जम्मू-कश्मीर का मीडिया देश के सामने परोसता है सिर्फ झूठ

कश्मीर समस्या को बढ़ाने में वहां के मीडिया की बड़ी भूमिका है। ये लोग अलगाववादी तत्वों, आतंकवादियों और पत्थरबाजों के प्रति सहानुभूति रखते हैं, उनकी असलियत तो बाहरी दुनिया से छुपाते हैं, पर सुरक्षाकर्मियों की छोटी-सी बात को भी मिर्च-मसाला लगाकर परोसते हैं।

आभा खन्ना

घाटी में एक आतंकवादी के जनाजे में शामिल लोग। इसे तो वहां का मीडिया खूब दिखाता है, लेकिन आतंकवादियों के साथ लड़ते हुए जब कोई सुरक्षाकर्मी शहीद होता है तोे उसके जनाजे में भी हजारों लोग शामिल होते हैं, पर उसे मीडिया नहीं दिखाता है। हाल ही में आतंकियों द्वारा जब द राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या हुई तो पूरे जम्मू—कश्मीर के लोगों में आक्रोश था। हजारों की संख्या में लोग उनके जनाजे में शामिल हुए। यह इस बात का प्रमाण है कि अलगाववादियों से यहां लोग त्रस्त हो चुके हैं लेकिन आतंकियों के डर के कारण वह कुछ बोल नहीं पाते हैं।

शुजात बुखारी के जनाजे में शामिल हुए हजारों लोग, लेकिन मीडिया इस तरह की फोटो नहीं दिखाता, बल्कि मारे गए आंतकियों के जनाजे में हजारों की भीड़ दिखाकर देश विरोधी लहर दिखाने की कोशिश करता है 

ये सब इसलिए क्योंकि कई दशकों से हमें योजना से यही चित्र दिखाया जा रहा है, जिसमें अलगाववाद है, भारत का विरोध है, आजादी के नारे हैं और आक्रोश के अंगारे हैं। यही तो चाहते हैं पाकिस्तान के सरगना और उनके इशारों पर नाचने वाले अलगाववादी। सच पर से पर्दा हटा कर एक नजर देखते हैं जम्मू-कश्मीर राज्य की भौगोलिक स्थिति- लद्दाख क्षेत्र सबसे बड़ा है, जिसके पास 59 प्रतिशत भूभाग है। जम्मू क्षेत्र के पास 26 प्रतिशत भूभाग है। वहीं कश्मीर क्षेत्र सबसे छोटा है, जिसके पास केवल 15 प्रतिशत भूभाग है।

जम्मू कश्मीर के 85 प्रतिशत लोग राष्ट्रवादी पर नहीं दिखाता मीडिया

लद्दाख और जम्मू में भारत विरोधी गतिविधि न के बराबर है। अत: 85 प्रतिशत भूभाग में लोग पूरी तरह से राष्ट्रवादी हैं। कश्मीर क्षेत्र में भी तीन घाटियां हैं - श्रीनगर घाटी, लोलाब घाटी और गुरेज घाटी। आपने लोलाब और गुरेज का नाम शायद ही सुना हो। आप जहां की खबरें दिनभर सुनते हैं, वह है श्रीनगर घाटी। राज्य के 15 प्रतिशत भूभाग की तीन घाटियों में से मात्र एक घाटी! इसी को आम बोलचाल में कश्मीर घाटी कहते हैं । आपके मन में प्रश्न होगा- हमारी जानकारी इतनी गलत कैसे हो सकती है? अगर श्रीनगर घाटी इतनी छोटी है तो हमें ऐसा क्यों लगता रहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर राज्य अलगाववाद से ग्रस्त है? इसमें आपका कोई दोष नहीं। यह स्थिति अधिकांश नागरिकों की है। हम सब एक षड्यंत्र का शिकार हैं। जी हां, जब भी फर्जी खबरों की चर्चा होगी तो जम्मू-कश्मीर की चर्चा होना अनिवार्य है। क्योंकि वहां का मीडिया झूठ परोसने में माहिर हो चुका है। बरसों से हमें एजेंडे के तहत वही ‘समाचार’ दिखाए जाते रहे हैं जो एक विचारधारा, एक उद्देश्य के पक्ष में हों।

