झूठ के बल पर बिहार में जीता था महागठबंधन
   दिनांक 25-जून-2018
विधानसभा चुनाव के दौरान आरक्षण के मुद्दे पर भ्रम फैलाने का काम सबसे पहले लालू प्रसाद ने किया और राजद को इसका भारी फायदा भी मिला
 सच्चिदानंद
 
बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव होने वाले थे। चुनाव के मैदान में एक तरफ महागठबंधन था तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी। बिहार में अक्सर राजनीति जाति को लेकर होती है। उस चुनाव में भी लोगों के बीच यह हवा बनाई गई कि भाजपा उच्च जाति की पार्टी है और उच्च जाति वाले हमेशा आरक्षण का विरोध करते हैं। चुनाव के दौरान ही पुराने और देश के प्रतिष्ठित हिंदी साप्ताहिक पाञ्चजन्य के 27 सितंबर, 2015 के अंक में रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने आरक्षण पर अपने विचार व्यक्त किए थे। लेकिन महागठबंधन के नेताओं ने उनके बयान को तोड़-मरोड़कर भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल किया। उन्होंने सीधे-सीधे यह कहा कि भाजपा आरक्षण हटाना चाहती है जो कि सरासर गलत था। लेकिन राज्य की भोली-भाली जनता और पिछड़ी जाति के लोग इस झूठी खबर के बहकावे में आ गए जिसका फायदा महागठबंधन को चुनाव में मिला। भाजपा की ओर से लाख सफाई देने के बावजूद लोग इस झूठी खबर की जकड़न से निकल ही नहीं पाए। नतीजा, चुनाव में भाजपा को नुकसान हुआ।
 
इस खबर को लेकर सोशल मीडिया पर भी भाजपा की निंदा शुरू हो गई। लोग बिना इसकी जांच-पड़ताल किए झूठी खबर पर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे। सबको यही लग रहा था कि मोदी सरकार अब आरक्षण को हटा देगी। पूरी प्रतिक्रिया परोसी जा रही इसी झूठी खबर को लेकर आ रही थी और लोग केंद्र सरकार की निंदा कर रहे थे। इसे पिछड़ों के साथ अन्याय बता रहे थे, धोखा बता रहे थे। जाति के आधार पर समाज विभाजित हो रहा था, लेकिन वास्तविकता क्या है, इसकी तह तक जाने में कोई भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। इस झूठी खबर को सोशल मीडिया पर खूब फैलाया गया। इसे जिस रूप में लोगों के सामने परोसा जा रहा था, लोग उसी को सच मानकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे।
 
फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिये इस झूठ को फैलाया जा रहा था कि भाजपा आरक्षण खत्म कर देगी जिससे सामान्य जाति के छात्रों को फायदा होगा और उन्हें सरकारी नौकरियां मिलेंगी। इस खबर ने समाज के बीच एक बार फिर भेदभाव, द्वेष और आक्रोश को जिंदा कर दिया था। जगह-जगह इसका विरोध हो रहा था। लोग सड़कों पर उतर रहे थे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले फूंके जा रहे थे। लोगों के मन में जाति को लेकर घृणा भड़काई जा रही थी, जिससे कई स्थानों पर हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इस झूठी खबर ने बिहार के जनमानस को गहरे तक प्रभावित किया। लोग बिना कुछ समझे, बिना कुछ जाने आपस में भिड़ने को तैयार थे। यह सब एक ऐसे बयान को लेकर हो रहा था जिसका कोई मतलब ही नहीं था।
 
