आध्यात्मिकता के शिखर पुरुष 'कबीर'
   दिनांक 28-जून-2018

 - पूनम नेगी

कबीर कोई व्यक्ति नहीं अपितु एक समग्र दर्शन का नाम है। एक ऐसी चिंतन पद्धति जो "अणु में विभु" और "गागर में सागर" समेटे हुए है। संत कबीर के पद और साखियां थोड़े में बहुत कुछ कहने की क्षमता रखती हैं। अध्यात्म का तत्वज्ञान उनका मुख्य विषय प्रतिपाद्य है। वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को उन्होंने अपने पदों के द्वारा जनभाषा में बेहद कुशलता से समझाया है। एक निर्धन निरक्षर जुलाहा परिवार में पलकर कैसे महानता के शिखर को छुआ जा सकता है, यह महात्मा कबीर के आचार-व्यवहार, व्यक्तित्व और कृतित्व से सहज ही सीखा जा सकता है। कबीर साहित्य में जहां एक ओर वेदांत के तत्व ज्ञान, माया, प्रेम और वैराग्य की गूढ़ता मिलती है, वहीं उनके साहित्य में समाज सुधार का प्रखर शंखनाद भी है। दर्शन के इस महामनीषी की वाणी में अंधविश्वास कुरीतियों के खिलाफ मुखर विरोध दिखता है। कबीर अप्रतिम समाज सुधारक थे। जन जीवन का उत्थान ही उनकी जीवन साधना थी। उन्होंने अपने पदों के द्वारा आडम्बरों, अंधविश्वासों रूढ परम्पराओं पर पूरी निर्भीकता से चोट की।

 

कबीर का युग समाजिक विषमताओं का युग था। वे मध्यकाल के अंधयुग में अपने ज्ञान का आलोक लेकर आए। कबीर का काल विदेशी आक्रान्ताओं का काल था। विक्रमी संवत 1455 को ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी के लहरतारा नामक स्थान में उत्पन्न कबीर का जन्म और मृत्यु दोनों ही रहस्यपूर्ण है। इस बाबत प्रचलित किंवदंतियों से हम सभी परिचित हैं। कबीर के समय में सिकन्दर लोदी का शासन था। मुगल शासन में निर्दोष जनता पर अत्याचार होते थे। धर्म के ठेकेदार कर्मकाण्ड को बढ़ावा देकर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे रहते थे। कबीर ने इस अन्याय शोषण के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। मिथ्याडम्बरों के प्रति प्रतिक्रिया कबीर का जन्मजात गुण था। समाज की अप्रिय रीति को देखकर उस पर उन्होंने इतने तीखे प्रहार किये कि पंडों मौलवियों के दिखावों की धज्जियां उड़ गयीं। कबीर की वाणी का तीखा और अचूक व्यंग्य विशुध्द बौध्दिकता की कसौटी पर खरा उतरता है-

कांकर पाथर जोड़ी के मस्जिद ली चिनाय।

ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।।

तीखे प्रहारों के बावजूद कबीर के स्वर में विद्रोह, हीनता, द्वेष, आत्मश्लाघा तथा वैमनस्य का भाव जरा भी नहीं दिखता। उनकी वाणी में एक आत्मविश्वास है स्वयं की आत्मा को तमाम विषमताओं के बीच शुध्द रखने का। तभी तो वे सुर नर मुनि सभी को आत्मिक शुध्दता को चुनौती देते हुए कह उठते हैं-

झीनी झीनी बीनी चदरिया।

इंगला-पिंगला ताना भरनी,

सुषमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कंवल दस चरखा डोलै,

पांच तत्व गुन तीनी चदरिया।

जाको सियत मास दस लागे,

ठोक ठोक कर बीनी चदरिया।

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,

ओढ़ि के मैली कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन जतन सौं ओढ़ी,

ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया।

चरखे पर सूत कातते कर्मयोगी कबीर के अंतस की यह वाणी वाकई अद्भुत है। पूर्ण निष्ठा से अपनी जाति के जुलाहा कर्म का पालन करते हुए उनके द्वारा व्याख्यायित मानव जीवन का तत्वज्ञान सुनकर बडे़ बड़े धर्म मर्मज्ञ दार्शनिक उनके आत्मज्ञान के समक्ष नत मस्तक हो जाते हैं। कबीर के इस स्वर में वेदांत के परम तत्व का चिंतन स्पष्ट परिलक्षित होता है। वेदान्त के "यत् ब्रह्मांडे-तत् पिंडे" के सिद्धांत का समर्थन करते हुए वे कहते हैं-

"यह तत् वह तत् एक है, एक प्राण दुइ जात।

अपने जिय से जानिये, मेरे जिय की बात ।।

वेदांत के "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" तथा जीव ब्रह्म के अद्वैत को स्पष्ट करते हुए कबीर कहते हैं कि जैसे जल से हिम बनता है और हिम भी जल में ही बदल जाता है, वैसे ही परमात्मा से ही आत्मा की उत्पत्ति होती है तथा आत्मा पुनः परमात्मा में ही विलीन हो जाती है। परमात्मा सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है तथा जीव उसी परमात्मा का अंश है -

जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी।

फूटा कुम्भ जल जलहि सामना, यह तथ कह्यौ गयानी।।

कबीर के चिंतन में उपनिषदों के "माया" संबधी विचारों का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। जिस तरह आचार्य शंकर "माया महा ठगिनी" कह कर आत्मपथ के जिज्ञासुओं को सांसारिक लोभ लालच से निर्लिप्त रहने की सलाह देते हैं, उसी तरह संत कबीर भी जगत को मिथ्या मानकर कहते हैं कि परमात्मा से विलग होकर आत्मा जगत के मोह-माया में लिप्त होकर अज्ञानवश भटकती रहती है-

माया दीपक नर पतंग भ्रमि भ्रमि इवैं पडंत

कहे कबीर गुरु ग्यान से एक आध उबरंत।

कबीर कहते हैं कि माया बुद्धि को भ्रमित कर जीवात्मा-परमात्मा में द्वैत का भाव उत्पन्न कर देती है। काम, क्रोध, मद, मोह और मत्सर नामक इसके पांच पुत्र हैं जो सांसारिक जीवों को तरह-तरह से सताते हैं। इनका असर इतना गहरा होता है कि शरीर की समाप्ति के बाद भी इनके संस्कार समाप्त नहीं होते। तभी तो वे कहते हैं-

माया मुई न मन मुआ, मरि-मरि गया शरीर।

कबीर कहते हैं कि माया रूपी फंदे से केवल गुरु कृपा ही बचा सकती है। इसीलिए उन्होंने गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा "बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय" कह कर गुरु की अभ्यर्थना की। जानना दिलचस्प होगा कि कबीर के गुरु आचार्य रामानंद सगुण राम के उपासक थे जबकि कबीर ने अविनाशी राम के गीत गये। उनके राम लोकातीत हैं। वेदान्त के परब्रह्म की तरह अगम, अगोचर, अरूप, अनाम, निराकार तथा निरंजन। हम सब जानते हैं कि रामानंदाचार्य जी के प्रति उनके मन में गहन श्रद्धा थी। वे उनके प्रवचन सुना करते थे। उनकी इच्छा उन्हें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक बनाने की थी; मगर जिन संत कबीर ने अपने गुरु रामानंदाचार्य को ईश्वर से ऊंचा स्थान दिया वे तद्युग की छुआछूत ऊंच नीच संबंधी सामाजिक मूढ़ मान्यताओं की विवशताओं में फंसकर उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार कर सके तो विवेकी कबीर ने युक्ति से काम लिया। वे घाट की उन सीढ़ियों पर लेट गये जहां से आचार्य रामानंद प्रतिदिन ब्रह्म मुहुर्त में गंगा स्नान को जाते थे। अंधेरे में भूल से उनका पैर कबीर की छाती पर जा पड़ा और उनके मुख से राम-राम निकल पड़ा। गुरु के मुख से निकले वे दो शब्द कबीर का गुरुमंत्र बनकर उनकी समूची चिंतनधारा की केन्द्र बिंदु बन गये।

