कौन कर रहा है भारत को बदनाम करने की साजिश?
   दिनांक 10-जुलाई-2018

हाल ही में थामसन रॉयटर फाउंडेशन ने एक सर्वेक्षण के जरिए कहा है कि भारत में महिलाओं की स्थिति अफगानिस्तान, सोमालिया जैसे देशों से भी बदतर है। यह रपट भ्रामक तथ्यों के आधार पर देश की छवि बिगाड़ने की कोशिश है


एक ऐसा सर्वेक्षण जिसमें भागीदारों का नाम, आयु, शैक्षिक योग्यता, व्यवसाय और अन्य जानकारियां गुप्त हों, जिसका आधार ठोस आंकड़े न होकर दुनिया के केवल 548 लोगों की धारणा हो, क्या ऐसे सर्वेक्षण की विश्वसनीयता और वैधता स्वीकार की जा सकती है? निश्चित रूप से नहीं। पर ऐसा ही हुआ है दुनिया की बड़ी न्यूज एजेंसी रायटर की स्वैच्छिक संस्था थामसन रॉयटर फाउंडेशन (टीआरएफ) की महिला विषयों की सर्वेक्षण रपट पर। पिछले सप्ताह जारी की गई इस रपट में भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया है। यहां तक कि भारत के हालात अफगानिस्तान, सोमालिया, यमन, नाईजीरिया और सीरिया जैसे देशों से भी बदतर दिखाए गए हैं।

 

सर्वेक्षण आॅनलाइन और फोन के माध्यम से 26 मार्च, 2018 से 4 मई, 2018 के बीच किया गया। यह यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका, दक्षिण-पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र वाले देशों में किया गया था। सर्वेक्षण आते ही भारत में सरकारी, गैर-सरकारी सामाजिक संगठनों और जाने-माने लेखकों, समाज-सेवियों शिक्षाविदों, महिला संगठनों से तीखी प्रतिक्रियाएं आर्इं। बहस छिड़ गई कि क्या केवल धारणा के आधार पर किसी भी देश को ऐसे कठघरे में खड़ा किया जा सकता है? जो लोग कभी भारत आए ही नहीं, उनकी धारणा को कैसे वैधता और मान्यता दी जा सकती है। सर्वेक्षण करने वाली संस्था की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक था।

जिस देश में आदिकाल से महिलाओं के प्रति विशेष सम्मान का भाव है, जहां महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, क्या उस देश की ऐसी ब्रांडिंग करके उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया जा सकता है? भारत सरकार के महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने सर्वेक्षण को निराधार और भारत को अंतरराष्ट्रीय पटल पर बदनाम करने की साजिश बताया।

थॉमसन रॉयटर के सर्वेक्षण के तरीके को गैर-वैज्ञानिक बताते हुए मंत्रालय ने उसे पत्र लिख कर पूछा है, ‘‘जो आपके विशेषज्ञ हैं उनकी वैधता कितनी है। मात्र छह सवालों के आधार पर दुनिया के 548 विशेषज्ञों की धारणा निहायत व्यक्तिगत हो सकती है। उनके उत्तरों का कोई ठोस आधार नहीं है। उन्होंने किन्हीं आंकड़ों या अध्ययनों का हवाला नहीं दिया।’’ मंत्रालय का कहना है कि नीति निर्धारकों को भी जवाब देने वालों की श्रेणी में शामिल बताया गया है, लेकिन टीआरएफ के किसी भी व्यक्ति ने भारत के महिला और कल्याण मंत्रालय से संपर्क नहीं किया। तो फिर इस सर्वेक्षण पर यकीन कैसे किया जाए? इस रपट के लिखे जाने तक टीआरएफ ने मंत्रालय के पत्र का उत्तर नहीं दिया था। लेकिन थॉमसन रॉयटर की लेखिका एनी बैनर्जी ने न्यूज चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘सर्वेक्षण दुनिया के विशेषज्ञों की धारणा पर आधारित है। आंकड़ों से कहीं ज्यादा राय का महत्व होता है। सर्वेक्षण में भाग लेने वालों का नाम सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके नाम गुप्त रखने की शर्त पर ही सर्वेक्षण कराया गया था।’’

राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस सर्वेक्षण को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि जिन लोगों की पहचान तक गुप्त रखी गई हो, ऐसे लोगों की धारणा के आधार पर बनी रपट को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। आयोग की पूर्व अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम कहती हैं, ‘‘यह रपट पूर्वाग्रहों पर आधारित है। इसका तथ्यों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। इसे कूड़े में डाल देना चाहिए।’’ प्रबुद्ध महिलाओं के संगठन ग्रुप आॅफ इंटलेक्चुअल्स ऐंड एकेडेमिक्सकी सह संयोजिका ललिता निझावन ने इस रपट को भारत के विरुद्ध एक साजिश बताया है। निझावन देश के सबसे बड़े उद्यमी संगठन फिक्की की सदस्य हैं। उन्होंने दुनिया के 80 से ज्यादा देशों का दौरा किया है। वे इन देशों की महिला उद्यमियों और अन्य प्रतिष्ठित महिलाओं से मिलती-जुलती रहती हैं। उनका कहना है, ‘‘विकासशील देशों को तो छोड़िए, विकसित देशों में भी महिलाओं के लिए भारत से अच्छे हालात नहीं हैं। महिलाओं के लिए भारत बहुत सुरक्षित है। उनका पारिवारिक, सामाजिक दर्जा बहुत सम्मानीय है। यहां तक कि अमेरिकी महिलाओं से भी बेहतर। हां, सब कुछ बहुत अच्छा है, ऐसा भी नहीं है। कुछ मामलों में हालात चिंताजनक जरूर हैं, लेकिन अफगानिस्तान, सोमालिया, सीरिया और नाईजीरिया से भी बदतर हालात हैं, यह कहना ठीक नहीं है। यहां मुझे उनकी मंशा पर शक होता है।’’


 
डर के साए में एक अफगानिस्तानी महिला, अफगानिस्तान महिलाओं के लिए नरक के सामान है बावजूद इसके कुछ संगठन भारत को बदनाम कर अफगानिस्तान को महिलाओं के लिए भारत से अच्छा बता रहे हैं 

दरअसल, यह सर्वेक्षण टीआरएफ के 2011 के सर्वे का दोहराव है। उस समय अफगानिस्तान, कांगो, पाकिस्तान, सोमालिया और भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया था। भारत उस समय चौथे क्रमांक पर था। 2018 के सर्वेक्षण में संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों के 759 विशेषज्ञों को शामिल करके उनकी राय ली गई, जिसमें से 548 ने सभी सवालों के पूरे-पूरे उत्तर दिए। भारत पर अपने को विशेषज्ञ कहने वालों में 101 लोग थे, जिनमें से 53 भारत में रहते हैं। थॉमसन रॉयटर रिसर्च फाउंडेशन ने महिला अधिकारों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का एक बड़ा डॉटा बैंक तैयार कर रखा है, उसी से प्रतिभागियों की सूची तैयार की गई। पूछा गया कि स्वास्थ्य सेवाओं, प्राकृतिक संसाधनों, संस्कृति और परंपरागत रिवाजों, यौन हिंसा, प्रताड़ना, गैर यौन हिंसा और मानव तस्करी मामलों में महिलाओं के लिए कौन से पांच देश सबसे ज्यादा खतरनाक हैं। सवालों का जवाब देने वालों ने भारत को मानव तस्करी के मामले में सबसे ज्यादा खतरनाक बताया, साथ ही उन्होंने यौन दासता, घरेलू हिंसा, जबरन विवाह को भारतीय महिलाओं पर थोपी गई पुरानी प्रथा बताया, महिलाओं पर पत्थर बाजी और कन्या भ्रूणहत्या में भी अव्वल बताया गया।

सर्वेक्षण में छह सवाल पूछे गए। कुछ सवाल सब देशों पर लागू नहीं होते। उदाहरण के तौर पर बाल विवाह की उम्र हर देश में भिन्न है। महिलाओं को पत्थरबाजी की सजा और खतना जैसी चीजें भारत में प्रचलित नहीं हैं।

इस सर्वेक्षण की हर स्तर पर आलोचना की जा रही है। सवाल यह भी उठता है कि क्या चुनावी वर्ष में इस तरह की रपट जारी करना भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में बदनाम करने की साजिश तो नहीं है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धुर विरोधी और वामपंथी विचारधारा वाली जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्कॉलर निवेदिता मेनन भी इस सर्वेक्षण को खारिज करती हैं। उनका कहना है, ‘‘मीडिया रपट के आधार पर धारणाएं बनाने वालों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। भारत का मीडिया बहुत ज्यादा सक्रिय है। बहुत से ऐसे देश भी हैं, जिनका मीडिया ऐसे मामलों में इतनी तत्परता से कुछ नहीं बताता है, फिर उन देशों के बारे में ये लोग क्या धारणा बनाएंगे, इनमें से बहुत से ऐसे भी होंगे, जो कभी भारत आए ही नहीं।’’