दरअसल, आरक्षण को लेकर श्री मोहन भागवत ने जो कुछ भी कहा था, वह उनकी साफ, बेबाक और तथ्यत: ठीक राय थी। लेकिन कुछ नेताओं ने इसका राजनीतिक फायदा उठाया। इसकी शुरुआत महागठबंधन के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने की और आज भी इसका राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में लगे रहते हैं। मुख्यधारा मीडिया भी नेताओं के बयान को प्रमुखता से दिखाकर अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने में जुटा हुआ था। किसी भी मीडिया घराने इस झूठी खबर का खंडन करने की जहमत नहीं उठाई। लोगों ने भी यह समझने की कोशिश नहीं कि कोई भी परिपक्व राजनीतिक दल आरक्षण खत्म करने के बारे में सोच भी नहीं सकता।
 
आरक्षण का लाभ सही लोगों को मिल रहा है या नहीं, इस बात की पारदर्शी समीक्षा का सीधा अर्थ समाप्त करना नहीं होता। समीक्षा के बाद आरक्षण की नीति में विस्तार भी किया जा सकता है। राजनीतिक दल बखूबी जानते हैं कि जातियों में विभाजित भारतीय समाज को गुमराह कर राजनीतिक फायदा कैसे उठाया जाता है। लालू प्रसाद के लिए भी यह एक अवसर था, जिसे उन्होंने लपक लिया। इंटरनेट के इस दौर में फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल झूठी खबरें फैलाने के लिए किया जा रहा है। इसलिए लोगों को चाहिए कि ऐसी खबरों के प्रति सतर्क रहें और अपने स्तर पर उसकी प्रामाणिकता की पड़ताल कर दूसरों को भी जागरूक करें।
इंटरनेट पर तैरती खबरों की सचाई को ऐसे परखें
 
खबर का स्रोत क्या है? सोशल मीडिया पर मौजूद खबरों पर भरोसा करने से
पहले उसके असली स्रोत का पता लगाने की कोशिश करें कि आखिर खबर आई कहां से और इसे प्रकाशित करने वाली वेबसाइट कितनी विश्वसनीय है।
 
केवल शीर्षक पढ़ कर भरोसा न करें: अक्सर खबरों की शीर्षक भ्रम पैदा करती हैं। ऐसे में केवल शीर्षक पढ़कर ही उस पर भरोसा न करें, बल्कि पूरी खबर को पढ़ें।
 
लेखक और तारीख का ध्यान रखें: सोशल मीडिया पर तैरने वाली खबरें कभी-कभी बहुत पुरानी होती हैं। इसलिए इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि खबर कब और किसके द्वारा लिखी गई?
 
साझा करने से बचें: ऐसी किसी भी खबर को सोशल मीडिया पर शेयर या साझा न करें जातीय विद्वेष को भड़काने या किसी की धार्मिक-मजहबी भावनाओं को आहत करने वाली हों।
 
वास्तविकता की परख जरूरी: इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आप जो खबर पढ़ रहे हैं या साझा कर रहे हैं वह वास्तविक है या नहीं।
 
ऐसे परखें विश्वसनीयता: खबर की विश्वसनीयता को परखने के लिए आप ‘‘गूगल फैक्ट चेक’’ का प्रयोग कर सकते हैं। इसी तरह किसी तस्वीर की विश्वसनीयता जांचने के लिए भी ‘‘गूगल रिवर्स इमेज’’ का सहारा ले सकते हैं।
 
हमेशा आधिकारिक खबर पर ही भरोसा करें।
 
जिम्मेदारी तय हो
 
सोशल मीडिया पर झूठी खबरों का प्रसार रोकने के लिए फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम जैसी सोशल साइट्स कंपनियों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वे यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती हैं कि ‘हम केवल मंच मुहैया कराते हैं।, इस मंच पर कौन क्या कर रहा है, इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं है।’
खबरिया वेबसाइट्स पर भी अखबारों की तरह ही विनियमन होना चाहिए। मीडिया की स्वतंत्रता मतलब यह नहीं कि मनमानी हो। झूठी खबरों के सहारे भ्रम फैलाने का चलन बेहद खतरनाक है।

(लेखक दून विश्वविद्यालय, देहरादून के छात्र हैं )