गहन दृष्टि से अवलोकन करें तो पाएंगे कि संत कबीर ने सगुण साकार एवं निर्गुण निराकार के मध्य सेतु निर्माण कर अज्ञान के अंधकार में भटक रहे जीवों के समक्ष सशक्त मार्गदर्शक की भूमिका निभायी। उन्होंने कोई खुद नया दार्शनिक सम्प्रदाय नहीं खड़ा किया वरन तत्कालीन भारत में प्रचलित दर्शनों से जो कुछ भी उन्हें प्रेरक एवं अनुकूल प्रतीत हुआ, उसे ग्रहण कर लिया। उन्होंने वेदान्त से अद्वैतवाद माया का तत्वदर्शन तो आत्मसात किया ही; सिद्धों तथा नाथ योगियों की योग साधना तथा हठयोग को ग्रहण किया और वैष्णव मत से अहिंसा तथा "प्रपत्ति" भाव। उन्होंने सूफियों के भावनात्मक रहस्यवाद को एक नया रूप दिया। इस प्रकार कबीर ने "सार-सार" को ग्रहण किया तथा जो कुछ भी "थोथा" लगा, उसे उड़ा दिया। स्वयं कबीर अपने राम के विषय में कहते हैं-

दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना ।

राम नाम का मरम न जाना।।

राम तत्व के मर्म को व्याख्यायित करते हुए वे आगे कहते हैं-

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढै बन माहि।

ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखत नाहीं।।

उनके "राम" कस्तूरी की सुगंध के सामान सूक्ष्म हैं और हर किसी के अंतर में उसका निवास है पर अज्ञानी मनुष्य उन्हें वनों और गुफाओं में तलाश रहा है। आत्मबोध के जागरण से जब जीव के अंतस में खुद को ईश्वर का अंश मानने की भावना बलवती होती है तो उसके अन्तरंग और बहिरंग जीवन में दोनों ही पक्ष पक्षी की भांति उन्मुक्त आकाश में विचरण करने को फड़फड़ाने लगते हैं। यही मानव जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि है।

जन सामान्य की देशज भाषा में अपने सहज उपदेशों के द्वारा ज्ञान, भक्ति और मोक्ष मार्ग का पथ प्रशस्त करने वाले कबीर की जीवन-साधना उनकी आत्मपीड़ा का ही प्रतिफलन थी। उनका संवेदनशील मन भ्रम जाल में उलझे संसार की पीड़ा को देख कर कराह उठता है-

चलती चक्की देखि के दिया कबीरा रोय

दुई पाटन के बीच में साबुत बचा कोय ।।

भक्त कबीर के दोहे "गागर में सागर" के समान हैं। इनमें अद्भुत शिक्षण है, विलक्षण नीतिमत्ता है और सहज प्रेरणा भी। संत कबीर के इन जीवन सूत्रों को जीवन में उतार कर कोई भी निर्विकार और आनन्दपूर्ण संतोषी जीवन जी सकता है। वे कहते हैं -

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।

कबीर के मुताबिक मनुष्य की वाणी एक अमूल्य रत्न है। सही तरीके से बोलना एक अनूठी कला है। इसलिए हृदय के तराजू में तोलकर ही शब्द मुंह से बाहर निकालने चाहिए-

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। इस सूक्ति को सत्यापित करते हुए वे कहते हैं कि जो लोग प्रयत्न करते हैं, वे अवश्य कुछ कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ भी हासिल नहीं कर पाते-

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

इसी तरह धैर्य संयम की सीख देते हुए संत कबीर मनुष्य को सतत आशावान रहने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं कि मन में धीरज रखने से सब कुछ संभव हो सकता है। जैसे कोई माली किसी पेड़ को रोज सौ घड़े पानी से सींच दे पर फल तो उसमें अनुकूल ऋतु आने पर ही लगेगा-

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।।

कबीर की लोकमंगल की भावना उन्हें विशिष्ट बनाती है। वे अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो -

कबीरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी खैर।

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।।

अनियंत्रित सांसारिक कामनाएं और चिंताएं ही कष्टों की जड़ हैं। जिसने इन कामनाओं पर विजय पा ली; वस्तुतः वही इस संसार का राजा है-

चाह मिटी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।।

जाको कछु नहिं चाहिए सो शाहन को शाह।।

कबीर अनुपम आत्मज्ञानी हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य जब तक अज्ञानता के कारण संसार के भ्रमजाल में जकड़ा रहता है तब तक जातिगत ऊंच-नीच समाज को खोखला किए रखती है। इसीलिए वे सतगुरु की शरण में जाकर जीवनमुक्ति की बात कहते हैं-

साधो आई ज्ञान की आंधी,

भ्रम की टांटी सबै उड़ानी,

माया रहे न बांधी।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को अकारण ही "वाणी का डिक्टेटर" नहीं कहा। सचमुच उनकी अभिव्यक्ति सामर्थ्य और रहस्यवाद को सरल शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करने का उनका ढंग अद्वितीय है। कबीर एक गहरे अनुभव का नाम है, जिसमें सब कुछ समा जाता है। कबीर एक समाधि हैं, जहां सभी का समाधान हो जाता है। कबीर उस किलकारती गंगा के समान हैं जो बह तो सकती है परंतु ठहर नहीं सकती और एक घट में समा सकती है। कबीर की गति परिधि से केंद्र की ओर है और अवस्था उस महाशून्य के सदृश्य है, जिसमें सभी हैं और जो सभी में हैं। उनकी उलटबांसियां अनूठी हैं। शब्द अबोल-अनमोल हैं जिन्हें बुद्धि सीमा में नहीं बांधा जा सकता।

 

ढाई आखर प्रेम के!

कबीर कहते हैं कि ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। कबीर का प्रेम तत्व बेहद गहन है। वे कहते हैं कि जिसने भी प्रेम के मूल तत्व को जान लिया, जिसके हृदय में मानवता के लिए सच्चा प्रेम जग गया, उसका समूचा व्यक्तित्व परिपूर्ण हो गया। फिर वह जो भी देखेगा, प्रेम की आंखों से ही देखेगा, प्रेम से ही बोलेगा, प्रेम से ही सुनेगा, प्रेम से ही करेगा। कोई भी दुश्मन नहीं, कोई विभाजन नहीं, कोई अलगाव नहीं; सभी एक ही समष्टि के अंग-अवयव। प्रेम की इसी एकात्मकता को कबीर ने परम ज्ञान कहा है, अद्वैत माना है। कबीर के ढाई आखर प्रेम की रोचक व्याख्या करते हुए ओशो कहते हैं-प्रेम शब्द अधूरा है क्योंकि इसमें ढाई अक्षर हैं। मगर दिलचस्प तथ्य यह है कि इस प्रेम में जो अधूरापन है, वह ही इसकी शाश्वतता है। प्रेम का यह अधूरापन जीवात्मा परमात्मा के आपसी संबंध जैसा है। कितना ही विकसित होता जाए, फिर भी विकास जारी रहता है क्योंकि पूर्णता मृत्यु है। जो भी चीज पूरी हो जाती है, वह मर जाती है। तुम कितने ही तृप्त होते जाओ, फिर भी तुम पाओगे कि हर तृप्ति और अतृप्त कर जाती है। यह ऐसा जल नहीं है कि तुम पी लो और तृप्त हो जाओ। यह ऐसा जल है कि तुम्हारी प्यास को और बढ़ाएगा। इसके गहन रहस्य को खोजते-खोजते मनीषियों, दार्शनिकों, चिंतकों, वैज्ञानिकों को सदियां लग गयीं, पर प्रेम अधूरा ही रहा। कारण कि प्रेम आदि अनादि है, इस जगत में परमात्मा का प्रतिनिधि। परमात्मा कभी पूरा नहीं होगा, उसकी पूर्णता बड़ी गहन अपूर्णता जैसी है। उस पूर्ण में और पूर्ण को डाल दो, तो भी वह उतना ही रहता है, जितना था। वह जैसा है, वैसा ही है; उसमें घट-बढ़ नहीं होती। सचमुच कबीर का प्रेम दर्शन निराला है।


