कीर्तिपताका को दानवीरों के श्रेष्ठ यश को आकाश में ऊंचा स्थापित कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। उदयपुर के आहाड़ स्थित राजपरिवार के समाधिस्थल महासतियां में उनकी समाधि (छतरी) आज भी भामाशाह के सम्मान की मौन साक्षी है।