टोपी मत पहनाओ मुल्ला जी !
   दिनांक 01-जुलाई-2018
देवांशु कुमार

                                                                                                                                                            
जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संत कबीर की मज़ार में पहुंचे तो गुफागेह में प्रवेश करने के साथ ही मज़ार के खादिम ने उनके सिर पर मुसलमानी टोपी टिकाने की कोशिश की जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। टोपी उनके सिर पर नहीं टिकी परंतु टोपी में खबर बनने की बड़ी ताकत थी। सो, वह तब से खबर में टिकी हुई है । एक टोपी से पांच हजार साल का हिन्दू धार्मिक सत्व सवालों के घेरे में है । क्या यह कोई मामूली बात है ?
क्या इससे पहले मीडिया जगत में मुसलमानी टोपियों पर इतनी गर्मागर्म बहस हुई है ?निश्चय ही हुई है लेकिन उस घटना को कुछ साल बीत चुके हैं । तब चर्चा के केन्द्र में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी थे । आज, बहस के बीच में उनके अनुवर्ती और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं । तब, नरेन्द्र मोदी ने मंच पर जबरन गोल टोपी पहनाए जाने से मना कर दिया था, तीन दिन पहले योगी आदित्यनाथ ने भी टोपीको सिर पर सजाने से इनकार कर दिया ।
योगी ने थोपी गई टोपी सिर पर सजाने से मना किया और न्यूज चैनल से लेकर वेब पोर्टल तक सभी एक साथ सब पिल पड़े । सबने उपदेश दिए । योगी के इनकार पर सियासत शुरू हो गई । टोपी पहनने से अस्वीकार करना सेक्युलरिज्म के लिए खतरा बन गया और विपक्ष के खेमे में यह सहमति बनती चली गई कि भाजपा देश के सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा है । गोया, टोपी पहनते ही यह खतरा टल जाता । विपक्ष ने उन्हें खूब उपदेश सुनाए । समाजवादी पार्टी ने कबीर की मज़ार में टोपी का महात्म्य समझाया । कांग्रेस ने टोपी को सम्मान का प्रतीक बताया । परंतु, कबीर की मजार में टोपी के औचित्य पर सभी चुप रहे, जो कि सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था ।
क्या मुसलमानों को जबरन तिलक लगाया जाता है ?
आखिर टोपी का सवाल आता ही क्यों हैं ? जरा सोचिए,योगी आदित्यनाथ कहां पहुंचे थे क्या वह कोई मस्जिद या दरगाह थी ? क्या वहां मुसलमानों की मजहबी संसद चल रही थी ? क्या वहां पहुंचने की अनिवार्य शर्त थी टोपी को सिर पर सजाना ? क्या टोपी को सिर पर लगाने मात्र से यह साबित हो जाता कि योगी कबीर को मुसलमान मानकर उनका सम्मान करते हैं ? क्या हिन्दू समारोहों या धार्मिक अनुष्ठानों तक में आने वाले मुसलमानों को जबरन जनेऊ पहनाया जाता है? क्या उन्हें तिलक या भभूत लगाया जाता है? तो फिर किसी हिन्दू नेता के सिर पर टोपी सजाने का दुराग्रह क्यों ?
