सुख की शाखा: संघ को जानना है तो शाखा आकर देखो यहां सबका स्वागत है.
   दिनांक 07-जून-2018

यहां प्रसिद्धि, अपना नाम नहीं, शाखा के मैदान की मिट्टी है! शाखा को समझना है तो इसके आकार और इसमें सम्मिलित होने वालों की आयु पर न जाइए। यहां भगवा ध्वज के सामने व्यायाम करते सिर्फ दो-तीन लोग भी दिख सकते हैं और कबड्डी में ताल ठोकती, भारतमाता की जय का उद्घोष करती विशाल टोलियां भी। यहां गंभीरता से 'बौद्धिक चर्चा' करते बच्चे दिख सकते हैं और ठिठोलियां करते बुजुर्ग भी। इन चित्रों में से किसी एक को लिया तो संघ को पूरी तरह समझा नहीं जा सकेगा। यह परस्पर उलट दिखने वाले नजारे हैं लेकिन इनमें विरोधाभास नहीं है, यह परस्पर पूरक हैं। छोटे-बड़े, कमजोर-मजबूत सब समवेत् जब एक विचारपथ पर बढ़ते हैं तो नन्हीं सी शाखा की अतुलनीय शक्ति का विराट चित्र उभरता है।


 

समझें शाखा को

पार्क में कबड्डी और खो-खो खेलते बच्चे। पास ही अलग टोली में ध्यान-व्यायाम करते बुजुर्ग। किसी का भी ध्यान खींचने, चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए ऐसा एक दृश्य काफी है। आज देशभर में 55 हजार से ज्यादा स्थानों पर चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं समाज का भरपूर ध्यान खींच रही हैं। पूरे समाज को आनंद और उत्साह से भर रही हैं। नागपुर में मोहिते के बाड़े से शुरू हुई शाखा की कहानी दिलचस्प है। मोहिते के बाड़े का नाम था, किन्तु शाखा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई नाम तब नहीं था। संघ का नामकरण छह माह बाद हुआ। जब चार-पांच छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर 'डॉक्टरी' पढ़े, समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने इस बाड़े में कसरत और खेलकूद शुरू की तो लोगों ने इस टोली को उपेक्षा के साथ देखा। हैरानी के साथ देखा। समय के साथ यह उपेक्षा और हैरानी तिरती गई। इसकी जगह लगाव, अपनेपन और सम्मान ने ले ली।

1925 में विजयादशमी के दिन शुरू हुई संघ की यात्रा उतार-चढ़ाव, अनुकूलता-प्रतिकूलता का ऐसा लेखा-जोखा है, जो बताता है कि समाज और इसकी सकारात्मक शक्ति पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ा जाए तो परिणाम कैसा अद्भुत होता है। यह ऐसी कहानी है जहां खुद को पीछे, नाम को पीछे रखते हुए सतत् काम के आधार पर सकारात्मक परिवर्तनों की नींव रखी गई। संघ को प्रचार नहीं चाहिए

1936 में जब नागपुर के कार्यकर्ता वसंत राव ओक दिल्ली में संघ कार्य शुरू करने के लिए भेजे गए तो उनके आने का उद्देश्य और समाचार किसी अखबार में छप गया। डॉ. हेडगेवार जी ने तुरन्त 11 दिसंबर, 1936 को वसन्तराव ओक को पत्र लिखा, 'आपके दिल्ली पहुंचने का और आप वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य करने वाले हो, ऐसा समाचार किसी की भी गलती से क्यों न हो, वार्तापत्र में प्रकाशित हुआ यह बात संगठन की दृष्टि से ठीक नहीं हुई...अपने कार्यारम्भ का प्रचार न करते हुए लोगों के सामने दृश्यरूप में कार्य आता तो स्वयमेव ही उसका प्रचार होता और यह संगठन को हितकारक होता। यह बात वहां के लोगों को समझाना, फिर ऐसा न हो इसकी चिंता कीजिए।'

