इस्लाम में संवाद नाम की कोई चीज नहीं
   दिनांक 02-जून-2018
हर साल चर्च से पैसा लेकर देश भर में डॉक्टर आंबेडकर की तस्वीर की तख्ती लटकाकर हजारों लोग मनुस्मृति को जलाते हैं। सोचिए यदि किसी दिन ऐसा ही आयोजन कुरआन को जलाने का हो तो इस देश में क्या आलम होगा?

आज जब इस्लाम पर लिखे एक पोस्ट पर एक प्रिय मित्र की कड़ी प्रतिक्रिया आई तो तीन बातें मैंने सोची। पहली इग्नोर कर दूंं। दूसरी मित्र को अन्फ्रेन्ड कर दूं, क्योंकि उसके दुख की वजह नहीं बनना चाहता। वह मेरे सबसे प्रिय मित्रों में से एक जो हैै। तीसरा उसके लिखे का सामना करूं और जवाब देने का प्रयास करूं...
''दिलों की उलझनें बढ़ती रहेंगी । अगर कुछ मशवरे बाहम न होंगे।'' ऐसा ही कुछ शेर था एक। इसकी आप व्याख्या कीजिए, मैं बात राजा राम मोहन राय से शुरू करता हूं। सती प्रथा यदि इस्लाम के अंदर की कोई कुरीति होती तो राय साहेब के पापा भी खत्म नहीं करवा पाते। यकीन से कह रहा हूं। वैसे राय साहेब को लेकर कई उत्तर प्रदेश के मित्रों को भ्रम रहता है कि वे भूमिहार थे, जबकि वे कन्वर्टेड क्रिश्चियन थे। उनके क्रिश्चियन होने की बात पूरे हिन्दू समाज ने स्वीकार की। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि हिन्दू समाज हमेशा से संवाद में यकीन रखता रहा है। हर साल चर्च से पैसा लेकर देश भर में डॉक्टर आंबेडकर की तस्वीर की तख्ती लटकाकर हजारों लोग मनुस्मृति को जलाते हैं। सोचिए यदि किसी दिन ऐसा ही आयोजन कुरआन को जलाने का हो तो इस देश में क्या आलम होगा?
मैं अपने मित्र की तकलीफ को समझ सकता हूं। वैसे भी वह सहिष्णुओं के समूह से नहीं है ना! जिसे एक हिन्दू होने के नाते हम जैसे लोग संकोच में सहिष्णुता कहते हैं, संभव है कि उसकी नजर में वह कायरता ही हो। वर्ना जिसे करोड़ों हिन्दू मां कहते हैं, उसे वेश्या कहकर कुछ बुद्धिजीवी बने फिरते और हम सहिष्णु हिन्दू कहलाने वाले समाज के लोग शां​ति—शांति का जाप करते रह जाते? ऐसा भी होता है क्या? वेश्या के बच्चों को भी इंसानियत के नाते, नहीं कहा जाता कि ''तुम वेश्या के बच्चे हो।'' फिर यह कौन से ज्ञानी लोग हैं जो यह सब साबित करते हुए अपनी पीठ थपथपाते रहे।
मुझे इस मुल्क के मुसलमानों से शिकायत है, खुद को मुसलमान कहने वाला एक नीच पेंटर जिसका नाम मकबूल फिदा हुसैन था, उसने देवी सरस्वती की न्यूड पेंटिंग बना दी और 20 करोड़ की आबादी वाले मुसलमान समुदाय में गंगा—जमुनी का दम भरने वाला एक मुसलमान सामने नहीं आया कहने के लिए मकबूल को इस गुनाह के बाद तुझे जहन्नूम में भी जगह नहीं मिलेगी। उसकी आलोचना तो दूर शबाना आजमी और जावेद अख्तर तो उसके पक्ष में अभियान चला रहे थे।
वास्तव में यही कट्ठमुल्ला—कम्युनिस्ट और क्रिप्टों क्रिश्चियन का वह नेक्सस है जिसकी पहचान करनी है। उस पहचान का सिलसिला चल ही रहा था कि इस बीच में मेरा प्रिय भाई बौखलाहट के साथ सामने आ गया। जबकि इस पूरे सीरीज में वह मेरे जेहन में कहीं नहीं है। लेकिन उसके अंदर का 'मुसलमान' बार—बार जाग जाता है। उसकी पीड़ा को मैं अपनी पीड़ा से समझ सकता हूं।
बहरहाल इस्लाम पर कम बातचीत होती है। वहां संवाद के लिए स्पेस नहीं है। मेरी कोशिश है कि संवाद के लिए उस स्पेस की तलाश करूं। इरान के एक इस्लामिक स्कॉलर ने कहा है कि ''इस्लाम पर सबसे अधिक ईमानदार चर्चा पूरी दुनिया में कहीं हो सकती है तो वह जमीन हिन्दुस्तान की ही होगी।'' यदि आप खुद को मोहम्मद का वारिस मानते हैं तो संयम बनाए रखिए। एक बात और रमजान के मुकद्दस महीने में जो भी मुसलमान मित्र इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं— उन सबसे मेरा आग्रह है कि उन्हें लगता है कि इस्लाम को लेकर मुझसे कुछ पढ़ना रह गया है। तो सोशल मीडिया की दोस्ती के नाते थोड़े पैसे खर्च करें और वह किताब उपलब्ध कराएं। यदि पुस्तक पीडीएफ में उपलब्ध हो सकती है या किसी लेख का लिंक आप साझा करना चाहे तो जरूर कीजिए। यकिन दिलाता हूं, मैं वह सब पढ़ने और देखने को तैयार हूं जो आप उपलब्ध कराएंगे। निवेदन है कि जो मुझे भेज रहे हैं, पहले उसे आप खुद पढ़ या देख जरूर लें। अंत में विनम्र प्रार्थना है कि इस चर्चा को रोकने को ना कहिएगा। इसे जारी रखिए। यह प्रारम्भिक दौर है इसलिए आलोचना अधिक है। आने वाले समय में इस्लाम के उज्ज्वल पक्ष पर भी चर्चा करूंगा। भरोसा रखिए।
(आशीष जी के वॉल से साभार)