कांग्रेस का बस चलता तो मौलिक अधिकार भी छीन लेती
   दिनांक 03-जून-2018

कांग्रेस ने कैसे न्यायपालिका को अपने हिसाब से चलाया ? कैसे कांग्रेस ने न्यायधीशों पर दबाव बनाया ? कैसे उसने अपने अनुसार संविधान में संशोधन किए ? ये सब आपने पढ़ा। प्रो. मक्खन लाल द्वारा लिखित तीसरी किश्त में जानिए कि कांग्रेस लोगों से उनके मौलिक अधिकार तक छीन लेना चाहती थी। इंदिरा सरकार ने 42वें संशोधन स्वर्ण सिंह समिति के जरिए राज चलाने के सारे अधिकार अपने हाथ लेने के पूरे प्रयास किए थे

30 मई 1976: इंडियन एक्सप्रेस में छपी कांग्रेस द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की रपट के समर्थन की खबर (फाइल चित्र)
आपातकाल के दौरान सत्ता के दुरुपयोग की गाथायें बढ़ती ही गर्इं। मासूम लोगों को जेल में ठूंसना, किसी भी समय घर से उठा लेना, कानूनी सहायता से नागरिकों को वंचित करना आम हो गया था। ऐसी स्थिति में लोगों ने जब अदालतों के दरवाजे खटखटाने शुरू किये तो उन्हें वहां भी निराशा ही हाथ लगी। कहा गया कि आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित हैं इसलिए कोई सुनवाई नहीं हो सकती। यह सब न केवल आम नागरिकों पर वरन् जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते, मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीस, अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, श्याम नंदन मिश्र जैसे नेताओं पर भी लागू था। सभी मौलिक अधिकार निरस्त थे। अंतत: देश की सभी अदालतों में चल रहे मुकदमे उच्चतम न्यायालय में एकत्रित हुए, जिसे शिवकांत शुक्ल बनाम अतिरिक्त जिलाधिकारी, जबलपुर के नाम से जाना जाता है। इसे अभियुक्त प्रत्यक्षीकरण (हीबियस कॉर्पस) केस के नाम से भी जाना जाता है। इस केस की सुनवाई 15 दिसम्बर, 1975 को पांच जजों-मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आदित्य नाथ रे, न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना, एम.एच. बेग, वाई.वी. चंद्रचचूड़ और पी.एन. भगवती की पीठ के सामने शुरू हुई। बंदियों की तरफ से शांतिभूषण, सोली सोराबजी, वी.एम. तारकुण्डे, राम जेठमलानी और सी.के. दफ्तरी जैसे दिग्गज वकील खड़े हुए। सरकार की तरफ से तत्कालीन महाधिवक्ता नीरेन डे ने बहस शुरू करते हुए कहा कि जब तक आपातकाल लागू है, नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निरस्त हैं। कोई भी अदालत किसी नागरिक या बंदी के ‘मौलिक अधिकारों’ के हनन के अंतर्गत किसी भी प्रकार की मामले की सुनवाई नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति खन्ना के प्रश्न कि ‘यदि कोई पुलिस वाला अकारण या व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते किसी निर्दोष नागरिक की गोली मारकर हत्या कर दे तो इसके लिए क्या निराकरण है’, महाधिवक्ता ने बिना पलक झपकाये कहा, ‘कुछ भी नहीं’। 15 दिसम्बर से शुरू होकर 37 दिनों तक चली सुनवाई के बाद 25 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया गया। पीठ की संरचना देखते हुए ज्यादातर वरिष्ठ वकीलों को विश्वास था कि न्यायमूर्ति खन्ना, चंद्रचूड़ और भगवती निश्चित ही संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा करेंगे। 28 अप्रैल, 1976 को फैसला आया तो सब हैरान रह गए! पांच में से चार जजों ने सरकार की इस दलील को सही माना था कि आपातकाल के रहते हुए संविधान का भाग-3 निरस्त है और किसी भी नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दूर, ईश्वर का दिया जीवन जीने का भी अधिकार नहीं है। सब कुछ इंदिरा गांधी पर निर्भर है। यह फैसला देने वाले चार जज थे—रे, बेग, चंद्रचूड़ और भगवती। न्यायमूर्ति खन्ना अकेले जज थे जिन्होंने व्यवस्था दी कि किसी नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने लिखा—
