क्यों चुप हैं क​थित बुद्धिजीवी रोना विल्सन की चिट्ठी पर
   दिनांक 19-जून-2018
दुष्ट व्यक्ति प्रत्यपकार से ही शान्त होता है, उपकार से नहीं :कालिदास (कुमारसंभव 2/40)



इस दौर की सबसे सनसनीखेज चिट्ठी सामने आती है— रोना विल्सन की चिट्ठी। इससे पता चलता है कि नक्सली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की फिराक में हैं। लेकिन इस चौंकाऊ चिट्ठी पर चुप्पी ओढ़ ली जाती है और यह रवैया किसी को चौंकाता नहीं। उन्हें हथियार चाहिए, उन्हें पोलित ब्यूरो की अनुमति चाहिए, वे भीमा कोरेगांव के हिसंक आंदोलन की सफलता पर एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं। कुछ ‘करने’ के लिए इशारे का इंतजार कर रहे ये लोग कौन हैं? इन पर चुप्पी ओढ़ने वाले कौन हैं? माओवादी राजनीति का यह घृणित चेहरा ईपीडब्ल्यू जैसी ‘कथित’ प्रतिष्ठित पत्रिका में कैसे लगातार लिखता रहा! कैसे इनकी भी प्रतिष्ठा बनी रही, बौद्धिकता का भी ब्रांड बना रहा। लेकिन ऐसी चिट्ठी आने के बाद बुद्धिजीवियों का एक तथाकथित तबका ऐसा कोई काम नहीं कर रहा जिससे इन दोनों की प्रतिष्ठा पर जरा भी आंच आए। कारण, भ्रम बनाए रखने से ही दोनों की दुकानें चलनी हैं। इससे पहले कोबाद गांधी को हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया और हेम मिश्र को गढ़चिरौली से। रोना विल्सन की गिरफ्तारी दिल्ली से हुई। ये कौन लोग हैं? ये सेंट स्टीफेंस और जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े लोग हैं जो इनके और गढ़चिरौली के बीच ताना-बाना बुनते हैं। इसके पीछे सीताराम येचुरी से लेकर कांग्रेसी नेता तक जुबान को लगाम लगा देते हैं। कांग्रेस की चुप्पी तो और भी शर्मनाक है। उसने राजीव गांधी को ऐसी ही हिंसा के कारण खोया।
छत्तीसगढ़ में उसे अपने पूरे नेतृत्व को खोना पड़ा। फिर भी नक्सल पर वह चुप है? कांग्रेस इन ताकतों के साथ-साथ दक्षिण में उस इस्लामी उन्मादी पीएफआई से हाथ मिलाती दिखती है जो न केवल किसी भी हद तक जाने के लिए कुख्यात है, बल्कि इसके लिए उतावली भी। ऐसे में यह पूरे देश की जिम्मेदारी है कि जो चीजें दबाई जा रही हैं, उन्हें बाहर निकाले, उनकी पड़ताल में उतरे। क्योंकि यह किसी एक की लड़ाई नहीं, पूरे देश की लड़ाई है। जिस समय रोना विल्सन की चिट्ठी सामने आई है, उसी समय अरविंद केजरीवाल एकदम से धरने पर बैठ गए हैं और राहुल गांधी शिकंजी बेचने लगे हैं। इसे मूर्खता नहीं, धूर्तता कहा जाना चाहिए। जिस समय देश को इतने व्यापक हित पर विमर्श करना चाहिए था, उस समय मुद्दे से भटकाने का काम! इसे राजनीति में भी एक हिंसक बंटवारे का संकेतक मानना चाहिए। उन्हें जगाया नहीं जा सकता, क्योंकि वे सोने का स्वांग कर रहे हैं। जगना और जगाना तो इस देश को है, क्योंकि ऐसे लक्षणों का प्रतिकार जितनी जल्दी करें, उतना अच्छा।