जीएसटी से राजस्व में हुई बढ़ोतरी, हुए ढेरों फायदे जीएसटी से राजस्व में हुई बढ़ोतरी, हुए ढेरों फायदे
जीएसटी से राजस्व में हुई बढ़ोतरी, हुए ढेरों फायदे
   दिनांक 01-जुलाई-2018
पिछले साल 1 जुलाई को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पूरे देश में लागू हुआ था। शुरुआती दिक्कतों को छोड़ दिया जाए तो यह बात साफ नजर आती है कि जीएसटी अपने उद्देश्यों को हासिल करने लगा है। देश में करदाताओं की संख्या बढ़ रही है

भारत जैसे संघीय ढांचे वाले देश में जीएसटी का लागू होना अपने आपमें बहुत बड़ी उपलब्धि है। राज्य सरकारों ने कर संग्रह के अपने अधिकार एक हद तक केंद्र को समर्पित किए जीएसटी में। यह आसान नहीं था। जीएसटी पर राजनीतिक स्तर पर चाहे जितनी बहसें होती दिखती हों, सचाई यह है कि इसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं यानी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की सहमति कर संबंधी फैसलों में दिखाई पड़ती है। यह भी आसान नहीं है। केंद्र सरकार का कड़ा विरोध करने वाली राज्य सरकारें इस देश में मौजूद हैं। पर इन सरकारों के वित्त मंत्रियों ने जीएसटी काउंसिल के फैसलों से सहमति दर्शाई है। इससे साफ होता है कि जीएसटी का ट्रक ठीक दिशा में चल निकला है और कुछ रोड़ों-अड़चनों के बाद यह पूरी रफ्तार पकड़ लेगा।
मुश्किल हुई कर चोरी
जीएसटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘ईमानदारी का उत्सव’ कहा है। इसके व्यापक संदर्भ हैं। जीएसटी के चलते ऐसी व्यवस्थाएं निर्मित हुई हैं, जिनमें लगभग हर कारोबारी सौदे को जानकारी पर लाना अनिवार्य बना दिया गया है। इस कारण अब सौदे अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई दे रहे हैं, तो मुनाफे-बिक्री के आंकड़े भी वास्तविक रूप में सामने आ रहे हैं। इससे कर चोरी मुश्किल हो गई है। हालांकि भारतीय किसी भी व्यवस्था में सेंध लगाने का जुगाड़ ढूंढने में सक्षम हैं। पर कम से कम इतना तो साफ हुआ है कि कर चोरी की संभावनाओं को न्यूनतम कर कर दिया गया गया हैं।
जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक 19 जुलाई, 2018 को है, जिसमें कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए जाने की उम्मीद है। कुल मिलाकर यह तो माना जा सकता है कि अब जीएसटी व्यवस्था सुधार की ओर ही जाएगी। इसके चालू रहने या ना रहने पर कोई शक नहीं है। यानी जीएसटी व्यवस्था लगातार चलेगी। अब इसे वापस लेने की बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता। गौरतलब है कि हालिया राज्य विधानसभाओं के चुनावों में जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहकर संबोधित किया गया था। पर इस सबके बावजूद जीएसटी काउंसिल में इस कर को लेकर कोई शक-शुबहा नहीं है। अब इसमें सुधार और बेहतरी के मसले जरूर हैं। पर यह कर वापस होगा, या जीएसटी कर व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जाएगा, ऐसी बात कोई विपक्षी नेता भी नहीं कहता पाया जाता। देश के संघीय ढांचे में यह भी कोई कम बड़ी बात नहीं है।
दरअसल तकनीक के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि कारोबारी आंकड़ों में हेरफेर न कर सकें। जब तमाम आंकड़े व्यवस्था में समाहित हैं, तब कारोबारी आंकड़ों में हेर-फेर नहीं कर सकते। जैसे अगर जीएसटी व्यवस्था में किसी कारोबारी ने 1,00,000 रु. की खरीदारी दिखाई है, और फिर वह अगर 50,000 रु. की बिक्री दिखा रहा है, तो यह साफ दर्शाता है कि वह कुछ छिपा रहा है। कम बिक्री दिखाकर कम मुनाफा दर्शाना नई व्यवस्था में संभव नहीं है, पर इस व्यवस्था को अभी पूरे तौर पर दुरुस्त करना होगा। अभी जीएसटी का तकनीकी पक्ष विकास की प्रक्रिया में है।
