कैराना में भाजपा की हार पर फैलाया जा रहा भ्रम
   दिनांक 02-जून-2018

 अजय सेतिया

कैराना को लेकर भ्रम फैला दिया गया है कि यूपी में भाजपा का जादू उतर गया है। भाजपा यूपी हार रही है, तो समझो देश हार रही है। मैं इस अधकचरे विश्लेषण से कतई सहमत नहीं हूं। भाजपा को 46.5 प्रतिशत वोट मिले हैं। साझा विपक्ष को 51.1 प्रतिशत। अब आप 2017 से तुलना करें, जब भाजपा को 38.2 प्रतिशत वोट मिले थे और विपक्ष के कुल बोत 57.2 प्रतिशत थे। यानी भाजपा के वोट बढ़े है और साझा विपक्ष होने के बावजूद भाजपा विरोधी वोट घट गई। यानी 19 फीसदी का अंतर घटा कर भाजपा सिर्फ साढ़े 4 प्रतिशत पर ले आई है, इसका मतलब यह हुआ कि विपक्ष के एकजुट होने पर उस का 8 प्रतिशत वोट भाजपा की तरफ चला गया है।
 

फिर यह भी जान लीजिए कि वोटिंग सिर्फ 59 प्रतिशत हुई, जबकि आम चुनाव में 77 प्रतिशत तक हुई थी। क्योंकि उपचुनावों में वोटरों की दिलचस्पी बहुत कम होती है, इस लिए वोटिंग कम हुई। भाजपा के मुकाबले साझा विपक्ष ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारी थी, जिनके इस लोकसभा सीट पर करीब 40 प्रतिशत वोट हैं। मुसलमानों ने जी जान की बाजी लगा कर चुनाव लड़ा, मुसलमानों की वोटिंग प्रतिशत वैसे भी हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा रहती है, यहां तो प्रतिष्ठा का सवाल बना कर चुनाव लड़ा गया था। इस के बावजूद जीत सिर्फ 50 हजार वोट से हुई है।

आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 59 प्रतिशत वोटिंग किस समुदाय की लापरवाही से हुई है। लोकसभा के आम चुनाव के वक्त कैराना की प्रतिक्रिया भाजपा का वोट प्रतिशत और बढ़ा देगी। मेरा आकलन है कि आम चुनाव में कैराना ही बदल जाएगा। बाकी प्रदेश पर भी विपक्ष के एकजुट होने का विपरीत असर होगा। 2014 और 2017 के मुकाबले समूचे विपक्ष और भाजपा के वोट बैंक का अंतर अब बहुत कम रह गया है।