‘कश्मीर का एजेंडा देश के एजेंडे से अलग नहीं हो सकता’
   दिनांक 22-जून-2018

जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन का टूटना सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि उस सपने का सचाई से सामना है, जो दोनों दलों ने मिलकर देखा था। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का बयान कि वह तो अपना एजेंडापूरा करने में लगी थीं, ने बता दिया कि कसक कहां थी, कसर कहां थी और किसने किसको धोखा दिया ? मन की बात लंबे समय से मन में दबाए भाजपा समर्थक जहां इस फैसले से खुश और राहत में नजर आते हैं, वहीं पीडीपी समर्थकों के लिए यह टीस और झुंझलाहट का सबब है, क्योंकि फैसला कुछ ऐसा होगा, इसका अंदेशा सबको था। लेकिन समय यह होगा, इसका जरा भी अंदाजा किसी को नहीं था। जम्मू-कश्मीर की ताजा परिस्थितियों और देश में आन्तरिक सुरक्षा से जुड़े पिछड़े क्षेत्रों में माओवाद, शहरी नक्सलियों की समस्या और पूर्वोत्तर भारत की स्थितियों पर देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से विस्तृत बात की पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर एवं संवाददाता अश्वनी मिश्र ने। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश:-

 

-ताजा परिस्थितियों में एक तीखा सवाल जो सतह पर है कि सरकार और प्रशासन पंथ निरपेक्ष माना जाता है। फिर कश्मीर में रमजान में आतंक निरोधी अभियान को रोकने का फैसला क्यों?

इसमें कहीं दो मत नहीं है, हमारी सरकार पंथ निरपेक्ष है। लेकिन जहां तक कश्मीर घाटी का सवाल है तो लगभग 34-35 वर्षों से वहां स्थिति आसामान्य बनी हुई है। कुछ देश की ताकतें और पड़ोसी देश पाकिस्तानी की ओर से होने वाली अराजक गतिविधियों के कारण वहां अस्थिरिता बनी रहती है। लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि इन चार वर्षों में पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ करने की भरपूर कोशिश हुई हैं, लेकिन बहुत ही मुस्तैदी के साथ हमारी सेना और सुरक्षाबलों ने बड़ी संख्या में आतंकियों का सफाया किया। जैसा कि आपने कहा कि रमजान के महीने में सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन का निर्णय लेना (इसे सीज फायर न कहा जाए) कहां तक सही! तो देश को मैं बताना चाहता हूं कि कई बार आतंकी मुठभेड़ में आम नागरिक भी हताहत होते हैं। स्वाभाविक है इससे हलचल बनी रहती है। हमें जनसामान्य का भी सहयोग प्राप्त करना है और उनकी सुविधा/ असुविधा का ध्यान रखना है। इसलिए हम लोगों ने निर्णय लिया था कि रमजान जो कि यहां के लोगों के लिए बड़ा ही पवित्र महीना होता है। ऐसे में कश्मीर के आम नागरिक को कोई असुविधा न हो, इसलिए फैसला लिया। क्योंकि कश्मीर और कश्मीर के लोग हमारे हैं, फिर वह कोई भी मत-पंथ के क्यों न हों! देश के लोगों को समझना चाहिए कि यह फैसला पाकिस्तान और आतंकियों को रियायत देने का नहीं था, सिर्फ घाटी के आम नागरिकों को कोई असुविधा न हो, इसलिए लिया गया था।

लेकिन तथ्य देखें तो कश्मीर में आतंकी घटनाओं से लेकर पत्थरबाजी में कमी नहीं आई है। देश का आक्रोश इस बात पर है कि जब विकट परिस्थिति में सुरक्षाकर्मी पत्थरबाजों से मोर्चा लेते हुए अपने कार्य का निर्वाह करते हैं तो उनके साहस का सम्मान करने के बजाए उनके खिलाफ मुकदमा पंजीकृत किया जाता है?

