फर्जी खबरों का चलन खतरनाक

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तथ्यहीन खबरों को अनावश्यक तूल देना और सच पर सवाल उठाना सेकुलर मीडिया की पुरानी आदत। सामयिक मुद्दों पर मीडिया के रुख और रुखाई की परतें खंगालता यह स्तंभ समर्पित है विश्व के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद के नाम। मीडिया में वरिष्ठ पदों पर बैठे, भीतर तक की खबर रखने वाले पत्रकार इस स्तंभ के लिए अज्ञात रहकर योगदान करते हैं और इसके बदले उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता

बीते कुछ समय से सेना निशाने पर है। किसी बाहरी दुश्मन के नहीं, बल्कि उस मीडिया के जो खुद को प्रगतिशील और स्वतंत्र होने का दावा करता है। इकोनॉमिक टाइम्स ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें दावा किया गया कि सेना के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वह जवानों को वर्दी दे सके। देखते ही देखते तमाम जगह यह समाचार छा गया। राहुल से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं ने इस रिपोर्ट को हथियार बना केंद्र सरकार को सवालों के दायरे में खड़ा कर दिया। जबकि वह मनगढ़ंत समाचार यानी ‘फेक न्यूज’ था जिसे संभवत: पैसे देकर छपवाया गया था। इस पर जिस तरह की त्वरित प्रतिक्रिया देखने को मिली, उससे आसानी से समझा जा सकता है कि इसके पीछे किसका हाथ रहा होगा। रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर स्थिति स्पष्ट करने के बावजूद कई मीडिया संस्थानों ने आज भी यह फर्जी रिपोर्ट अपनी वेबसाइट से नहीं हटाई है।

सेना के खिलाफ ऐसी बेसिरपैर की खबरों का चलन बीते कुछ साल में बढ़ा है। कुछ माह पहले कश्मीर में एक पत्थरबाज को जीप से बांधकर घुमाने वाले मेजर गोगोई के चरित्रहनन की कोशिशें हुई थीं और उसमें भी दिल्ली का मीडिया सक्रिय भूमिका में था। पिछले ही महीने इंडिया टुडे ने कवर पेज पर खाली जेब दिखाते एक सैनिक की तस्वीर छापी थी। उस अंक में अधकचरी जानकारी और अधूरे आंकड़ों के आधार पर यह साबित किया गया था कि देश की सेना कंगाल हो चुकी है कि इनके पीछे उन्हीं शक्तियों का हाथ है जो 2014 से पहले तक हर हथियार सौदों में दलाली के तौर पर मोटी रकम पाया करती थीं।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संघ के मुख्यालय में जाना चर्चा का विषय बना रहा। लेकिन एक सकारात्मक पहल को जितने नकारात्मक तरीके से दिखाया गया वह हैरान करता है। कई चैनलों ने राष्ट्रहित की चाहने वालों के आपसी संवाद के इस अवसर को भी राजनीतिक तू तू-मैं मैं में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तब तो हद हो गई जब अगले ही दिन प्रणब दा की एक फोटोशॉप तस्वीर को चैनलों ने खूब तूल दिया। आजतक समेत कई चैनल ऐसे जता रहे थे मानो वह फर्जी फोटो संघ ने बनवाई हो। जबकि उसके पीछे की सारी कहानी स्पष्ट हो चुकी थी।

उधर महाराष्ट्र पुलिस ने प्रधानमंत्री की हत्या के षड्यंत्र का भंडाफोड़ किया। जैसे ही पता चला कि इसमें कुछ शहरी नक्सली भी शामिल हैं, मीडिया में एक अजीब सा मौन छा गया। टाइम्स नाऊ और एकाध चैनलों को छोड़ दें तो बाकी ने मानो कान में तेल डाल लिया। जिन्होंने दिखाया, उन्होंने भी इसे लेकर विपक्षी पार्टियों की विचित्र प्रतिक्रियाओं को ही महत्व दिया। एक लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश पर मीडिया का ऐसा रवैया चिंताजनक है।

सपा के मुखिया अखिलेश यादव की करतूतें बीते हफ्ते मुख्यधारा से लेकर सोशल मीडिया तक छाई रहीं। अपने सरकारी बंगले को उन्होंने जिस तरह से उजाड़ कर छोड़ा, उससे आम लोगों में नाराजगी देखने को मिली। मीडिया ने इसे दिखाया लेकिन लखनऊ के कुछ चिरपरिचित ‘बड़े पत्रकारों’ ने इस खबर से खुद को दूर रखा। इधर, दिल्ली में मुख्यमंत्री केजरीवाल के इशारों पर मीडिया का नृत्य अब भी जारी है। केजरीवाल ने कहा कि वे उपराज्यपाल निवास में आईएएस अफसरों की हड़ताल के खिलाफ धरने पर बैठ रहे हैं तो मीडिया ने बिना जांचे-परखे इसे दोहराना शुरू कर दिया। पता चला कि अफसर नियमित रूप से दफ्तर जा रहे हैं, कोई हड़ताल ही नहीं चल रही। एक नेता के इशारे पर यह मीडिया अगर ‘आईएएस अफसरों की हड़ताल’ की झूठी खबर फैला सकता है तो सोचने वाली बात है कि अंदरखाने और क्या-क्या चल रहा होगा।