कैसा होगा पाकिस्तान के नए नेतृत्व का भारत के लिए रुख?
   दिनांक 10-जुलाई-2018

चुनाव में उतरने को तैयार तीन बड़ी पार्टियों-पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और तहरीके इंसाफ - के नेताओं के भारत से विभाजन पूर्व संबंध रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा किये जीते तो अपने पुरखों की धरती को लेकर इनका क्या रुख रहेगा


 

पाकिस्तान में आगामी 25 जुलाई को संसद के चुनाव होने हैं, जिसके बाद, उम्मीद है कोई ऐसा नेता ही प्रधानमंत्री बनेगा जिसका भारत से भावनात्मक संबंध हो। पाकिस्तान की तीन प्रमुख पार्टियों-पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी), पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और तहरीके इंसाफ-में से ही किसी की चुनावों के बाद सरकार बनेगी। बहुमत न मिला तो तीनों सरहदी गांधी की पार्टी नेशनल अवामी लीग या भारत से गए मुसलमानों के हित देखने वाली पार्टी मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) से सहयोग ले सकती हैं। इस बार एमक्यूएम के तीन धड़े चुनावी कुरुक्षेत्र में हैं, संयोग से तीनों के प्रमुख बिलाल भुट्टो, शाहबाज शरीफ और इमरान खान के भारत से गहरे संबंध रहे हैं।

शरीफ और अमृतसर

पहले बात सत्तारूढ़ मुस्लिम लीग की। इसके अध्यक्ष हैं शाहबाज शरीफ। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शाहबाज अमृतसर के जट्टी उमरा गांव का दौरा कर चुके हैं, जिधर उनके पुरखों ने वक्त गुजारा और वहीं दफन हैं। नवाज शरीफ के पिता मियां मोहम्मद शरीफ इसी जट्टी उमरा गांव से देश के विभाजन के वक्त लाहौर चले गए थे। शाहबाज तीन साल पहले पाकिस्तान के पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री के नाते जट्टी उमरा पहुंचे थे। वे अपने पुरखों के घर गए और वहां उनकी आंखें भर आई थीं। शरीफ परिवार का इस गांव से इतना भावनात्मक रिश्ता है कि उन्होंने अपने लाहौर वाले भव्य घर का नाम जट्टी उमरा ही रखा है। शरीफ का परिवार भारत की मशहूर पंजाबी लोक गायिकाओं को अपने यहां खुशी के अवसरों पर आमंत्रित करता रहा है।


 

                                 शाहबाज शरीफ 

बिलाल, बेनजीर और जूनागढ़

बिलाल भुट्टो के नाना और पीपीपी के संस्थापक जुल्फिकार अली भुट्टो की शिक्षा बम्बई (अब मुंबई) में कैथडरल कालेज में हुई। उनकी मां हिन्दू थीं। बम्बई के अलावा जूनागढ़ से उनके रिश्तों की जानकारी किसको नहीं है। भुट्टो के कभी अच्छे मित्र रहे पीलू मोदी राज्यसभा सदस्य रहे। पीलू मोदी ने अपनी किताब-जुल्फी, माई फ्रेंडमें लिखा है कि ‘‘हालांकि हम दोनों 1946 तक घनिष्ठ मित्र थे, पर बाद में संबंध पहले जैसे नहीं रहे।’’ भुट्टो के पिता सर शाहनवाज भुट्टो विभाजन से पहले गुजरात की जूनागढ़ रियासत के प्रधानमंत्री थे। भुट्टो की मां हिन्दू थीं। निकाह से पहले उनका नाम लक्खीबाई था। बाद में खुर्शीद बेगम हो गया। वे मूलत: राजपूत परिवार से थीं। बताते हैं, शाहनवाज और लक्खीबाई के बीच पहली मुलाकात जूनागढ़ के नवाब के किले में हुई। वहां पर लक्खीबाई भुज से आई थीं। शाहनवाज 30 मई,1947 से लेकर 8 नवंबर,1947 तक जूनागढ़ के प्रधानमंत्री के पद पर रहे। लक्खीबाई के पिता जयराजसिंह जडेजा का संबंध राजकोट के पेनेली गांव से था, जबकि भुट्टो की दादी का रिश्ता लोहाना बिरादरी से था। जब बेनजीर भुट्टो की 2010 में निर्मम हत्या हुई तब जूनागढ़ में भी शोक की लहर दौड़ गई थी। जूनागढ़ शहर की जामा मस्जिद में उनकी आत्मा की शांति के लिए नमाज अदा की गई थी। एक बड़ा सवाल है कि विभाजन के वक्त भुट्टो और उनका परिवार पाकिस्तान क्यों नहीं गया था? जब गांधी जी की 1948 में हत्या हुई तब भुट्टो बंबई में ही थे। वे जिन्ना की 11 सितंबर, 1948 को मृत्यु के वक्त भी बंबई में थे। 1949 में वे अमेरिका में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए गए थे। पाकिस्तान में भुट्टो परिवार के विरोधी चुनावों में इस मुद्दे को बार-बार उठाते हैं कि ये देश के बंटवारे के तुरंत बाद पाकिस्तान क्यों नहीं आए थे? भुट्टो परिवार 1950 के बाद पाकिस्तान जाकर बसा था।