‘ऐसे कानून जिसमें निरोधक गिरफ्तारी या गिरफ्तारी के बाद बिना किसी अदालती कार्रवाही जेल में रखना, उन सभी के लिए जो व्यक्तिगत आजादी के हिमायती हैं, एक ईश्वरीय अभिशाप की तरह है। ऐसे कानून मूलभूत आजादी, जिसे हम सभी बहुत चाहते हंै, में गहरी जड़ें जमा लेते हैं। किसी भी राज्य या शासन के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है जिससे वह किसी के जीवन एवं अभिव्यक्ति की आजादी को छीन ले। किसी भी सभ्य समाज का यही मूलभूत सिद्धांत है।’आपातकाल के चलते किसी भी समाचार पत्र ने न्यायमूर्ति खन्ना के निर्णय का कोई जिक्र नहीं किया। और तो और, उस समय कांग्रेस की सत्ता से उच्चतम न्यायलय के जज तक कितने भयभीत थे, इसका पता 1978 में फिक्की सभागार में दिये न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के व्याख्यान से पता चलता है। उन्होंने इसी केस के सन्दर्भ में कहा था-‘मुझे पछतावा है कि मेरे अंदर साहस नहीं था कि पद से त्यागपत्र देकर नागरिकों को बता सकूं कि कानून यह है।’
 
सरदार स्वर्ण सिंह
अगर स्वर्ण सिंह समिति की सभी संस्तुतियां स्वीकार कर ली जातीं तो इस देश में आज नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी, पंथ की आजादी, संस्कृति, भाषा इत्यादि की आजादी तो दूर, जीवन जीने की भी आजादी न होती। उच्चतम एवं उच्च न्यायालय शासन के पिछलग्गू बनकर रह जाते।

  नानी पालखीवाला
नानी पालखीवाला ने 22 नवम्बर 1976 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा- ‘‘आज दीपावली है-प्रकाश का त्योहार। अब जब कि घरों में और बाहर लाखों-करोड़ों दिये जगमगाएंगे... हमारे संविधान का दीपक अस्त हो चुका होेगा। आज स्वतंत्रता मृतप्राय हो गयी है।’’
आपातकाल लगने के बाद जहां संविधान संशोधनों की बाढ़ आ गई थी वहीं हमने देखा कि उच्चतम न्यायलय में ज्यादातर संशोधन निरस्त होते गए थे। न्यायालय की निगाह में ये संशोधन संविधान के मूलभूत ढांचे को प्रभावित करते थे। उच्चतम न्यायालय के द्वारा स्थापित मूलभूत ढांचे का सिद्धांत इंदिरा गांधी के मनमाने संशोधनों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा था। वे इससे छुटकारा चाहती थीं। लोकसभा में 27 अक्तूूबर, 1976 को श्रीमती गांधी ने कहा, ‘हम मूलभूत ढांचे के रूढ़िवादी विचार को नही मानते।’ उससे पहले कानून मंत्री एच.आर. गोखले अगस्त 1975 में बयान दे चुके थे कि ‘समय आ गया है कि हम संविधान में आमूलचूल परिवर्तन करें।’ फिर क्या था, कांग्रेस नेताओं जैसे वसंत साठे, ए.आर. अंतुले, स्टीफन और यहां तक कि न्यायाधीशों ने भी बयान देना शुरू कर दिया। विधि आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष गजेन्द्र गडकर ने खुलेआम संविधान के मूलभूत ढांचे के सिद्धांत पर अपना रोष जाहिर किया। हद तो तब हो गई जब पीठासीन न्यायाधीशों—वी. आर. कृष्णा अय्यर और पी. एन. भगवती—ने यहां तक कह दिया कि, ‘‘जिस देश में ज्यादातर आबादी अनपढ़ हो और गांवों में रहती हो वहां के लिए यह न्याय व्यवस्था बेकार है।’’ इंदिरा गांधी के चचेरे भाई बी.के. नेहरू ने 1975 के अंत में उन्हें पत्र लिखकर संविधान को बदलने की बात कही। इसके साथ ही एक घटना और जुड़ी हुई है। 1975 के अंत में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास कर कहा गया कि संविधान को पूरी तरह से खंगालकर देखा जाये और जहां जरूरत हो, वहां व्यापक फेरबदल किया जाए। कुछ कांग्रेस नेता तो एक नई संविधान सभा की भी बात करने लगे थे। इस सब पर विचार करने के लिए सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की समिति बनाई गई। इस पर हम आगे चर्चा करेंगे, फिलहाल 42वें संशोधन की कुछ बात करना जरूरी है।
संविधान में 42वां संशोधन
पाठकों को ध्यान होगा कि केशवानंद भारती केस में उच्चतम न्यायलय ने निर्णय दिया था कि संविधान संशोधन के लिए संसद के अधिकार सीमित हैं और संशोधनों के माध्यम से संविधान के मूलभूत ढांचे को बदला नहीं जा सकता। हमें यह भी ध्यान होगा कि इस फैसले को बदलने के लिए सरकार ने उच्चतम न्यायलय में अपील भी की थी और इस पर विचार भी शुरू हो गया था। यह बात अलग है कि उच्चतम न्यायलय ने खुद ही पुनर्विचार याचिका निरस्त कर दी थी।