जीएसटी की चुनौतियां
आज जरूरी है कि जीएसटी की चुनौतियों को रेखांकित किया जाए और उनसे निबटने के लिए एक ठोस कार्ययोजना का निर्माण किया जाए। जीएसटी या किसी भी कर व्यवस्था में करदाता-कारोबारी दोनों को न्यूनतम ज्ञान की जरूरत होती है। जिसके पास ज्ञान नहीं है, वह किसी ज्ञानी की सेवाएं ले सकता है। जैसे और बड़ी कंपनियां, बड़े कारोबारी किसी सनदी लेखाकार की सेवाएं लेकर जीएसटी से जुड़ी तमाम चुनौतियों से निबट सकते हैं। इसलिए देखने में आया है कि जीएसटी लागू होने के एकाध तिमाही के बाद अधिकांश कंपनियां अपने स्वाभाविक कारोबार की ओर लौट आर्इं। बड़ी कंपनियों के पास कंप्यूटरीकृत व्यवस्थाएं हैं, उनमें थोड़े-बहुत बदलाव के बाद उनके लिए जीएसटी की तरफ आना बहुत आसान हो गया। पर छोटे कारोबारी यह सब इतनी आसानी से नहीं कर सके। वे तकनीकी चुनौतियों और ज्ञान की चुनौतियों का सामना बहुत मजबूती से नहीं कर सकते। उनके पास संसाधनों का अभाव है। इसलिए देखने में यह आ रहा है कि बड़ी कंपनियों के बिक्री और मुनाफे के आंकड़े तो कमोबेश स्थिरता की ओर जा रहे हैं, पर छोटे कारोबारियों के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इनकी चुनौतियों को समझना और उनका निपटारा जीएसटी व्यवस्था के लिए बड़ी समस्या है। इस संबंध में व्यापक जीएसटी चेतना अभियान चलाए जाने की जरूरत होगी।
83,000 करोड़ से 1 लाख करोड़ तक
जीएसटी व्यवस्था अभी शुरुआती दौर में है। कारोबारियों को भी अभी इसे पूरी तरह समझना है। दरअसल इस व्यवस्था को लागू करने वाले भी इसे लगातार समझने की कोशिश कर रहे हैं। किसी नई कर व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं होता। किसी भी बदलाव के प्रति नकार एक सहज मानवीय मनोभाव है। किसी स्कूल में एक सीट पर दो बच्चे एक साथ बैठे हों, उनकी सीट बदल दी जाए, तो वे भी आपत्ति जताते हैं। पुराने तौर-तरीकों से काम करने की आदत हो जाती है। आदत के साथ तादात्म्य हो जाता है। इसलिए कोई नई आदत, कोई नया बदलाव, चाहे वह सबके हित में ही क्यों ना हो, लागू करवा पाना आसान नहीं होता। हर नए बदलाव का स्वाभाविक तौर पर विरोध होता है। पर धीरे-धीरे वह स्वीकार्य हो जाता है।
जीएसटी कर संग्रह के आंकड़े बताते हैं कि पहले महीने यानी जुलाई, 2017 में इससे 93,590 करोड़ रुपए जुटाए गए थे। आगामी दो माह यानी अगस्त और सितंबर, 2017 में क्रमश: 93,029 और 95,132 करोड़ रु. जीएसटी से उगाहे गए। यानी मामला 93,000 करोड़ से 95,000 करोड़ रु. के बीच घूम रहा था। अक्तूबर, 2017 में यह आंकड़ा 85,931 करोड़ रह गया। नवंबर 2017 के आंकड़े ने चिंता में डाल दिया था जब यह 83,716 करोड़ रु. रह गया था। यह अब तक का सबसे कम आंकड़ा है। अप्रैल, 2018 में जीएसटी संग्रह का आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपए से ऊपर हो गया।
वित्त मंत्रालय को उम्मीद है कि 2018-19 के दौरान यानी अप्रैल, 2018 से मार्च, 2019 के बीच यह आंकड़ा हर महीने एक लाख करोड़ रु. रहने वाला है। यह औसत अगर हासिल कर लिया गया, तो जीएसटी की शुरुआती यात्रा को एकदम कामयाब माना जा सकता है।