बच्चों के बीच सहज भाव से खेलने वालों की कैसी अद्भुत गंभीरता है? यहां प्रसिद्धि, अपना नाम नहीं, शाखा के मैदान की मिट्टी है! शाखा को समझना है तो इसके आकार और इसमें सम्मिलित होने वालों की आयु पर न जाइए। यहां भगवा ध्वज के सामने व्यायाम करते सिर्फ दो-तीन लोग भी दिख सकते हैं और कबड्डी में ताल ठोकती, भारतमाता की जय का उद्घोष करती विशाल टोलियां भी। यहां गंभीरता से 'बौद्धिक चर्चा' करते बच्चे दिख सकते हैं और ठिठोलियां करते बुजुर्ग भी। इन चित्रों में से किसी एक को लिया तो संघ को पूरी तरह समझा नहीं जा सकेगा। यह परस्पर उलट दिखने वाले नजारे हैं लेकिन इनमें विरोधाभास नहीं है, यह परस्पर पूरक हैं। छोटे-बड़े, कमजोर-मजबूत सब समवेत् जब एक विचारपथ पर बढ़ते हैं तो नन्हीं सी शाखा की अतुलनीय शक्ति का विराट चित्र उभरता है। आज यदि संघ को समाज में सहयोग, समानता, सामूहिकता, बंधुत्व और सबसे बढ़कर 'परस्पर विश्वास' की गारंटी के तौर पर देखा जाता है तो यह बहुत बड़ी बात है। बड़ी ही नहीं यह ऐसी विलक्षण थाती है, जो विश्व में किसी अन्य जन संगठन के पास नहीं दिखती। केरल का एक कार्यकर्ता जम्मू-कश्मीर में भी अपनी राय खुलकर रखता है, बात पूरी तरह सुनी-समझी और निरपेक्षभाव से स्वीकार की जाती है तो यह सामान्य बात नहीं है। एक छोटे से बच्चे की अस्पष्ट कदाचित् उलझी हुई बात भी बड़े-बड़े कार्यकर्ता पूरे ध्यान और धैर्य से सुनते हैं, शंका समाधान करते हैं तो यह सामान्य बात नहीं है। आयु, भाषा, भूषा और भूगोल के बंधनों से परे, पहले ही संपर्क में अटूट आपसी भरोसे का आदान-प्रदान यह ऐसी अनोखी बात है जो आम व्यवहार में दुर्लभतम है, किन्तु संघ की शाखा पद्धति में सामान्य व्यवहार है। समाज जिन मुद्दों पर, जिन विचारों पर, जिस दर्शन पर एकमत हो समता के उन बिंदुओं को समग्रता से समेटता हुआ संघकार्य इस शाखा के माध्यम से आगे बढ़ा है। जाग्रत लोगों का स्वशासित, स्वअनुशासित जनसंगठन, जो किसी दबाव में आए बिना राष्ट्रीय आकांक्षाओं का मुखर स्वर है। व्यक्ति का स्वार्थ नहीं समाज का हित जिसके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो और इसके लिए सबके मन में एक सी बात चलती हो। सामान्य जन की चेतना के स्तर को स्वार्थ के स्तर से उठाकर राष्ट्र उन्नति के स्तर तक ले जाने का महत्वपूर्ण काम इस छोटी सी शाखा के माध्यम से हुआ है।

खुले मैदान में लगती सरल सी शाखा कुछ लोगों को अबूझ-दुरूह लग सकती है। शाखा या संघकार्य के बारे में आशंका-भ्रांतियों के शिकार लोगों की कुछ प्रमुख श्रेणियां हैं। पहली में वे लोग हैं, जो स्वयं लगातार किसी शाखा में गए बिना इस पद्धति के विश्लेषण का प्रयास करते हैं। यह दिलचस्प है और किसी पुस्तक को पढ़े बिना उसकी समीक्षा करने जैसा काम है। दूसरी श्रेणी उन लोगों की है, जो भ्रांत धारणाओं की बमबारी से खुद को बचा नहीं पाए और अब अन्यों की थोपी समझ को अपनी समझ मान बैठे हैं। यह ऐसी स्थिति है जहां अपूर्ण-अपुष्ट और पूर्वाग्रहग्रस्त समीक्षा के आधार पर किसी लेखक के बारे में स्थाई राय बना ली जाए।

तीसरी श्रेणी उन लोगों की है, जिन्होंने शाखा को सिर्फ सतही तौर पर समझने की कोशिश की। इसे बच्चों का खेल समझा, लेकिन बच्चे-बूढ़ों सभी को एक मैदान तक, एक ध्वज तक, एक प्रार्थना तक लाने वाले उन शांत, सादे, तपोनिष्ठ चेहरों को देखने में असफल रहे, जिन्होंने खुद अपने जीवन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए पूरे समाज का भरोसा जीता। यह केवल आवरण पृष्ठ और प्राक्कथन के आधार पर पुस्तक के बारे में राय कायम करने जैसी बात है। अविचलित, ध्येयनिष्ठ प्रचारकों-कार्यकर्ताओं के अनगिनत उदाहरण संघ ने इस छोटी सी शाखा के माध्यम से ही समाज के सामने रखे हैं। ऋषितुल्य प्रचारकों की अनवरत परंपरा है। गृहस्थ कार्यकर्ताओं तक पीढ़ी दर पीढ़ी उतरा राष्ट्रप्रेम है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आलोचक या शंकालु लोगों के लिए संघ के दरवाजे कभी बंद नहीं हुए यह कितनी बड़ी बात है। मजहबी उन्माद को पोसने वाले या वामपंथ की वैचारिकता में खूनी क्रांति तक की बातें करने वाले किसी संगठन से इस खुलेपन और उदारता की क्या कल्पना भी की जा सकती है? जिन्होंने संघ को नहीं जाना उनके लिए शाखा एक मौका है। संघ को समझना है तो उन्हें इसके व्रती कार्यकर्ताओं के संपर्क में आना, उनके जीवन में झांकना चाहिए। संघ को समझना है तो इसे किसी की कही-लिखी बातों के आधार पर नहीं, बल्कि खुद अपने अनुभव से समझना चाहिए। मैदान में लगती शाखा को सिर्फ दूर से देखना काफी नहीं, इसका घटक बनकर समाज की सामूहिक शक्ति को महसूस करना चाहिए।

समाज को उसकी क्षमता का, अच्छी चीजों पर भरोसा बनाए रखने का, स्वास्थ्य रक्षण और परस्पर सहयोग का सबक सिखलाती छोटी सी शाखा कैसे सज्जन शक्ति का विस्तार भी है और पोषण भी, यह समझना है तो शाखा से जुड़ना होगा। आखिर टहनी से जुड़ने से ही तो वृक्ष से जुड़ा जा सकता है।