जीवन का शतक लगा चुके नन्ना जी आज के नेताओं के लिए मिसाल हैं
   दिनांक 06-जून-2018
राजनीति में रहकर सात्विक जीवन कैसे किया जाता है नन्ना जी इसकी मिसाल हैं। वह आज के नेताओं के लिए भी एक उदाहरण हैं। जीवन काल का शतक लगा चुके नन्ना जी आज भी पूरी तरह स्वस्थ हैं। उनके पास बताने के लिए आजादी के आंदोलन बहुत से किस्से हैं। आजादी की लड़ाई के जिन वीरों की गाथाएं हमने सुनी हैं उनमें से बहुत से लोगों को उन्होंने प्रत्यक्ष देखा है। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मीनारायण गुप्ता है, लोग उन्हें प्यार से नन्ना जी कहते हैं। आज ही के दिन 6 जून 1918 को नन्ना जी का जन्म हुआ था।


बुलंद हौसला गजब सादगी
 
'नन्ना जी' जैसे नेता विरले होते हैं। वे पांच बार विधायक और दो बार कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। इसके बाद भी उनके पास न तो मोबाइल है, न ही फोन। गाड़ी का तो सवाल ही नहीं है।
उम्र 100 बरस लेकिन हौसला देखने वाले को दंग कर देता है। सादगी ऐसी कि किसी को भी मोहित कर दे। सहजता, सरलता, ईमानदारी व विनम्रता जैसे गुणों के चलते दुश्मन भी उनका कायल हो जाता है। किसी के भी सुख-दुख में शामिल होना, उनके व्यवहार का अहम हिस्सा है। वे एक ही निर्वाचन क्षेत्र से 5 बार विधायक व दो बार कैबिनेट मंत्री रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी न तो कोई मोबाइल रखते हैं न आवास पर टेलीफोन और चमचमाती कार दूर की बात। एक पुश्तैनी मकान है जहां आज भी लोग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचते हैं और वे समस्यायों के निराकरण के लिये जिलाधिकारी कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक के चक्कर लगाते हुए दिखाई दे जाते हैं। ये सारी बातें किसी व्यक्ति के लिए आज के समय सुनने-पढ़ने में थोड़ी अटपटी लग सकती हैं लेकिन यह सच है। आज के चमक-दमक और तकनीकी के दौर में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो, जो इसके आकर्षण से बच पाया हो। और जब बात राजनीति की तो इस बारे में सोचना तक कठिन हो जाता है। लेकिन हमारे बीच में ही कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो राजनीति में होकर भी चमक-दमक में न पड़कर समाजसेवा में लगे हैं। इन्हीं में से हैं।
 
हिंदू महासभा से हुआ सार्वजनिक जीवन में प्रवेश
 
मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की ईशागढ़ तहसील के श्री लक्ष्मीनारायण गुप्ता को लोग प्रेम से नन्ना जी कहते हैं। क्षेत्र की लोग उन्हें प्रेम से 'नन्ना जी' के नाम से बुलाते हैं। नन्ना जी का जन्म 6 जून, 1918 को ईशागढ़ में हुआ। उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत 1944 में हिन्दू महासभा से हुई। तब से अब तक वह राजनीति के माध्यम से समाजसेवा वे करते आ रहे हैं। उन्हें निकट से देखने वाले मानते हैं कि अब राजनीति में इस प्रकार के गुणों में रचा-बसा जनप्रिय नेता मिल पाना असंभव ही है। 1945 में ग्वालियर राज्य के प्रजासभा (विधानसभा) के निर्वाचन में विजयी हुए हिन्दू महासभा के प्रत्याशी चनावनी के दीवान वरजोर सिंह के सहयोगी की भूमिका में क्षेत्र की जनता ने उन्हें निकट से जाना-समझा। 1947 में लक्ष्मीनारायण हिन्दू महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। यह बात शिवपुरी एवं पिछोरवासियों को गौरव प्रदान करने वाली थी क्योंकि उस समय स्व. डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

