आपातकाल के बाद इंदिरा हारीं तो जीती थी देश की जनता
   दिनांक 27-जून-2018
हां तब मैं बच्चा तो था किन्तु इतना छोटा भी नहीं कि आपातकाल की घटनाओं से अनभिज्ञ रहता। नवीं कक्षा में पढ़ता था तब मैं। मुझे याद है 26 जून, 1975 की सुबह पिताजी सुबह आठ बजे की खबरे ट्रांजिस्टर में सुनते हुए दाढ़ी बना रहे थे। हिमाचल के किन्नौर जिला के कल्पा हाई स्कूल में हेडमास्टर थे वे तब। पहली खबर कि 25 जून की रात्रि को देश में आपातकाल की घोषणा हो गई है। देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकार स्थगित कर दिए गए हैं। देवकीनन्दन पाण्डेय समाचार पढ़ रहे थे। उनकी कड़क आवाज में पिताजी को आपातकाल की कड़क समझ में आ रही थी। तब मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि पिताजी इतने गम्भीर क्यों हो गए हैं।


हमारा स्कूल वैसे जिला का बेहतरीन स्कूल था। उस समय सभी अध्यापक अपने-अपने कार्य में दक्ष किन्तु एक दिन पिताजी चिन्तित होकर घर आए। मां ने पूछा कि चिंतित क्यों हो। बताए कि उपर से फरमान आया है कि सभी को नसबन्दी के दो-दो केस कराने होंगे। अब हम सब बच्चों को पढ़ाएं या नसबन्दी के लिए लोगों को ढूंढ़ने जाएं।

फिर एक दिन शिमला से बड़े साहब आए। पिताजी का स्कूल निरीक्षण हमेशा सही होता था। पर उस दिन फिर चिंतित होकर घर आए। मां को पूछने पर बताया कि स्कूल में आपातकाल के नारे न लगे होने के कारण डांट पड़ी है। अगले दिन बच्चों से बड़े-बड़े पोस्टर बनवाकर टांगे गए। आपातकाल अनुशासन पर्व है-विनोबा भावे, देश के विकास के 20 सूत्री कार्यक्रम-इंदिरा गांधी।

फिर अक्टूबर मास में एस.एस.बी. ने हमारे खेल ग्राउण्ड में एक प्रदर्शनी लगाई। उस प्रदर्शनी में परिवार नियोजन के यंत्रों को ऐसे प्रदर्शित किया गया था मानों स्कूल के बच्चों को अभी से इन यंत्रों का उपयोग उनके ज्ञान का हिस्सा बनाना हो। गुरूजनों को समझ में नहीं आता था कि बच्चों को किताबी पढ़ाई करवाएं या प्रदर्शनी दिखाकर परिवार नियोजन की पढ़ाई।

इस बीच में नवीं की परीक्षा हो गई। उन दिनों पहली बार नवीं की परीक्षा बोर्ड की हुई थी। रिजल्ट आया तो मैं फेल। मेरे साथ किन्नौर के सीएमओ थे श्री एस के दास गुप्ता, उनका बेटा अमिताभ दास गुप्ता भी फेल। आपातकाल में खोज बीन करना ही मुश्किल हो गया कि फेल कैसे हो गया। कहें तो किससे। खैर बड़ी मशक्कत से पिताजी ने पुनर्निरीक्षण करवाया। तब पता चला कि 60 में से 60 नम्बर थे हम दोनों के गणित में। लेकिन लिखे गए थे 60 में से 7।

अगस्त 76 में पिताजी का तबादला कल्पा से ठियोग हो गया। ठियोग शिमला के निकट था। इसलिए स्कूल में नेताओं का हस्तक्षेप ज्यादा था। पर एक बात देखने में आई कि कल्पा के मुकाबले इमरजेंसी का कड़कपना कम हो गया था। पर परिवार नियोजन का भय तो जस का तस बना हुआ था। इस बीच दसवीं की बोर्ड की परीक्षा में हम सब व्यस्त हो गए। फिर फरवरी 77 में जब नए चुनाव की घोषणा हुई तो आपातकाल में भी ढील दे दी गई। तब ठियोग में मैंने दुकानदारों में बड़ा उत्साह का माहौल देखा। मार्च में हम बोर्ड की परीक्षा से फ्री हो गए और चुनावी नारे लगाने वाले बच्चों की टोली में शामिल हो गए। नारे लगाते थे - ‘‘जनता जागी-गाय बच्छी भागी’’, ‘‘अटल बिहारी बोल रहा है-इंदिरा शासन डोल रहा है’’। चुनाव की एक रैली मुझे अभी भी याद है - रामलाल ठाकुर हिमाचल के मुख्यमंत्री ठोडो ग्राउण्ड में एक रैली के लिए आए थे। मुश्किल से 300-400 संख्या रही होगी। हम भी देखने गए थे। वापस आ रहे थे तब ठियोग बस स्टैण्ड में एक जीप में चढ़कर दौलतराम चैहान भाषण दे रहे थे। उनका एक वाक्य आज तक याद है - दूरदर्शन को इंदिरा दर्शन बना दिया है। भूमिहीनों को ढांक में नौतोड़ दे दिए। अरे भाई यदि ढांक में नौतोड़ ही देने थे तो एक बुलडोजर भी साथ में दे देते। बड़ा मजा आया था उनको सुनकर। बस स्टैण्ड में जीप के इर्द-गीर्द लगभग 1000 लोग जुटे होंगे। डाॅ. राधारमण शास्त्री मंच संचालन कर रहे थे। एक वक्ता, एक मंच संचालक, और जीप का बोनट मंच - लेकिन सभा बेमिसाल।

फिर चुनाव हुए। परिणामवाले दिन शाम को मां पिताजी और मैं नंगलदेवी की तरफ घूमने जा रहे थे। पिताजी ने ट्रांजिस्टर साथ में लिया था। चार बजे के बाद परिणाम आने शुरू हुए। दक्षिण के परिणाम आ रहे थे। कांग्रेस के लगातार जितने की खबरें आ रहीं थीं और पिताजी उदास हो रहे थे। रात को 9 बजे तक परिणाम कुछ-कुछ जनता पार्टी की पक्ष में आने शुरू गए थे। हम सो गए। रात को एक बजे अचानक पूरे बाजार में जोर-जोर से शोर होने लगा। हमारे नीचे सरदार सुरजीत सिंह रहते थे जो टेलिफोन आॅपरेटर थे। वे अपनी एक्सचेंज से लगातार देशभर की चुनावी खबरें ले रहे थे। एक बजे उन्होंने ही हल्ला करना शुरू किया और पूरे बाजार को जगा दिया। इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गई है। मेरे पिताजी भी भाव विभोर हो गए। वो भी जोर से चिल्लाए - सरदार जी.......! इंदिरा गांधी चुनाव नहीं हारी है। देश की जनता जीत गई है।

(महेंद्र पांडे जी के वॉल से साभार )