फर्जी खबरों के जश्न में डूबा मीडिया
   दिनांक 05-जून-2018

अपराध की घटनाओं पर मीडिया की चटखारेबाजी की प्रवृत्ति अत्यंत विनाशक

सामयिक मुद्दों पर मीडिया के रुख और रुखाई की परतें खंगालता यह स्तंभ समर्पित है विश्व के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद के नाम। मीडिया में वरिष्ठ पदों पर बैठे, भीतर तक की खबर रखने वाले पत्रकार इस स्तंभ के लिए अज्ञात रहकर योगदान करते हैं और इसके बदले उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता। 

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं को हमारा ह्यमीडिया सहज और स्वाभाविकह्ण मानता है। म्यांमार में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार पर मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देखकर यही लगता है। खबर सबने दिखाई, लेकिन वो हंगामा कहीं नहीं दिखा, जिसे पैदा करने के लिए मीडिया जाना जाता है। ज्यादातर ने इसे सामान्य विदेशी समाचार की तरह दिखाया, बिना इस बात की चर्चा किए कि वे हत्यारे हजारों की संख्या में भारत में घुस चुके हैं। रोहिंग्या घुसपैठियों के मानवाधिकारों के लिए अभियान चलाने वाले मीडिया संस्थान हिंदुओं के नरसंहार की बात आते ही 2 मिनट की खबर दिखाने और आगे बढ़ने की पुरानी नीति पर लौट आए। यही वह मानसिकता है जिसके कारण बंगाल में भाजपा कार्यकर्ता को पेड़ से लटकाकर मार देने की घटना भी सामान्य और सहज लगती है। यह खबर सिर्फ रिपब्लिक और जी न्यूज पर दिखी। बाकी जिन्होंने भी थोड़ा-बहुत दिखाया वे इस बात को छिपा गए कि घटना से ठीक पहले ममता बनर्जी के एक रिश्तेदार ने पुरुलिया जिले को 'विपक्ष मुक्त' बनाने का ऐलान किया था।

केरल में कन्वर्ट करके ईसाई बनाए गए एक दलित परिवार के लड़के की हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने ऊंची जाति के रोमन कैथोलिक परिवार की लड़की से शादी की थी। इस खबर पर पूरे मीडिया को मानो लकवा मार गया। दलितों पर अत्याचार के मामलों में खुद को संवेदनशील दिखाने वाले तमाम अखबारों, चैनलों ने इस खबर को दबा दिया। जिन्होंने छापा भी, उन्होंने बस इतना बताया कि यह ह्यआॅनर किलिंगह्ण का मामला है।

दरअसल दलितों के मामले में ज्यादातर चैनल और अखबार कांग्रेस की दी हुई लकीर पर चल रहे हैं। केरल, बंगाल, कर्नाटक जैसे राज्यों में दलितों पर अत्याचार ज्यादा महत्व नहीं रखता। बिहार में राघोपुर में लालू के समर्थकों पर दलितों की बस्ती जलाने का आरोप लगा। लेकिन स्थानीय अखबारों ने इसे आग लगने की सामान्य घटना की तरह छापा। जबकि सोशल मीडिया के जरिए सामने आ रही जानकारी कुछ और ही कहानी कहती है। इन समर्थकों ने दलितों की बस्ती जला दी और मीडिया खबर छिपा रहा है। समझना मुश्किल नहीं है कि कारण क्या है। उधर, जनमत सर्वेक्षणों से देश का मूड भांपने की कोशिश के नाम पर प्रायोजित राजनीतिक खेल भी शुरू हो गए हैं। एबीपी न्यूज और इंडिया टुडे समूह ने ऐसे सर्वेक्षण दिखाए। उनमें बड़ी सफाई से उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को हारता दिखाया। ये तरीका होता है चुनाव से पहले कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने का। दोनों ही समाचार समूहों में लोगों को पता था कि ये सर्वेक्षण कितने जमीनी हैं और आकलन पहले से तय दिशा में हैं।

देसी अखबारों, चैनलों में ह्यफेक न्यूजह्ण आए दिन की बात है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी पीछे नहीं हैं। रॉयटर्स ने गुजरात में कपड़ा मजदूरों की बेरोजगारी पर रिपोर्ट छापी और उसमें सबूत के तौर पर जो तस्वीर और वीडियो लगाया वह तमिलनाडु का था। इसी तरह बीबीसी ने रिपोर्ट छापी कि देहरादून में लव जिहाद के एक आरोपी को भीड़ से बचाने वाले पुलिसकर्मी को धमकियां दी जा रही हैं। जबकि खुद उस पुलिसकर्मी ने रिपोर्ट को गलत ठहराया है।

गुरुग्राम में पिछले दिनों एक लड़की का शव बरामद हुआ तो मीडिया ने इसे कानून-व्यवस्था की विफलता बताते हुए खूब तूल दिया। लेकिन जैसे ही पता चला कि हत्यारा एक ह्यलव जिहादीह्ण है, जो नाम बदल-बदलकर लड़कियों को शिकार बना रहा था, यह खबर गायब हो गई। अपराध की खबरों को चटखारे लेकर दिखाने वाले 'क्राइम पत्रकारों' ने भी इस मामले में कान और आंख बंद कर लिए।