आपातकाल पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से जबरन कराए गए थे हस्ताक्षर
   दिनांक 26-जून-2018
25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगाने के लिए जो हस्ताक्षर कराए गए वे जबरदस्ती कराए गए। इस बारे में इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल से सलाह नहीं ली थी क्योंकि उन्हें अपने मंत्रिमंडल पर विश्वास नहीं था। 26 जून को मंत्रिमंडल के सदस्यों को बुला-बुलाकर उन्हें सूचित किया गया कि देश में अराजकता का खतरा है लिहाजा आपातकाल लगा दिया गया है। इसमें से दो तीन प्रश्न उभरते हैं। क्या वास्तव में आपातकाल लगाने की जरूरत थी? क्या कोई ऐसा खतरा पैदा हो गया था कि आपातकाल लगाना जरूरी हो गया था? तीसरा प्रश्न यह कि विपक्ष का आकलन क्या था?आपातकाल लगाने को लेकर मेरा अपना अनुभव भी है, जो उन दिनों के हालात थे उसमें आपातकाल की कोई जरूरत नहीं थी। आपातकाल का जो आधार बनाया गया कि संभवत: सेना में विद्रोह हो जाएगा, अनैतिकता पैदा हो जाएगी, लोग कानून व्यवस्था तोड़ने लगेंगे। ऐसी स्थिति बन जाएगी जिसे काबू नहीं किया जा सकता। ये सब बनावटी कहानियां हैं, क्योंकि आंदोलन इतना बड़ा या व्यापक नहीं था कि उससे देश में उत्पात होने का खतरा हो।
रामबहादुर राय 
 
