सबक कैराना से आगे हैं
   दिनांक 03-जून-2018
कैराना! इस एक शब्द ने दर्जनों हताश चेहरों पर चमक ला दी है। मुख्यधारा की राजनीति में बुहार दिए गए दलों और उनके दिग्गजों के दिलों में अरमानों के लाखों दिए जल उठे हैं। निशाना एक है इसलिए बाकी चार सीटों का जिक्र जरूरी नहीं है। महाराष्ट्र की पालघर सीट पर भाजपा जीती है तो उसका जिक्र तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि भाजपा की जीत नहीं भाजपा की हार ही ‘खबर’ है। बहरहाल इन परिणामों जो संदेश निकलना था वह एकदम साफ है। हाल ही में हुए चुनावों को लेकर पाञ्चजन्य संपादक हितेश शंकर का विश्लेषण :-

 
 
 
किसी और सीट का जिक्र हो न हो, लेकिन क्या कैराना का संदेश वास्तव में इतना बड़ा है जो बाकी सब खबरों और आकलनों को ढक ले! यह सोचने वाली बात है। असल में मुस्लिम मतदाताओं की भारी संख्या वाली यह सीट ऐसी है जो कभी भाजपा की परंपरागत सीट नहीं रही। ऐसे में भाजपा उम्मीदवार को हराने और जीत की डुगडुगी बजाने के लिहाज से विपक्ष के लिए निश्चित ही कैराना मौके का मोर्चा था।
किन्तु जिस घड़ी खबरों में उपचुनाव के नतीजों की झांझ बज रही है, भारतीय जनता पार्टी, इसका विरोध करने वाले तमाम राजनैतिक दलों और इस पूरे लोकतंत्र के लिए चिंता के कुछ अलार्म भी बज रहे हैं।
-भाजपा के लिए चिंता की बात है उसके साथियों का रूठना-छिटकना।
हालांकि दोनों जगह परिस्थिति और समीकरणों में पर्याप्त भिन्नता है, किन्तु आंध्र प्रदेश के बाद महाराष्टÑ वह दूसरा राज्य है जहां राष्टÑीय जनतांत्रिक गठबंधन के मित्र-घटक त्यौरियां चढ़ाए हैं। नहीं भूलना चाहिए कि पालघर सीट पर भाजपा की जीत में शिवसेना प्रत्याशी की हार भी शामिल है। साथियों के बंटने की कसक यदि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस की प्रतिक्रिया में झलकती है तो इस टीस का गहरा मंतव्य है।
- भाजपा विरोधी विपक्ष (अब इस लामबंदी के लिए यही नाम सबसे उचित जान पड़ता है क्योंकि अपने नाम, पहचान विचार और विरोध को तात्कालिक तौर पर किनारे रख दिया गया है) के लिए चिंता की बात जरा ज्यादा है।
कैराना का बाजा विजय के अनुपात से ज्यादा बजाया जा सकता है और इस पर मनाही भी नहीं है, किन्तु सचाई यह है कि इस शोर का असर दलबंदी और फुटकर टोलियों से बाहर कहीं नहीं है। इस हल्ले और छोटी जीत के बड़े उन्माद में गुंथी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सारी विपक्षी एकता का आधार नकारात्मक है। नकारात्मकता के ऐसे बोझ के साथ न तो देशभर में चला जा सकता है और न ही अन्य सीटों पर उन्मादी ध्रुवीकरण के कैराना जैसे कारक हैं। इसके अलावा स्थानीय क्षत्रपों के गहरे अंतर्विरोध क्षणिक तौर पर भले शांत दिखें, इनका उजागर होना तय है। (न भूलें कि मायावती घोषणा कर चुकी हैं कि सम्मानजनक सीटें न मिलीं तो वे अकेले चुनाव लड़ेंगी)
-अब जिक्र उस चिंता का, जिसका दायरा दलगत राजनीति से बड़ा है और जो ज्यादा भयावह है। प. बंगाल के बलरामपुर में तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने 18 वर्ष के युवा भाजपा कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो की हत्या कर शव पेड़ से लटका दिया। शव के साथ एक ऐलानिया पत्र में ‘..भाजपा के लिए काम करने वालों का यही अंजाम होगा’ की धमकी भी नत्थी थी। त्रिलोचन महतो की हत्या कोई सामान्य घटना नहीं है। यह प. बंगाल में शासन और राजनीति के अधोपतन की मुनादी भी है। यह इस बात का संकेत भी है कि मार्क्सवादी पार्टी की जिस उत्पाती-खूनी राजनीति ने तृणमूल में कायाप्नवेश किया वह अब किसी भी विरोधी को ‘लील’ जाने के लिए व्याकुल है।
प. बंगाल की घटना पर यदि कोई दल केवल इसलिए चुप है कि घटना भाजपा कार्यकर्ता के साथ हुई है, या फिर संभावित तीसरे मोर्चे के अनेक संभावित नेताओं में एक संभावित नाम ममता बनर्जी का भी है, और उनके विरोध में जुबान खोलना भविष्य में आकार लेने वाले मोर्चे की एकता के लिए खतरनाक हो सकता है, तो यह शर्म से डूब मरने वाली बात है। केरल में चलती या प. बंगाल में और बड़ा आकार लेती खूनी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए कलंक है। खून के इन धब्बों और वहशी होती राजनीति पर मौन रहना किसी एक पार्टी के विरोध या समर्थन की लामबंदी नहीं वरन् भारतीय लोकतंत्र पर आघात करते गुंडा तत्वों का छिपा समर्थन ही कहा जाएगा। बहरहाल, उपचुनाव के नतीजों की चीरफाड़ या मदहोशी से उबरिए। यह जरूरी है क्योंकि लोकतंत्र के हत्यारे अपने काम पर निकले हैं। जरा सी गफलत किसी एक दल नहीं, इस देश पर भारी पड़ सकती है।