जम्मू-कश्मीर में रमजान के बाद जरूरी था आर-पार का फैसला
   दिनांक 20-जून-2018

 आशुतोष भटनागर

जम्मूकश्मीर पीडीपी से भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया। पीडीपी के साथ जब भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई थी तो मुफ्ती मुहम्मद सईद के शपथ ग्रहण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं शामिल हुए थे, लेकिन मुफ्ती ने अपनी जीत के लिये पाकिस्तान और आतंकियों का आभार जता कर अपने मंसूबे साफ कर दिए थे। महबूबा भी पाकिस्तान की वकालत करने लगीं हैं यहीं नहीं वह स्वयं ही बोल चुकी हैं कि हम एक मकसद के तहत सरकार चला रहे थे।
 

जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी की गठबंधन सरकार भाजपा द्वारा समर्थन वापसी की घोषणा के साथ ही गिर गई। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंप दिया। राज्यपाल ने अन्य दलों द्वारा सरकार गठन का दावा करने से इंकार कर राज्यपाल शासन की सिफारिश केन्द्र को भेज दी।

भाजपा महासचिव राममाधव ने 19 जून को दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में गठबंधन से बाहर होने संबंधी निर्णय की जानकारी दी। उन्होंने कहा, ‘राज्य में गठबंधन सरकार में बने रहना भाजपा बीजेपी के लिए मुश्किल हो गया था।'

महबूबा मुफ्ती कश्मीर के हालात नहीं सुधार पाईं राज्य में लगातार आतंकवादी घटनाएं और पत्थरबाज़ी हो रही थी, पाकिस्तान के पक्ष में नार लग रहे थे। सेना के जवान भी शहीद हो रहे थे। केन्द्र सरकार जो कड़े कदम उठाना चाहती थी उसके लिये जरूरी प्रशासनिक सहयोग स्थानीय स्तर पर नहीं मिल पा रहा था। महबूबा एकतरफा संघर्षविराम को जारी रखने पर आमादा थीं जबकि 28 जून से प्रारंभ होने वाली अमरनाथ यात्रा पर हमले की संभावनाओं के चलते केन्द्र सरकार यह खतरा मोल नहीं ले सकती थी।

नहीं रूक रहे थे देश विरोधी नारे

रमजान समाप्त होने से पहले ही वह स्थिति आ गयी जब आर-पार का फैसला करना जरूरी दिखने लगा। सुरक्षा बल के एक जवान औरंगजेब का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी गयी। ईद से ठीक एक दिन पहले उसका गोलियों से छलनी शव मिला। इसी दिन शाम को घाटी के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की उनके दो अंगरक्षकों सहित हत्या कर दी गयी। ईद की नमाज के समय श्रीनगर की प्रमुख मस्जिद में न केवल भारत विरोधी नारेबाजी हुई बल्कि पाकिस्तान के साथ-साथ आईएसआईएस का झंडा भी फहराया। स्‍थानीय प्रशासन ने न तो इसे रोकने का प्रयास किया और न ही देश विरोधी गतिविधि करने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई की गई। ऐसी तमाम परिस्थितियां थी जिनके के कारण वहां गठबंधन से समर्थन वापस लेना जरूरी हो गया था।

आतंवादियों के सफाए में पीडपी अटका रही थी रोड़े

रमज़ान के बाद कश्मीर में ऑपरेशन पर लगी एकतरफा रोक को हटा कर ऑपरेशन ऑल आउट को किसी नतीजे तक पहुंचाने की कोशिश में पीडीपी अड़ंगे लगा रही थी। बीच-बीच में अफस्पा (AFSPA) हटाने जैसे शिगूफे भी पीडीपी की ओर से उछाले जाते रहे।

जम्मू और लद्दाख के लोगों से हो रहा था भेदभाव

महबूबा की कश्मीर केन्द्रित नीति के चलते कश्मीर की अपेक्षा जम्मू और लद्दाख के लोगों से भेदभाव किया जा रहा था। तमाम कोशिशों के बाद भी केन्द्र द्वारा जम्मू कश्मीर को दिये गये पैकेज के 80 हजार करोड़ रूपये में से केवल 22 प्रतिशत ही खर्च हो सका। ऐसी स्थिति में गठबंधन का मूल उद्देश्य ही निरर्थक होता दिखाई दे रहा था।