रामलीला मैदान-25 जून, 1975, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

रामलीला मैदान-25 जून, 1975। उस दिन सूरज आग उगल रहा था, पर जनता लगातार रामलीला मैदान आ रही थी। उसे गर्मी की परवाह नहीं थी। यूं तो राजधानी के रामलीला मैदान में न जाने कितनी रैलियां,सभाएं और धार्मिक समागम होते रहे हैं, पर इसके लिए 25 जून,1975 की तिथि हमेशा खास रहेगी। उस दिन रामलीला मैदान में वास्तव में विशाल रैली हुई थी । लाखों लोग आए थे। देश में इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन के खिलाफ माहौल बना हुआ था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें चुनावी गड़बड़ियों के लिए दोषी ठहराया था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था। उसी क्रम में रामलीला मैदान में रैली थी।

 

रैली को जयप्रकाश नारायण जी के अलावा आचार्य कृपलानी जी, विजय लक्ष्मी पंडित, अटल बिहारी वाजपेयी,मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेता संबोधित करने वाले थे। उस दिन जेपी ने भाषण का श्रीगणेश रामधारी सिंह दिनकर की उन अमर पंक्तियों के साथ किया-- " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"। सारा रामलीला मैदान उन नेताओं को बिल्कुल शांत भाव से सुन रहा था। उस रैली की रात को ही देश में इमरजेंसी लग गई थी । इस घोषणा के तुरंत बाद रातों रात कई नेता हिरासत में ले लिए गए। जय प्रकाशनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। उस रात को याद करते हुए जार्ज फर्नांडिस ने एक बार कहा था,"" गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल में पहुंचा दिया गया। पहली बार हाथों में बेड़ियां और शरीर को जंजीर से जकड़ा गया।"" राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना। उन्होंने कहा- इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई थी।दरअसल रामलीला मैदान का जिक्र आते ही जेहन में उन तमाम रैलियों और अन्य सभाओं का ख्याल आने लगता हैं, जिनके आयोजनों ने इसे एक अलग स्थान का दर्जा दिला दिया है। इसी रामलीला मैदान में गांधी जी और पंडित नेहरू ने कई बार सभाओं को संबोधित किया। रामलीला मैदान में स्थायी मंच 1962 में ही बना। दरअसल ब्रिटेन की महारानी एलिजाबे​थ भारत के दौरे पर आई थीं। उनके सम्मान में रामलीला मैदान में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन होना था। इसलिए तब जाकर वहां स्थायी मंच को बनाया गया। पहले इधर अस्थायी मंच ही बनता था। इसी रामलीला मैदान में 27 जनवरी 1963 को लता मंगेशकर ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत गाया था। यह गीत उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने गाया था। उन दिनों देश चीन से जंग में हार के कारण निराशा में डूबा हुआ था। तब लता जी के गीत को सुनकर नेहरु जी आंखें भी नम हो गई थीं।रामलीला मैदान में 26 नवम्बर,1974 को सोवियत संघ के शिखर नेता ब्रेजनेव के सम्मान में हुई सार्वजनिक सभा भी बहुत प्रभावशाली रही थी। तब भारत-सोवियत संघ की मैत्री अपने पूरे चरम पर थी।दरअसल जहां अब रामलीला मैदान है, वहां पर 1930 से पहले तालाब था। उसे भरकर इसे मैदान की शक्ल दी गई ताकि इधर रामलीला का आयोजन हो सके। पहले रामलीला मैदान में होने वाली रामलीला लाल किले के पीछे हुआ करती थी। यमुना में बाढ़ आ जाने के कारण वहां कई बार रामलीला का आयोजन प्रभावित हो जाता था । इसी कारण से रामलीला आयोजन समिति ने स्थानीय प्रशासन से रामलीला के आयोजन के लिए अलग जगह देने का आग्रह किया। इसके बाद प्रशासन ने शहर के बीचों-बीच रामलीला के लिए आयोजन के लिए जगह का चयन किया। 1932 से इस मैदान में रामलीला होने लगी। बहरहाल , इधर रैलियां तो अनेक हुई पर 25 जून की रैली को कोई नहीं भूल सकता