लद्दाख और जम्मू के लोगों से पूछिए सच

लद्दाख और जम्मू क्षेत्र के निवासियों से कभी पूछिए वहां का सच क्या है। लोग देशभक्त हैं परंतु मीडिया उनकी समस्याओं और बातों को नजरअंदाज करता है। यहां के कई इलाके पर्यटन की दृष्टि से बहुत सुंदर और लुभावने हैं, मगर विकास की कमी के कारण पर्यटन स्थल के रूप में कभी उभर नहीं पाए। पर्यटन के नाम पर हमें कश्मीर का ही ध्यान आता है।

श्रीनगर आज एक प्रदूषित शहर बन चुका है। जिस डल झील के अति मनमोहक चित्र हम फिल्मों और इंटरनेट पर देखते हैं, वह प्रदूषण से बेहाल है। बिजली और पानी की बहुत दिक्कतें हैं। शासन प्रणाली भ्रष्टाचार की चपेट में है। सड़कों का बुरा हाल है। मगर ये सब आम जनता की परेशानियां हैं - इनके लिए यहां का मीडिया काम नहीं करता।

मीडिया की रुचि तो सिर्फ अलगाववादियों का पक्ष बताने में है। और, अगर कहें कि पाकिस्तान का पक्ष बताने में है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। घाटी के अखबार, पत्रिकाएं और टीवी चैनल-चाहे वे अंग्रेजी के हों या उर्दू के - सभी एक ही तरह की भाषा बोलते दिखते हैं । इनमें सबसे ज्यादा जगह मिलती है इन पक्षों को- हुर्रियत कॉफ्रेंस के तथाकथित नेता, पाकिस्तान के सरगना, आतंकवादी संगठनों के सरगना (पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से),पत्थरबाज और पाकिस्तान और अलगाववाद के पक्ष में बोलने वाले विदेशी।

घाटी में हुर्रियत कॉफ्रेंस की आज कोई बिसात नहीं है। हुर्रियत जब कश्मीर बंद की घोषणा करती है तो जनता कोई परवाह नहीं करती। इसके नेताओं का राजनीतिक प्रभाव इनके मोहल्लों में भी नहीं दिखता। मगर समाचार पढ़ें या सुनें तो बताया जाता है कि बंद बहुत सफल रहा।

समाचार के नाम पर यहां का मीडिया सिर्फ भारत विरोधी जहर उगलता है। पाकिस्तान का हर उल्टा-सीधा बयान ऐसे छापा जाता है जैसे वही सब कुछ हो। पत्थरबाजों से तो बहुत सहानुभूति दिखाई जाती है, मगर सुरक्षाकर्मियों के घायल या शहीद होने पर कोई बड़ी खबर नहीं बनाई जाती है। कोई कश्मीरी पत्रकार अलगाववादी नेताओं से उनके बच्चों का पता नहीं पूछता। यह भी नहीं पूछता कि आपके बच्चे जब सुकून से अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं या सरकारी नौकरी कर रहे हैं, तो कैसे आप दूसरों के बच्चों को पत्थर पकड़कर गोली खाने के लिए उकसाते हैं।

पिछले साल जब एन.आइ.ए. की जांच के दौरान कई हुर्रियत नेता फंसते दिखे, तो वहां के लोग बहुत खुश थे। मैं खुद श्रीनगर में थी। कई लोगों के मुंह से मैंने खुद सुना, ‘‘बहुत अच्छा हुआ। हुर्रियत को अब बेनकाब करना चाहिए। इन्होंने कश्मीर को सिर्फ लूटा है, जहन्नुम बना दिया है। सरकार को अपनी कार्रवाई पूरी करनी चाहिए और इन सबको अंदर कर देना चाहिए।’’ एक और बात लोगों ने बार-बार कही, ‘‘यहां के मीडिया ने ही सब गड़बड़ कर रखा है। सच कोई नहीं दिखाता।’’

