वेमुला को दलित बनाकर मीडिया ने किया समाज को बांटने का काम
   दिनांक 25-जून-2018
सत्रह जनवरी, 2016 का दिन था। शाम के सात बजे थे। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय को स्तब्ध करने वाली एक खबर आई कि पीएचडी के छात्र ‘रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली’। अगले दिन यह खबर सुर्खियों में थी। आत्महत्या का यह दु:खद समाचार 24 घंटे से भी कम समय में जातीय रूप ले चुका था। तमाम तरह की अटकलों का बाजार गर्म हो गया, जैसे रोहित दलित था, विश्वविद्यालय का व्यवहार दलित विरोधी था, इससे भारतीय समाज का दलित-विरोधी चेहरा सामने आया इत्यादि-इत्यादि। अफसोस की बात यह है कि ऐसी खबरों के लिए मीडिया में जगह की कमी नहीं थी।
 
सुगंधा

टाइम्स आॅफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू जैसे प्रमुख राष्ट्रीय समाचारपत्रों से लेकर वायर सरीखे वेब पोर्टलों पर ऐसी खबरों की बाढ़-सी आ गई जिसमें रोहित को दलित उत्पीड़न का चेहरा बताया गया। लगभग हर पत्र-पत्रिका ने अपने संपादकीय तक में रोहित को ‘दलित’ मानकर विश्लेषण लिख डाले। लेकिन जब स्थानीय पुलिस ने जांच में पाया कि रोहित वेमुला दलित नहीं था, तब एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
इकोनॉमिक टाइम्स ने लिखा, ‘‘वेमुला के गुंटूर स्थित घर पर जाकर की गई पड़ताल में कथित तौर पर यह बात सामने आई है कि उसके माता-पिता वदेरा की पत्थर की कटाई करने वाली जाति से हैं। यह जाति अन्य पिछड़ा वर्ग में आती है, दलित में नहीं।’’

रोहित और सोशल मीडिया
 
रोहित वेमुला दलित था या नहीं, यह सवाल सोशल मीडिया पर छाया रहा और इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आती रहीं। कुछ लोगों ने मान लिया कि रोहित दलित नहीं था, पर ऐसे लोगों की तादाद कहीं अधिक थी, जिनके लिए रोहित दलित ही था। पुलिस चाहे कुछ भी कहे। तमाम चुटकुले चले, कार्टून साझा किए गए। इस तरह की सामग्री पर टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें रोहित की तुलना एकलव्य से की गई। एक कार्टून में एक छात्र को शिखा से बने फंदे से फांसी लगाते दिखाया गया। शिखा ब्राह्मण के प्रतीक स्वरूप इस्तेमाल की गई। एक अन्य रिपोर्ट में वेमुला को एकलव्य के तौर पर पेश किया गया जिसमें विश्वविद्यालय प्रशासन अंगूठे की जगह वेमुला की जान मांगता दिखाया गया।
 सुगंधा
 
विरोध प्रदर्शन और राजनीतिकरण
 
चौबीस घंटे से भी कम समय में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हंगामे का दौर शुरू हो चुका था। परिसर में छात्रों ने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिए और एक सप्ताह के भीतर यह एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन गया और देश के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र सड़कों पर उतर आए। हिन्दुस्तान टाइम्स समेत कई राष्ट्रीय अखबारों ने खबर प्रकाशित की कि जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अप्पा राव को रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी बताया और केंद्रीय मंत्रियों स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय के इस्तीफे की मांग की। जल्दी ही छात्रों का यह विरोध सियासी अखाड़ा बन गया। केंद्रीय मंत्रियों के पुतले फूंके जाने लगे। छात्र संगठन आमने-सामने आ गए। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन आॅफ इंडिया (एनएसयूआई) से जुड़े छात्रों ने देशभर में प्रदर्शन किये और मंत्रियों के इस्तीफे की मांग करने लगे। वहीं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने मामले के राजनीतिकरण के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार बताया। दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों में आम आदमी पार्टी भी कूद गई। इस तरह झूठ की बुनियाद पर इस मामले को लंबे समय तक उछाला जाता रहा। यह तथ्य सामने आने के बाद भी कि रोहित दलित नहीं था, सियासी दलों ने इसे शांत नहीं होने दिया।
रूपनवल आयोग की रिपोर्ट
 
जनवरी 2016 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रूपनवल को रोहित वेमुला प्रकरण की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई। आयोग ने अगस्त 2016 में अपनी रिपोर्ट दी जिसमें एक बार फिर साफ तौर पर कहा गया कि रोहित दलित नहीं था। इसमें कहा गया, ‘‘हमारे पास उपलब्ध तमाम दस्तावेजों से ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली कि वह (वेमुला की मां) ‘माला समुदाय’ से थीं जिस आधार पर उन्होंने बाद में माला जाति से होने का प्रमाणपत्र सर्वप्रथम पार्षद उप्पलपति दनम्मा से बनवा लिया। चूंकि यह बात साबित नहीं हो सकी कि वह ‘माला समुदाय’ से थीं, उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल नहीं किया जा सकता। हमारे पास उपलब्ध सभी सबूतों से यह बात स्पष्ट होती है कि वह वदेरा समुदाय से थीं, इसलिए रोहित वेमुला को जारी अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र असली नहीं था और वह इससे संबद्ध नहीं थे।’’इस रिपोर्ट में न केवल फैलाई जा रही यह बात सिरे से खारिज की गई कि रोहित वेमुला एक दलित था, बल्कि मामले के सभी आरोपियों को भी क्लीन चिट दी गई। आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट में कहा, ‘‘मेरे विचार से उनकी आत्महत्या में विश्वविद्यालय प्रशासन अथवा कुलपति अप्पा राव समेत किसी राजनीतिक व्यक्ति की कोई भूमिका नहीं थी। वह (जान देने का) फैसला उनका खुद का था।’’
 
पुलिस के बाद जब आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कह दिया कि रोहित अनुसूचित जाति से संबद्ध नहीं था, तो मीडिया ने आयोग की रिपोर्ट को ही गलत ठहराने के लिए अभियान छेड़ दिया। अपनी बात को सच साबित करने के लिए मीडिया ने रोहित का जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया और उसके सगे-संबंधियों तथा दोस्तों के हवाले से खबर चलाई। हालांकि आयोग ने तमाम दस्तावेजों की पड़ताल के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, लेकिन इसके बावजूद मीडिया दूसरी कसरत करने में लगा हुआ था। ऐसे में रोहित का जाति प्रमाणपत्र दिखाने से कुछ बदल नहीं जाता, क्योंकि आयोग पहले ही कह चुका था कि रोहित की मां ने गलत तरीके से माला जाति से संबद्ध होने का प्रमाणपत्र बनवाया था।
 
झूठ को किसी भी तरह से सच के रूप में स्थापित करने की प्रवृत्ति बहुत खतरनाक है। झूठ का कोई ओर-छोर नहीं होता है, लेकिन इसके सहारे समाज को तोड़ने की यह प्रवृत्ति घातक है। देश और समाज को बांटने वाली यह प्रवृत्ति रोहित वेमुला प्रकरण में स्पष्ट दिखी। यह कैसी सियासत है, जो लोगों को जातिगत खांचों में बांटकर उसे वोट बैंक के रूप में भुनाना चाहती है? यह कैसा मीडिया है जो खबरों में एजेंडा चलाता है? मीडिया अपने गढ़े हुए झूठ को ही सच मानता है, इसलिए खबर परोसने से पहले उसकी खंगाल भी नहीं करता है।