मात्र 700 रुपए में लड़ा था पहला चुनाव
 
आज जबकि चुनाव में नेताओं द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं लेकिन नन्ना जी ऐसे नेता रहे हैं जो अपनी साख के चलते चुनाव जीतते थे। महज 700 रुपए में उन्होंने पहला चुनाव लड़ा था। यही नहीं नन्ना जी को 1948 में गांधी जी की ह्त्या के बाद गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन महीने भर बाद प्रशासन को उन्हें साथियों सहित छोड़ना पड़ा। समाज में बढ़ती पैठ और लोगों की सेवा के लिए रात-दिन एक करने के चलते 1949 में नन्ना जी को सहकारी बैंक का निदेशक बनाया गया। उसी के कुछ समय बाद 1952 के निर्वाचन में शिवपुरी के पिछोर को दो निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया। नन्ना जी पिछोर उत्तर से चुनाव लड़े और 700 वोटों से विजयी हुए। आज के चुनाव में प्रत्याशियों के अथाह खर्च को देखकर अपने पहले चुनाव के बारे में नन्ना जी बताते हैं,''मैंने पहला चुनाव कुल 700 रु. में लड़ा और यह सब जनता के सहयोग से ही एकत्र हुआ था।'' 1957, 1962 तथा 1967 के उन्होंने लगातार विधानसभा चुनावों में सफलता प्राप्त की। 1967 में राजमाता सिंधिया की स्वतंत्र पार्टी एवं 1990 में भाजपा की ओर से भी वे इसी क्रम में निर्वाचित हुए। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगता है कि 1967 के चुनाव में जहां उन्हें 29000 से अधिक मत प्राप्त हुए, वहीं उनके कांग्रेसी प्रतिद्वंद्वी को महज 3000 के लगभग वोट ही मिल सके। यह उनका प्रभाव ही था कि 1944 से 1972 तक पिछोर में कांग्रेस को झंडा लगाने वाला भी नहीं मिलता था। इस लोकप्रियता का कारण जनता के प्रति उनकी सेवाभावना थी।

अपने पैसे से बनाया डिग्री कॉलेज
 
साठ के दशक में जब जिला मुख्यालय पर कॉलेज नहीं होते थे, तब उन्होंने अपने स्वयं की वकालत के मेहनताने से पिछोर में छत्रसाल डिग्री कॉलेज की स्थापना की। साथ ही साथ कई नहरों और सड़कों के निर्माण में योगदान दिया। आज भी वे एक नदी परियोजना के लिये प्रयासरत हैं। अपने राजनीतिक जीवन में 1967 में गोविंद नारायण सिंह और 1990 में सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्रित्व काल में वे काबीना मंत्री रहे। अपने संघर्षशील जीवन और सिद्धांतवादी सोच के चलते उन्हें वीर सावरकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, प.दीनदयाल उपाध्याय जैसे मार्गदर्शकों के साथ काम करने का अवसर मिला तो दूसरी तरफ श्री अटल बिहारी वाजपेयी कुशाभाऊ ठाकरे के भी वे अत्यंत नजदीकी रहे।

धूमधाम से मनाया जा रहा है जन्मदिन
 
नन्ना जी के जीवन का शतक पूरा करने के उपलक्ष्य मेें उनका जन्मदिन बड़े हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है,जिसमें गांव-गांव जाकर नशा मुक्ति, जल एवं पर्यावरण संरक्षण के साथ पेड़ लगाने का संकल्प दिलाया जा रहा है।


100 बरस की उम्र का राज
 
नन्ना जी लंबी उम्र का राज बताते हैं। पूरी उम्र में कभी चाय नहीं पी। तंबाकू, सिगरेट जैसे व्यसनों से हमेशा दूर रहे। सुबह आठ से नौ बजे के बीच एक ग्लास गाय के दूध के साथ 3 लहसुन की कली खाते हैं। वह कहते हैं कि लहसुन औषधि की तरह काम करता है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है इस कारण वह बीमार नहीं होते। वह सुबह पांच बजे उठते हैं। अपने हॉल में 20 मिनट टहलने के बाद दो घंटे अखबार पढ़ते हैं। नन्ना जी को किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक है। वह बिना चश्मे के किताब पढ़ते हैं और बिना सहारे के ही चलते हैं। पिछले तीन बरसों में उन्होंने विधानसभा लाइब्रेरी से मंगाकर 150 पुस्तकें पढ़ी हैं।