क्या आप जानते हैं कि कश्मीर घाटी में कोई बाहर का पत्रकार जाकर काम नहीं कर सकता! वहां बस एक विचारधारा चलती है - अलगाववाद की। इसके साथ समझौता कर सकते हो तो ठीक, नहीं तो गोली। कई पत्रकार अपनी जान की खैर मना कर वहां से वापस आ चुके हैं। अगर किसी आतंकवादी के जनाजे में भीड़ दिखती है तो उसके फोटो खूब प्रचार में आते हैं। फिर चाहे उस भीड़ में अधिकांश लोग आतंकवादियों की गोली के डर से उपस्थित हुए हों और इस बात को स्थानीय पत्रकार भलीभांति जानता हो। लेकिन जनाजा अगर एक शहीद सुरक्षाकर्मी का हो तो उसमें आई भीड़ नहीं दिखाई जाती है।

फरवरी में जब सुंजवान हमले में चार कश्मीरी फौजी शहीद हुए तो हजारों स्थानीय लोग उनके जनाजे में शामिल हुए। दिल्ली के सभी अखबारों और चैनलों ने हजारों लोगों की भीड़ की तस्वीरें दिखार्इं। मगर कश्मीर से छपने वाले अखबारों को जैसे सांप सूंघ गया। उनके पास तस्वीरों का जैसे अकाल हो गया - तो बस छोटे से ग्राफिक से काम चलाया। वही अखबार वाले आतंकवादियों के जनाजे की हर तस्वीर बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने में कभी नहीं चूकते!

योजनाबद्ध तरीके से स्थानीय मीडिया को बुलाकर कराई जाती है पत्थरबाजी

घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। पत्थरबाजी का समय और स्थान तय होता है, तभी तो मीडिया हमेशा वहां उपस्थित होता है। मगर मीडिया के कैमरे को कभी पत्थरबाजों के गुस्से से नुकसान नहीं पहुंचता। आजकल तो साथ-साथ वीडियो भी बनते हैं, जिन्हें सोशल मीडिया में वायरल किया जाता है। गाड़ी के नीचे आते हुए पत्थरबाज का भी क्लोज-अप इतनी स्पष्टता से कैमरे में कैद होता है जैसे फिल्म बन रही हो।

दुष्प्रचार के इस षड्यंत्र से पूरे भारत की जनता पीड़ित है। झूठ के एजेंडे ने सिर्फ दूरियां बढ़ाई हैं - क्षेत्रों में, राज्यों में, समुदायों में, परिवारों में, दिलों में... इस समस्या का निराकरण जनता को ही निकालना होगा। वास्तविक स्थिति सामने लाने में जनता से बड़ा कोई समूह नहीं हो सकता।

कश्मीर में आज बहुत लोग सच को पहचानते हैं। वे समझ पा रहे हैं कि अपने स्वार्थ के लिए उनको मोहरा बनाया जाता रहा है। और उनके मन मस्तिष्क में ‘दिल्ली’ यानी भारत सरकार को लेकर जो जहर भरा गया है, वह भी एजेंडे का हिस्सा है। लोग अपनी बात कहना चाहते हैं, भारत के साथ दिखना चाहते हैं, मगर आतंकवादियों का डर उनको चुप रहने पर मजबूर करता है, क्योंकि आतंकवादी से गोली चलाने का हिसाब कोई नहीं मांगता। गोलियों का हिसाब तो केवल सुरक्षाकर्मी से मांगा जाता है। मीडिया झूठ को रोकने में सकारात्मक भूमिका निभाए। झूठ बेनकाब होता है तो नष्ट हो जाता है। लोकतंत्र में जनता सबसे शक्तिशाली है, इसकी शक्ति को पहचानना आवश्यक है।

लेखिका- जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र निदेशक (मीडिया) हैं।