 

संत कबीर की विरासत

वाराणसी के कबीर मठ में रखी पत्थर की एक चक्की इस महासंत की विरासत के रूप में लोगों के आर्कषण का प्रमुख केन्द्र है। इस चक्की से जुड़ा कथानक खासा दिलचस्प है। कहते हैं कि अरब देश के बुखारा शहर में सुल्तान इब्राहीम अपनी जिज्ञासाओं आर शंकाओं के समाधान के लिए साधुओं फकीरों से तरह तरह के अटपटे सवाल पूछता था। जिनके उत्तरों से वह संतुष्ट नहीं होता, उन्हें कैदखाने में डालकर उनसे चक्की पिसवाता था। संत कबीर के पंजाब भ्रमण के दौरान उनके अनुयायियों ने बुखारा में संतों को दी जा रही इस यातना की जानकारी उन्हें दी। कबीर बुखारा पहुंचे और वहां संतों और फकीरों को दी जा रही यातना देखकर दुखी हुए। कबीर ने उनसे कहा कि आप भगवत भजन कीजिए, जिसकी कृपा से यह चक्की अपने आप चलेगी और उन्होंने यह कह कर चक्की को छू दिया। उनके छूते ही चक्की चलने लगी। कहा जाता है कि तबसे वह चक्की लगातार चल रही है। कालान्तर में कबीर पंथ के पांचवें संत लाल साहब उस चक्की को भारत ले लाये और उसे काशी के कबीर मठ में स्थापित कर दिया।

इस चक्की के अलावा कबीरचौरा के इस मठ में संत कबीर की रचनाएं भी संग्रहीत हैं। "बीजक" उनकी मूल रचना है और कबीर पंथ के अनुयायी बीजक को ही अपना धर्मग्रंथ मानते हैं। कबीरदास के परिनिर्वाण के बाद "बीजक" की हस्तलिखित पांडुलिपि को कबीर मंदिर के स्मृति कक्ष में उनकी जर्जर खड़ाऊं और उनके इस्तेमाल किए लकड़ी के बर्तन के साथ रखा गया है. यहां एक हजार से अधिक लकड़ी की मणिकाओं वाली कबीर की एक माला भी है जो उनके गुरु स्वामी रामानन्द ने संत कबीर को दी थी। मठ में कबीर साहित्य और संत साहित्य का एक समृद्ध पुस्तकालय भी है जिसमें करीब सात सौ पांडुलिपियां भी पुस्तकालय में रखी गई है। गौरतलब हो कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय कबीरचौरा मठ यह क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र भी रह चुका है।वर्तमान समय में मठ में मौजूद कबीर के जीवन दर्शन पर आधारित मूर्तियां और तैल चित्र भी आकर्षण का केंद्र है।

उत्तर प्रदेश सरकार संत कबीरनगर जिले में स्थित कबीर निर्वाण स्थली मगहर में 24 करोड़ की लागत से जल्द ही एक इंटरनेशनल रिसर्च सेंटर (अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान) बनाने जा रही है। शासन से जुड़े सूत्रों ने बताया कि संत कबीर की स्मृतियों को देश-विदेश तक पहुंचाने के लिए सरकार की ओर से यह कवायद शुरू की गयी है। संत कबीरनगर के मगहर में बनने वाली यह होगी। राज्य पुरातत्व विभाग की देखरेख में 17 एकड़ में संत कबीर के जीवन दर्शन पर केंद्रित इस अकादमी का निर्माण कराया जाएगा। राज्य का पर्यटन विभाग इसकी नोडल एजेंसी होगा। इस रिसर्च सेंटर में इंटरप्रिटेशन सेंटर, प्रदर्शनी गैलरी के अलावा 300 दर्शकों की क्षमता वाले एक सभागार के साथ पुस्तकालय, प्रशासनिक भवन, छात्रावास, कर्मचारी भवन का निर्माण भी कराया जाएगा। अकादमी की जमीन को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंजूरी प्रदान कर दी है।