स्वर्ण सिंह समीति के अनुमोदन पर अक्तूूबर 1976 में 44वां संविधान संशोधन संसद में पेश किया गया,जो पारित होने के बाद 42वें संशोधन के नाम से जाना गया। यह संशोधन संविधान की आत्मा और उसके मूलभूत स्वरूप पर सबसे बड़ा निर्मम प्रहार था। इस संशोधन के माध्यम से संविधान के 59 अनुच्छेदों को बदला, निकाला या जोड़ा गया था। बंबई के प्रख्यात विविवेत्ता नानी पालखीवाला के अनुसार, इस 42वें संशोधन से संविधान के मूलभूत ढांचे का सिद्धांत पूरी तौर पर बिखर गया। संशोधनों के तहत कहा गया कि—
1. संशोधन ने संविधान को सर्वोच्चता के आसन से उतारकर संसद के अधीन कर दिया। अनुच्छेद 368 में धारा 4 और 5 डाली गर्इं, कहा गया कि ‘संविधान को संशोधित करने की संसद की शक्ति असीमित है।’ दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, संसद संविधान को कूड़ेदान में भी फेंक सकती है। तमाम कांग्रेसी सांसद तो नई संविधान सभा की बात कर ही रहे थे।
2. भाग-3 में निहित नागरिकों के ‘मौलिक अधिकार’ में कोई भी संशोधन किया जा सकता है, जिसे किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. अदालतों को किसी भी संशोधन की समीक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया।
4. संशोधन में यह भी डाला गया कि किसी भी कानून को अदालतों को गैर कानूनी घोषित करने का अधिकार नहीं होगा।
विश्व के किसी भी सभ्य देश के संसदीय इतिहास में संविधान के साथ ऐसा खिलवाड़ नहीं किया गया। नानी पालखीवाला ने 22 नवम्बर,1976 को इंडियन एक्सप्रेस में लिखा-‘आज दीपावली है-प्रकाश का त्योहार। अब जब कि घरों में और बाहर लाखों-करोड़ों दीये जगमगाएंगे...हमारे संविधान का दीपक अस्त हो चुका होेगा। संविधान का हर संशोधन देश में तात्कालिक मानसिक स्थिति का द्योतक होता है। आज जब देश में स्वतंत्रता मृतप्राय हो गयी हो, कुछ भी स्वतंत्र रूप से कहना असंभव है; जो कुछ संविधान के साथ हो रहा है वह तात्कालिक लाभ के लिए है। यह भूलते हुए कि संविधान पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली अमानत है।’’
स्वर्ण सिंह समिति की रपट
संविधान में 42वां संशोधन तो मात्र बानगी थी। यहां बता दें कि यह संशोधन बिल स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर आधारित था। स्वर्ण सिंह समिति ने कुछ और भी अनुशंसाएं की थीं, जिनमें से मुख्य थीं-
1. हमारे यहां ब्रिटिश संसदीय एवं सरकार व्यवस्था है जिसमें प्रधानमंत्री मुख्य कार्यकारी अधिकारी है और सभी मंत्री संसद के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। हमें इसको बदलकर अमेरिकी तर्ज पर राष्ट्रपति व्यवस्था लागू करनी चाहिए। यह अनुमोदित किया गया कि भारत में राष्ट्रपति के पास अमेरिका के राष्ट्रपति से भी ज्यादा शक्तियां होंगी। भारतीय राष्ट्रपति के पास वे सभी अधिकार होंगे जो अमेरिकी राष्ट्रपति के पास हैं, साथ ही भारत के राष्ट्रपति के पास वे अधिकार भी होंगे जो अमेरिकी संसद के पास हैं। इसके अलावा भारत के राष्ट्रपति के पास वे अधिकार भी होंगे जो आज भारत में मंत्रिमंडल के पास हैं। मंत्रिमंडल राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह होगा और अमेरिका की तरह भारत में संसद स्वतंत्र नहीं होगी, बल्कि राष्ट्रपति के अधीन काम करेगी।
2. न्यायपालिका में एक ‘सुपीरियर काउंसिल आफ ज्यूडीशियरी’ होगी। राष्ट्रपति इस परिषद के अध्यक्ष होंगे। परिषद् के सदस्य होंगे-(1) विधि एवं न्याय मंत्री; (2-5) चार सदस्य जिन्हें राष्ट्रपति नामित करेंगे; (6-10) चार गणमान्य सदस्य जिन्हें संसद खुद चुन कर भेजेगी; (10)उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश;(11-12) उच्चतम न्यायलय के दो न्यायाधीश; (13-14) उच्च न्यायालयों से दो मुख्य न्यायाधीश।