देखिए, जिस घटना का आप उल्लेख कर रहे हैं, उसकी जैसे ही मुझे जानकारी हुई मैंने तत्काल इसका संज्ञान लिया और तुरंत मुख्यमंत्री महबूबा से बात की। मैं यहां सब बातों का खुलासा नहीं करना चाहूंगा। बस इतना ही कहना चाहूंगा कि उन्होंने तब कहा था कि चीजें सकारात्मक होंगी।

कश्मीर में जब भी कोई मुदद तूल पकड़ता था तो सरकार के आलोचकों के पसंदीदा बोल थे कि भाजपा महबूबा सरकार के दबाव में काम कर रही है। आज की स्थितियों में आप इस पर क्या कहेंगे ?

इस समय मोदी जी के नेतृत्व में जो सरकार है वह किसी से दबने वाली सरकार नहीं है। यह सरकार हर निर्णय लेने में सक्षम है और ताकतवर है। यह समझ केवल भारत ही नहीं विश्व में भी विकसित हुई है। इसलिए ऐसी बातें निरर्थक हैं। फिर भी यदि किसी को इस बात का भ्रम रहा होगा तो निश्चित ही ताजा घटनाक्रम के बाद वह भ्रम छंट गया होगा।

... यह ताकत कश्मीर के मामले मे निर्णायक साबित होगी?

बिल्कुल होगी। मैं दावे के साथ कहता हूं।

-कब तक होगी?

अब मैं समय नहीं बता सकता। लेकिन देश के लोगों को निश्चित रूप से अच्छा देखने को मिलेगा और अच्छी खबरें सुनने को जरूर मिलेंगी। इसलिए मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं। और मैं यह भी कह सकता हूं कि घाटी में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो चाहते हैं कि यहां सुख-शांति स्थापित हो। कुछ असहज करने वाले तत्व हैं, उनसे हम अपने स्तर से निपट रहे हैं।

... और कश्मीर के मामले में पीडीपी-भाजपा के अलग-अलग एजेंडे की बात?

एक बात नोट कर लिजिए, कश्मीर का एजेंडा देश के एजेंडे से अलग नहीं हो सकता।

-कश्मीरी हिन्दुओं की घर वापसी का मुद्दा लंबे समय से अटका पड़ा है। चार साल बाद भी इस मुद्दे पर एक चुप्पी जैसी दिखाई देती है?

देखिए, चुप्पी नहीं है। मैं इसमें स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि राज्य सरकार को इसमें बड़ी भूमिका निभानी है। जब मुफ्ती जी मुख्यमंत्री बने थे और पहली बार वे मुुझसे मिलने के लिए आए थे, तब बातचीत के क्रम में मेरी ओर से जो पहला सवाल था वह कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का था। उन्होंने इस पर कहा कि बहुत से लोग जाना ही नहीं चाहते हैं। तब मैंने कहा कि जो भी जाना चाहें उनके लिए भूमि चिह्नित कर लेनी चाहिए। मैंने 500 करोड़ रुपए देने का भी वादा किया था। इसके अलावा भवन बनाने के लिए जो भी धन की जरूरत होगी वह भी उपलब्ध कराएंगे। बीच में भूमि भी चिह्नित कर ली थी। लेकिन बाद में उन्होंने बताया कि इसमें कुछ समस्या आ गई थी और कहा कि इस मामले के लिए मुझे थोड़ा और समय चाहिए। अभी के घाटी के दौरे के पहले दौरे में मैंने फिर से राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री से कहा कि इस मामले में पहले से काफी देर हो चुकी है,इसलिए इस काम को जितनी जल्दी हो करिए। क्योंकि आप जानते हैं कि अंततोगत्वा भूमि अधिग्रहण की जिम्मेदारी राज्य सरकार को ही निभानी है और निर्माण संबंधी कार्य भी उसके द्वारा ही किया जाना है।

(पूरा साक्षात्कार पढ़ने के लिए देखें पाञ्चजन्य का आगामी अंक)