मीडिया निभाए जिम्मेदारी न दे धोखा

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राजनीति और राजनेताओं की छान-फटक तो मीडिया हर दिन पूरी दिलचस्पी से करता है किन्तु मीडिया के भीतर सरोकारों को छोड़ने, खबरों को तोड़ने, झूठ का पुट जोड़ने और खबर को मनमानी दिशा में मोड़ने का संज्ञान कौन लेगा ?

जब किसी के बारे में लिखो तो यह समझकर लिखो कि वह तुम्हारे सामने ही बैठा है और तुमसे जवाब तलब कर सकता है।

—गणेशशंकर विद्यार्थी (पत्रकारिता के अनुभव, पृ. 28)

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से भाजपा की समर्थन वापसी एक बड़ी राजनैतिक घटना है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती कह चुकी हैं कि गठबंधन में रहकर पीडीपी अपना ‘एजेंडा’ पूरा कर रही थी। ऐसे में यह सवाल ही बेमानी है कि किसने, किसको धोखा दिया। पीडीपी ने जिस ‘एजेंडा’ की बात अब कही है, जम्मू से लद्दाख (और निश्चित ही श्रीनगर भी) तक वह लोगों की जुबान पर पहले से था। जाहिर है, पूरे राज्य की जनाकांक्षाओं को कुचलकर किसी सीमित, संकीर्ण और देशहित को ताक पर रखने वाले एजेंडे को आगे बढ़ाना राज्य के लोगों की भावनाओं से छल ही था। इस छल से पैदा गुबार को कभी तो निकलना ही था। ऐसे में समर्थन वापसी के रूप में, अंदर-अंदर खदबदाते इस रोष के फूट निकलने को राज्य की जनता के लिए अच्छा ही कहा जाएगा।

यह इस बात— कि सामाजिक उद्वेलनों और जनाकांक्षाओं को ताक पर धरकर राजनीति नहीं की जा का सकती— का स्वस्थ लोकतांत्रिक संकेत है। किन्तु जिस लोकतंत्र के चार स्तंभ कहे जाते हैं, वहां केवल राजनीति पर ही प्रश्न क्यों खड़े किए जाएं! लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका से इतर कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया भी क्या समाज की इच्छाओं से हटकर या उन्हें उलटते हुए चल सकते हैं! संभव ही नहीं। यह अस्वीकार्य है। यदि ऐसा होता है तो इस पर भी सवाल उठने चाहिए। हैरान न हों..उठ भी रहे हैं! घाटी में पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या अनाम आतंकियों का निंदनीय कृत्य थी। घटना की भर्त्सना और मामले की व्यापक जांच स्वाभाविक तौर पर सभी चाहते ही हैं। किन्तु जब एडीटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया ने इस पर रोष जताने के अलावा मामला गर्माने वालों के इंटरनेट ब्यौरे खंगाले जाने, आईपी पते तलाशने की मांग की तो सोशल मीडिया ने मुख्यधारा कहलाने वाले मीडिया और एडीटर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं की ‘छंटी हुई संवेदनशीलता’ पर सवाल उठाना शुरू किया। पूछा गया:

— मीडिया के तौर पर आप इतने ‘सिलेक्टिव’ कैसे हो सकते हैं?

— किसी मामले में आईपी पते खंगालने की मांग एडीटर्स गिल्ड ने पिछली बार कब उठाई थी?

— क्या गौरी लंकेश हत्याकांड को कुत्सित ढंग से घुमाने, हत्या के फौरन बाद ही भाजपा और संघ को निशाने पर लेने और प्रेस क्लब पर ‘अभिव्यक्ति की हत्या’ की झूठी डुगडुगी बजाने वालों की जांच और मुश्कें कसने के लिए भी संपादकों की यह संस्था इतनी ही गंभीर थी (या है)!

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर के मामले में पीडीपी के रुख और घटनाओं की रिपोर्टिंग और मामलों के आकलन को लेकर मीडिया की खिंचाई जन अदालत में जारी है। जन सरोकारों पर दोहरा रुख सरकार को जितना लांछित करता है, मीडिया को भी उससे कम आघात नहीं पहुंचाता। राजनीति और राजनेताओं की छान-फटक तो मीडिया हर दिन पूरी दिलचस्पी से करता है किन्तु मीडिया के भीतर सरोकारों को छोड़ने, खबरों को तोड़ने, झूठ का पुट जोड़ने और खबर को मनमानी दिशा में मोड़ने का संज्ञान कौन लेगा? यह सरकार का काम नहीं, और जनता के पास इसका तंत्र नहीं, ऐसे में यह काम खुद मीडिया को ही करना है। देश के सबसे पुराने हिंदी साप्ताहिकों में गिने जाने वाले ‘पाञ्चजन्य’ ने इस दिशा में एक छोटी-सी पहल देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान, ‘भारतीय जन संचार संस्थान’ और दून विश्वविद्यालय के छात्रों को साथ लेते हुए की है। इस काम में किसी की आलोचना या नाहक छीछालेदर का हमारा रत्तीभर उद्देश्य नहीं है। हमने यह काम इस देश के मीडिया और अंतत: लोकतंत्र के घटक के तौर पर अपनी भूमिका निबाहते हुए किया है। यह पत्रकारों की आने वाली पीढ़ी द्वारा पिछली पीढ़ी के निर्देशन में किया गया है। हमने यह काम इसलिए किया, क्योंकि हमें लगा कि यह काम हमें करना चाहिए। हमने यह किया क्योंकि साख की कश्ती में एक छोटा-सा सुराख सफर को मझधार में तमाम कर सकता है, और साख से जुड़ा यह छोटा-सा सूत्र लोकतंत्र के चारों खंभों पर समान रूप से लागू होता है।

( झूठी खबरों के भ्रमजाल पर पाञ्चजन्य की विशेष कवरेज, रोजाना पढ़ें एक नई स्टोरी )