परिषद का गठन ऐसा किया गया था कि 15 सदस्यों में से 10 यानी दो तिहाई राजनीतिज्ञ होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे, जो उस पार्टी से होंगे जिसका संसद में बहुमत होगा। यह परिषद सर्वशक्तिमान थी। इसे संविधान और कानून की व्याख्या के अधिकार के साथ-साथ किसी भी तरह विधेयक की मान्यता स्थापित करने का अधिकार था। इस परिषद के द्वारा दिए गए निर्णय अंतिम माने जायेंगे और सभी न्यायालयों उन्हें मानने को बाध्य होंगे। इस तरह से अदालतों के हाथ से कानून एवं संविधान को परिभाषित करने के अधिकार ले लिए गए। राष्ट्रपति/परिषद के अध्यक्ष को अधिकार था कि वह किसी भी जज के खिलाफ शिकायतों को सुने और उन्हें हटा दे या सेवा मुक्त भी कर दे।
समिति की अन्य अनुशंसाएं
स्वर्ण सिंह समिति ने अनुच्छेद-13 को बदलने की अनुशंसा की। इस अनुच्छेद में था कि ऐसे सभी कानून अमान्य होंगे जो नागरिकों के ‘मौलिक अधिकारों’ का हनन करते हों। समिति ने संस्तुति की कि किसी भी कानून को संविधान की आड़ में अमान्य नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद-32 के तहत हर नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह उच्चतम न्यायलय में जुल्म के खिलाफ न्याय की गुहार लगाये और किसी भी खोये हुए व्यक्ति को प्रत्यक्ष लाने की प्रार्थना करे। न्यायालय को भी यह अधिकार है कि वह शासन / प्रशासन को बाध्य करे कि उस व्यक्ति को अदालत में प्रस्तुत करे। इस कानून को पूरी तरह से खत्म करने की सिफारिश की गई थी। सबसे दिलचस्प बात तो न्यायालय की पीठों के गठन और निर्णय प्रक्रिया के बारे में कही गयी थी। समिति ने सिफारिश की कि ऐसे सभी केस, जिनसे संवैधानिक व्यवस्था का प्रश्न जुड़ा हो, उन पर उच्चतम न्यायालय की कम से कम सात जजों की पीठ और उच्च न्यायालयों में पांच जजों की पीठ सुनवाई करेगी। और किसी भी कानून को अमान्य घोषित करने के लिए कम से कम दो तिहाई जजों की सहमति होनी चाहिए। यह तो बड़े से बड़ा गणितज्ञ भी नहीं बता पायेगा कि सात और पांच के अंकों का दो तिहाई पूर्णांक क्या होगा। अगर स्वर्ण सिंह समिति की ये सभी संस्तुतियां स्वीकार कर ली जातीं तो इस देश में आज नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी, पंथ की आजादी, संस्कृति, भाषा इत्यादि की आजादी तो दूर, जीवन जीने की भी आजादी न होती। उच्चतम एवं उच्च न्यायलय शासन एवं प्रशासन के पिछलग्गू बनकर रह जाते। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, यह देश का सौभाग्य है। याद रखना चाहिए कि ईश्वर का भी एक विधान है जो उसी के हिसाब से चलता है। कोई जरूरी नहीं कि मनुष्य के बनाये विधानों से वह सहमत हो। 42वें संशोधन में संविधान की लहूलुहान स्थिति को हम देख चुके हैं। मार्च, 1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हारकर सत्ताच्युत हो चुकी थीं, फिर उन संशोधनों का क्या हुआ? मोरारजी देसाई सरकार ने 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को खत्म कर दिया था। रही-सही कसर उच्चतम न्यायलय ने मई 1980 में मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम यूनियन आॅफ इंडिया के फैसले में पूरी कर दी। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि-1.संसद को संविधान ने सीमित अधिकार दिए हैं, ऐसे में संसद असीमित अधिकार की बात नहीं कर सकती। 2.संशोधन के सीमित अधिकार खुद में संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हंै। 3.न्यायालयों को संशोधनों की समीक्षा से वंचित करना अपने आपमें मूल ढांचे को तोड़ना है। इन टिप्पणियों के साथ अंतत: उच्चतम न्यायालय ने 42वें संशोधन के उन सभी प्रावधानों को खत्म कर दिया जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थे।
(लेखक इतिहासकार एवं स्तंभकार हैं)