 

                                                                   बिलाल भुट्टो

इमरान और जालंधर

क्रिकेट से सियासत में गए इमरान खान भी कम भारतीयनहीं हैं। उनकी अम्मी शौकत खानम पंजाब के जालंधर शहर से थीं। उनके नाना डॉ. इकरामुल्ला खान शहर के बड़े ही सम्मानित शिक्षाविद् थे। घर था बस्ती दानिशमंदा में। उन्होंने ही जालंधर में इस्लामिया कॉलेज की स्थापना की थी। इमरान खान ने 2007 में अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान बताया था, ‘‘मेरा ननिहाल 650 वर्षों से जालंधर में बसा हुआ था। मेरे माता-पिता का निकाह भी जालंधर में ही हुआ था। हालांकि 1947 के बाद सारा ननिहाल लाहौर जाकर बस गया।


 

                                                                                     इमरान खान

सरहदी गांधी की पार्टी

हैरानी की बात हैकि पाकिस्तान की अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) का गांधीजी से संबंध है। इस पार्टी की स्थापना सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के पुत्र खान अब्दुल वली खान ने की थी। वे भी भारत के स्वाधीनता आंदोलन के सिपाही रहे थे। अपने दादा खान अब्दुल गफ्फार खान और पिता की तरह इसके वर्तमान नेता अफसंदयार वली खान भारत के मित्र हैं। अफसंदयार के दादा और पिता ने मजहब के नाम पर देश के बंटवारे का कड़ा विरोध किया था। इस चुनाव में एएनपी खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत में बड़ी सफलता की उम्मीद कर रही है। माना जा सकता हैकि अगर सरहदी गांधी की पार्टी को चुनावों में सफलता मिली तो दोनों मुल्कों के संबंध बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। 

 

                                                                      अफसंदयार वली खान

आगरा वाले अल्ताफ हुसैन

मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) उन पाकिस्तानियों के हितों के लिए आवाज बुलंद करता रहा है, जो बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चले गए थे। वैसे इनकी इतनी बड़ी ताकत तो नहीं है कि अगली सरकार बनाएं पर सत्ता में भागेदारी हो सकती है। इसके एकछत्र नेता अल्ताफ हुसैन आगरा के हैं।

1947 तक उनके पिता राजा की मंडी रेलवे स्टेशन पर काम करते थे। अल्ताफ हुसैन ने 2004 में दिल्ली में एक सेमिनार में कहा था, ‘‘शायद ही कोई दिन जाता है जब मेरे घर में यूपी, आगरा, अलीगढ़ वगैरह की बातें न हों। बंटवारे के वक्त हम यूपी, दिल्ली, बिहार वगैरह से पाकिस्तान में जाकर बसे लोगों के साथ कभी इंसाफ नहीं हुआ। हमें अब अफसोस होता है कि हमने पाकिस्तान के लिए क्यों लड़ाई लड़ी थी।’’ बहरहाल, कुछ दिन बाद साफ हो जाएगा कि पाकिस्तान में राजनीतिक हवा किस तरफ बहेगी और भारत के प्रति वहां के नए नेतृत्व का कैसा भाव होगा?

 
                            अल्ताफ हुसैन