नहीं थी आपातकाल की जरूरत
 
आंदोलन तो बिहार में चल रहा था। थोड़ा बहुत असर उत्तर प्रदेश में था और आंदोलन की जो व्यापकता थी उन दिनों वह ऐसी नहीं थी जिसके कारण आपातकाल लगाया जाए। 5 जून 1974 को जयप्रकाश नारायण ने उस आंदोलन की दिशा को मोड़ दिया था। उन्होंने कहा था कि ये केवल बिहार की सरकार को हटाने का आंदोलन नहीं है ये संपूर्ण क्रांति का आंदोलन है। उस आंदोलन में पहले लाखों की संख्या में छात्र आए। मेरा मानना है कि जेपी के आंदोलन में आने के बाद उस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली और एक सशक्त नेतृत्व भी मिला। उनके आने से राजनैतिक दलों को यह समझ आया कि वे इस आंदोलन में कूदेंगें तो उन्हें भी राजनैतिक फायदा हो सकता है। उन्हीं दिनों में गुजरात विधानसभा भंग हुई थी। मोरारजी देसाई के अनशन के बाद उस गुजरात विधानसभा के चुनाव हुए और उस चुनाव में जनता पक्ष जीता।
12 जून 1975 एक ऐसा दिन है जिस दिन आपातकाल की नींव पड़ी। उस दिन तीन घटनाएं हुईं। तीनों का संबंध इंदिरा गांधी की राजनैतिक हैसियत से है। सुबह वीपी धर का देहांत हुआ, उसी दिन सुबह दस बजे इंदिरागांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आया जो राजनारायण उनके खिलाफ चला रहे थे। शाम होते-होते गुजरात में कांग्रेस चुनाव हारने की खबर आई। 12 जून के इतने दिनों बाद जब मैं सोचता हूं हम लोगों को, विपक्ष के नेताओं और जो भी आंदोलनकारी थे उन्हें सोचना शुरू कर देना चाहिए था कि इंदिरा गांधी अब क्या करेंगी? लेकिन कोई भी बहुत दूर तक कल्पना करने के बाद ये नहीं सोच पाया कि आपातकाल लगाया जा सकता है। इसलिए जिसके जो कार्यक्रम पहले से निर्धारित थे वह उस कार्यक्रम के लिए चला गया। जैसे चार बड़े नेताओं का नाम लें तो अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते, श्याम नंदन मिश्र । वे 26 जून को बेंगलुरु में थे तो वहां गिरफ्तार हुए। जेपी दिल्ली में एक सभा के लिए आए थे 25 की रात उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। चंद्रशेखर उनसे मिले थाने आए तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 25 जून की रात मैं कानपुर देहात क्षेत्र में था। 26 को आपातकाल लगने का पता लगा। उन दिनों मेरे पास अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सचिव का दायित्व था, बिहार में संगठन का काम मेरे जिम्मे था। उन दिनों मेरा केंद्र बिहार में पटना था। इसके अलावा मैं 'बिहार प्रदेश छात्र संघर्ष संचालन समिति' का भी सदस्य था। 27 जून को मैं पटना पहुंचा अगले दिन 28 जून को गोविंदाचार्य जी और सर्वोदय के नेता त्रिपुरारी शरण से मिलना हुआ। त्रिपुरारी जेपी के सहयोगी थे। दोनों ने मुझे कहा कि आपातकाल लग गया आप तत्काल पटना छोड़ दीजिए यदि पटना में रहेंगे तो आपको गिरफ्तारी से नहीं बचाया जा सकता इसलिए आप कुछ दिन छिप कर रहें। मैं अगले दिन बनारस पहुंच गया। मैं बनारस में ठिकाने की तलाश में निकला, लेकिन रास्ते में मैदागिन चौराहा पार करते समय बनारस के सांसद सुधाकर चौबे युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ बैठे हुए थे उन्होंने मुझे देख लिया। वहीं पांच कदम पर कोतवाली थी। मैं सड़क पार करके जैसे पार्क के बीच में पहुंचा पुलिस ने मुझे घेर कर हिरासत में ले लिया। कोतवाल मेरे मित्र के बड़े भाई थे लेकिन कांग्रेसियों के दबाव के कारण उन्हें मुझे हिरासत में लेना पड़ा। हालांकि उन्होंने कहा कि कई वर्षों से बनारस में उनकी कोई गतिविधि नहीं है इसलिए मैं इन्हें एक आंदोलन के नेता के रूप में क्यों गिरफ्तार करूं। इस पर कांग्रेसी सांसद ने बनारस के जिलाधिकारी से दबाव डलवाया। उन्होंने पटना के जिलाधिकारी से बिहार आंदोलन में जो मेरी भूमिका थी उसका रिकॉर्ड मंगवा लिया और मुझे भारत रक्षा अधिनियम (डीआईआर) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। नवंबर 1976 में मुझे जमानत मिल गई। जेल के दौरान हमें जिला जेल में रखा गया। कुछ दिनों बाद पूर्व सांसद लालमणि चौबे जो उस समय बिहार में विधायक थे उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। मेरी गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद वे भी बनारस में गिरफ्तार हुए थे। हम सभी एक दिन जेल में बैठे थे। मैंने मजाक में कहा कि चौबे जी आप तो खिलाड़ी रहे हैं आप इस दीवार को फांदकर बाहर जा सकते हैं लेकिन हम लोगों के बीच में सीपीआईएमएल का एक व्यक्ति बंदियों में से था लेकिन असल में वह था पुलिस का जासूस। उसकी जासूसी पर 15 मिनट बाद ही जेल अधीक्षक आया और 17 लोगों को छांट लिया और हम सबको सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। जेल से बाहर आने के बाद मैं कई नेताओं से मिला लेकिन किसी के मिलने के बाद ये नहीं लगता था कि आपातकाल जल्द खत्म होगा। हां जयप्रकाश नारायण ने ये जरूर कहा कि आपातकाल ज्यादा दिन नहीं रहेगा। इसलिए आप भी इस में कोशिश जुटिए कि सारे गैर कम्युनिस्ट विपक्ष एक हो जाएं।
 1976 नवंबर के अंत में मेरी मुलाकात श्री भाऊराव देवरस से हुई तो वे कानपुर में भूमिगत होकर रह रहे थे। इस दौरान उनसे मिलना हुआ तो सिर्फ उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कहा कि चुनाव की तैयारी कर लो। आपातकाल जल्द ही हटने वाला है। इसके बाद चुनाव की घोषणा हो जानी है। कुल मिलाकर राजनैतिक नेताओं से मिलकर मेरे मन में निराशा का भाव पैदा हुआ लेकिन जेपी और भाऊराव देवरस से मिलकर मुझे ये लगा कि आपातकाल का सन्नाटा जरूर टूटेगा और लोकतंत्र वापस आएगा। -


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इंदिरा गांधी कला केंद्र के चेयरमैन हैं)