और सबसे विस्मयकारी बात तो यह कि वह वैष्णव कवि और संत कबीर की मज़ार थी । तो क्या कबीर को भारत में मुसलमानों का प्रतिनिधि कवि मान लिया जाना चाहिए ? क्या यह स्वीकार कर लिया जाय कि कबीर की मज़ार पर जाने की जरूरी शर्त सिर पर मुसलमानी टोपी लगाना है ? आश्चर्य तो यह कि ये वही कबीर हैं , जिन्होंने जीवन भर टोपी और तिलक के विरुद्ध शब्दसंग्राम छेड़ा ।
कबीर हर तरह के कर्मकांड के कटु आलोचक थे । लेकिन, मौलवी साहब, मजार का खादिम कबीर के चिंतन के प्रतिकूल हैं । उन्होंने योगी आदित्यनाथ के मज़ार में घुसते ही उनके सिर पर टोपी बिठाने की कोशिश की । उन्होंने मना कर दिया तो हाथ में थाम लेने का आग्रह किया । यानी, टोपी के बिना कबीर पूर्ण नहीं होते । कितनी विचित्र और हास्यास्पद बात है कि जाति धर्म से मुक्त कवि और संत को एक टोपी में कैद कर दिया गया, बल्कि मुसलमान बना कर रख दिया गया ।
अब मैं यह जानना चाहता हूं कि किसी भी हिन्दू को अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझाने के लिए कहां जाने की जरूरत है..क्या उसके लिए राम, कृष्ण, शिव, गणेश, दुर्गा, काली लक्ष्मी और अनेकानेक देवी देवता पर्याप्त नहीं हैं ? तो, जब वह किसी संत या औलिया की दरगाह पर जाता भी है, तो क्या किसी पराशक्ति की खोज में जाता है ? या, वह अपने धर्म के प्रति दृढ़ रहते हुए अन्य धर्मावलंबियों का सम्मान करता है ? क्या स्वामी विवेकानंद,महर्षि अरविंद, तिलक, गांधी और चंद्रशेखऱ आजाद ने कभी अपने सिर पर मुसलमानी टोपी धारण की थी ? क्या उनके हिन्दू होने या उनकी धार्मिक सहिष्णुता पर कोई संशय है?
ताज्जुब की बात तो यह है कि भारत विभाजन से पहले किसी बड़े हिन्दू नेता के सिर पर मुसलमानी टोपी नहीं देखी गई । परंतु,  देश बांट लिये जाने के बाद और इतना भुक्तभोगी होने के बाद भी हिन्दुओं के सिर पर मुसलमानी टोपी सजाने की परंपरा लाद दी गई । चाहे वह ईद मिलन का मौका हो या इफ्तार की शाम हों । अपने सिर पर गोल टोपी लगाने की उत्कंठा हमारे भीतर है । क्या टोपी पहनने मात्र से ही कोई सेक्युलर हो जाता है ? या मुसलमानों द्वारा ऐसे मंचों, मौकों पर टोपी पहनाए जाने का दुराग्रह भारतीय सेक्युलरवाद के विपरीत है ?
आज से पांच साल पहले नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानी टोपी पहनने से इनकार कर दिया था । तब मीडिया में जबरदस्त बवाल हुआ । मोदी तो वैसे भी निरंतर सेक्युलर ब्रिगेड के निशाने पर रहे हैं इसलिए उन्हें बड़ी नसीहत दी गई । लेकिन तब मोदी ने निर्भीक और नि:शंक होकर एक मिसाल कायम की । उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि समावेशी, बहुधर्मा या विपुलतावादी संस्कृति के लिए सिर पर मुसलमानी टोपी लगाना जरूरी नहीं है । बल्कि यह एक छद्म है । मुसलमानों के प्रति प्रेम या उनकी मजहबी स्वतंत्रता से इसका कोई सरोकार नहीं है । योगी आदित्यनाथ ने वही किया जो उनके अग्रज कर गए थे । महाजनो येन गत: स पन्था: । महान लोग जिस रास्ते से गए वही पथ है !
इस देश के सिर पर यह थोपी गई टोपी 70 साल से रखी हुई है । हमने जैसे इसे आवश्यक मान लिया है । हद तो यह कि भोगा भी हमने ही और प्रमाण भी हमें ही देना है । सेक्युलर ब्रिगेड यह मानता है कि अगर कोई हिन्दू टोपी नहीं लगाता या मजार पर चादर नहीं चढ़ाता तो वह धर्मनिरपेक्ष नहीं है । अब, इस छद्म को मिटाने का समय है । भारत में मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता निर्बाध है । वे इस देश में सदैव पल्लवित होते रहे हैं। उनमें और किसी हिन्दू की स्वतंत्रता में कोई भेद नहीं है परंतु टोपी पहनाए जाने का चलन बंद होना चाहिए । टोपी रखने से कोई मुसलमानों का सगा नहीं हो जाता । बल्कि इन्ही टोपीधारियों ने उनका घोर अहित किया है ।