रैली को जयप्रकाश नारायण जी के अलावा आचार्य कृपलानी जी, विजय लक्ष्मी पंडित, अटल बिहारी वाजपेयी,मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेता संबोधित करने वाले थे। उस दिन जेपी ने भाषण का श्रीगणेश रामधारी सिंह दिनकर की उन अमर पंक्तियों के साथ किया-- " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"। सारा रामलीला मैदान उन नेताओं को बिल्कुल शांत भाव से सुन रहा था। उस रैली की रात को ही देश में इमरजेंसी लग गई थी । इस घोषणा के तुरंत बाद रातों रात कई नेता हिरासत में ले लिए गए। जय प्रकाशनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। उस रात को याद करते हुए जार्ज फर्नांडिस ने एक बार कहा था,"" गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल में पहुंचा दिया गया। पहली बार हाथों में बेड़ियां और शरीर को जंजीर से जकड़ा गया।"" राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना। उन्होंने कहा- इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई थी।दरअसल रामलीला मैदान का जिक्र आते ही जेहन में उन तमाम रैलियों और अन्य सभाओं का ख्याल आने लगता हैं, जिनके आयोजनों ने इसे एक अलग स्थान का दर्जा दिला दिया है। इसी रामलीला मैदान में गांधी जी और पंडित नेहरू ने कई बार सभाओं को संबोधित किया। रामलीला मैदान में स्थायी मंच 1962 में ही बना। दरअसल ब्रिटेन की महारानी एलिजाबे​थ भारत के दौरे पर आई थीं। उनके सम्मान में रामलीला मैदान में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन होना था। इसलिए तब जाकर वहां स्थायी मंच को बनाया गया। पहले इधर अस्थायी मंच ही बनता था। इसी रामलीला मैदान में 27 जनवरी 1963 को लता मंगेशकर ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत गाया था। यह गीत उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने गाया था। उन दिनों देश चीन से जंग में हार के कारण निराशा में डूबा हुआ था। तब लता जी के गीत को सुनकर नेहरु जी आंखें भी नम हो गई थीं।रामलीला मैदान में 26 नवम्बर,1974 को सोवियत संघ के शिखर नेता ब्रेजनेव के सम्मान में हुई सार्वजनिक सभा भी बहुत प्रभावशाली रही थी। तब भारत-सोवियत संघ की मैत्री अपने पूरे चरम पर थी।दरअसल जहां अब रामलीला मैदान है, वहां पर 1930 से पहले तालाब था। उसे भरकर इसे मैदान की शक्ल दी गई ताकि इधर रामलीला का आयोजन हो सके। पहले रामलीला मैदान में होने वाली रामलीला लाल किले के पीछे हुआ करती थी। यमुना में बाढ़ आ जाने के कारण वहां कई बार रामलीला का आयोजन प्रभावित हो जाता था । इसी कारण से रामलीला आयोजन समिति ने स्थानीय प्रशासन से रामलीला के आयोजन के लिए अलग जगह देने का आग्रह किया। इसके बाद प्रशासन ने शहर के बीचों-बीच रामलीला के लिए आयोजन के लिए जगह का चयन किया। 1932 से इस मैदान में रामलीला होने लगी। बहरहाल , इधर रैलियां तो अनेक हुई पर 25 जून की रैली को कोई नहीं भूल सकता

रैली को जयप्रकाश नारायण जी के अलावा आचार्य कृपलानी जी, विजय लक्ष्मी पंडित, अटल बिहारी वाजपेयी,मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेता संबोधित करने वाले थे। उस दिन जेपी ने भाषण का श्रीगणेश रामधारी सिंह दिनकर की उन अमर पंक्तियों के साथ किया-- " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"। सारा रामलीला मैदान उन नेताओं को बिल्कुल शांत भाव से सुन रहा था। उस रैली की रात को ही देश में इमरजेंसी लग गई थी । इस घोषणा के तुरंत बाद रातों रात कई नेता हिरासत में ले लिए गए। जय प्रकाशनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। उस रात को याद करते हुए जार्ज फर्नांडिस ने एक बार कहा था,"" गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल में पहुंचा दिया गया। पहली बार हाथों में बेड़ियां और शरीर को जंजीर से जकड़ा गया।""

राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना। उन्होंने कहा- इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई थी।

दरअसल रामलीला मैदान का जिक्र आते ही जेहन में उन तमाम रैलियों और अन्य सभाओं का ख्याल आने लगता हैं, जिनके आयोजनों ने इसे एक अलग स्थान का दर्जा दिला दिया है। इसी रामलीला मैदान में गांधी जी और पंडित नेहरू ने कई बार सभाओं को संबोधित किया।

रामलीला मैदान में स्थायी मंच 1962 में ही बना। दरअसल ब्रिटेन की महारानी एलिजाबे​थ भारत के दौरे पर आई थीं। उनके सम्मान में रामलीला मैदान में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन होना था। इसलिए तब जाकर वहां स्थायी मंच को बनाया गया। पहले इधर अस्थायी मंच ही बनता था।

इसी रामलीला मैदान में 27 जनवरी 1963 को लता मंगेशकर ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत गाया था। यह गीत उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने गाया था। उन दिनों देश चीन से जंग में हार के कारण निराशा में डूबा हुआ था। तब लता जी के गीत को सुनकर नेहरु जी आंखें भी नम हो गई थीं।

रामलीला मैदान में 26 नवम्बर,1974 को सोवियत संघ के शिखर नेता ब्रेजनेव के सम्मान में हुई सार्वजनिक सभा भी बहुत प्रभावशाली रही थी। तब भारत-सोवियत संघ की मैत्री अपने पूरे चरम पर थी।

दरअसल जहां अब रामलीला मैदान है, वहां पर 1930 से पहले तालाब था। उसे भरकर इसे मैदान की शक्ल दी गई ताकि इधर रामलीला का आयोजन हो सके। पहले रामलीला मैदान में होने वाली रामलीला लाल किले के पीछे हुआ करती थी। यमुना में बाढ़ आ जाने के कारण वहां कई बार रामलीला का आयोजन प्रभावित हो जाता था । इसी कारण से रामलीला आयोजन समिति ने स्थानीय प्रशासन से रामलीला के आयोजन के लिए अलग जगह देने का आग्रह किया। इसके बाद प्रशासन ने शहर के बीचों-बीच रामलीला के लिए आयोजन के लिए जगह का चयन किया। 1932 से इस मैदान में रामलीला होने लगी। बहरहाल , इधर रैलियां तो अनेक हुई पर 25 जून की रैली को कोई नहीं भूल सकता