प्रणब दा ने कहा डा. हेडगेवार भारत माता के महान सपूत, संघ के खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों की बोलती हुई बंद
   दिनांक 08-जून-2018

राकेश सैन

दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान की राजनी​ति , सामाजिकता व बौद्धिकता इन विचारों के विपरीत खड़ी दिखाई देने लगी हैं। यह वैचारिक असहिष्णुता का ही परिणाम है कि कुछ राजनेता व बुद्धिजीवी प्रणब मुखर्जी को संघ के कार्यक्रम में जाने से ही रोकते रहे। केवल इतना ही नहीं जब वे नहीं रूके तो कईयों ने उनके खिलाफ ही अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वर्तमान युग की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि चाहे राजनेता हो या लेखक या मीडियाकर्मी हों या कोई और सभी अपने आप को सर्वज्ञ व सर्वगुण संपन्न मान लेते हैं। हर कोई इसी अंधविश्वास का शिकार है कि वह जो कह रहा है या सोच रहा है वही अंतिम सत्य है। जिसमें मेरा लाभ वही बात ठीक और नुकसान हुआ तो वह गलत। इसी सोच के चलते वाणी में कर्कशता , भाषा में असभ्यता के साथ मिथ्यावचन और व्यवहार में हिंसा का समावेश हो रहा है। टीवी चर्चाओं में चीखते चिल्लाते एंकर , हृदयभेदी शब्दबाण छोड़ते नेता व प्रवक्ता , आंदोलन के नाम पर पथराव व आगजनी करती भीड़ , गाली गलौज से भरा सोशल मीडिया आदि सभी बातें इसका प्रमाण है कि आज हमारा लोकतंत्र पूर्णत: स्वस्थ हालत में नहीं है।

 

आज की ही बात नहीं , अपने जीवन काल से ही संघ वैचारिक असहिष्णुता का शिकार होता आया है। यह बात अलग है कि संघ की बढ़ रही लोकप्रियता व सर्व वर्ग स्वीकार्यता ने विरोधियों को इसके प्रति और अधिक आक्रामक कर दिया। देश में होने वाली किसी भी दुर्घटना या अपराध पर बिना हिचक व लोकलाज की चिंता किए संघ का नाम घसीट लिया जाता है। संघ को अछूत बनाने की पूरी कोशिश की जाती रही है परंतु प्रणब मुखर्जी के साहसपूर्ण कदम से इस बात की संभावना बनी है कि देश में संवाद के लिए नया वातावरण तैयार होने वाला है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। प्रणब दा ने संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार को भारत माता का महान सपूत बताते हुए उनके खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया है। पूरी रामकथा से अब मंथराओं व सीता को उलाहना देने वाले धोबी वाली मानसिकता के लोगों को समझ जाना चाहिए कि अब उनका समय लदने वाला है।