 
सोमालिया में एक महिला से शादी करके सात—आठ बच्चे पैदा करने के बाद उसे तलाक दे दिया जाता है। वहां महिलाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय है 

लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सर्वेक्षण आते ही उसे लपका और प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करने का एक मौका भी नहीं गंवाया। राहुल ने प्रधानमंत्री के फिटनेस वीडियोका मजाक उड़ाते हुए महिलाओं के मामलों पर ध्यान देने की सलाह को ट्वीट किया। नेहरू मेमोरियल में सीनियर रिसर्च फेलो और वरिष्ठ पत्रकार संध्या जैन ने राहुल गांधी के ट्वीट को भारत विरोधी बताया। उन्होंने कहा,‘‘जिस सर्वेक्षण का भारत को मिलकर विरोध करना चाहिए था उस पर राजनीति दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के हर सियासी दल को टीआरएफ से सबूत मांगने चाहिए। यह केवल नरेंद्र मोदी का देश नहीं है, सबका देश है। अपने देश के अपमान को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।’’

महिलाओं की पत्रिका सेवीकी दिल्ली स्थित स्थानीय संपादक मीता मिश्र कहती हैं, ‘‘इस सर्वेक्षण को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि टीआरएफ ने भी गंभीरता से सर्वे नहीं किया है। 193 देशों से केवल 548 विचार हालात के साथ न्याय नहीं कर सकते।’’ वे कहती हैं, ‘‘भारत में महिलाओं की स्थिति दुनिया के बहुत सारे देशों से बेहतर हैं। उनकी स्थिति में तेजी से सुधार हुआ है। उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है। वे अपने अधिकारों के प्रति सजग हुई हैं। सरकार, प्रशासन और पुलिस महिलाओं के लिए पहले से ज्यादा संवेदनशील हुई है। महिलाओं के प्रति अपराधों से निपटने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं। थानों में मुकदमे दर्ज होना ऐसा बताता है कि सरकार और कानून महिलाओं को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।’’

टीआरएफ के सर्वेक्षण को डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे (डीएचएस) के आंकड़े झूठा साबित करते हैं। डीएचएस दुनिया के विकासशील देशों में समय-समय पर किए जाते हैं। इसके लिए पैसे की व्यवस्था यूनाईटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट और संयुक्त राष्ट्र एजेंसी करती हैं। आंकडेÞ राष्ट्रव्यापी सर्वे पर आधारित होते हैं। भारत में इसे नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वेके नाम से जाना जाता है। 2015-16 में 7,00,000 से ज्यादा महिलाओं का साक्षात्कार किया गया था।

सर्वेक्षण में भारत को दुनिया के अन्य विकासशील देशों की तुलना में यौन हिंसा में काफी निचले यानी 32वें पायदान पर दिखाया गया। सर्वेक्षण 43 देशों में किया गया था और साथ ही बताया गया कि भारत में यौन हिंसा और अपराध पहले से कम हुए हैं। वैझानिक तरीके से किए गए व्यापक सर्वेक्षण के दो वर्ष के भीतर ही भारत के हालात इतने खराब कैसे हो सकते हैं?

दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिवक्ताऔर महिला अधिकारों के लिए काम कर रहीं मनीषा अग्रवाल नारायण इस टीआरएफ सर्वे को विश्वास करने लायक नहीं समझतीं। उनके अनुसार, ‘‘भारत में महिलाएं नित नए आयाम स्थापित कर रही हैं। कुछ मामलों ने भारत को बहुत बदनाम किया गया। 2012 के निर्भया कांड के बाद बलात्कार के मामलों पर मीडिया का ध्यान ज्यादा गया। सभी पुलिस थानों को महिलाओं के प्रति अपराधों के केस तुरंत दर्ज करने के आदेश दिए गए, कानून कड़े बनाए गए। हो सकता है कि अंतरराष्टÑीय स्तर पर इस कारण भी भारत के प्रति ऐसी अवधारणा बनी हो।’’

निश्चित रूप से भारत को महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए अभी बहुत लंबा और कठिन सफर तय करना है, लेकिन यह भी सत्य है कि भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश नहीं कहा जा सकता। बच्चों और महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वैच्छिक संगठनों से जुड़ी लेखिका मधु बाला जोशी इस सर्वेक्षण को संदिग्ध करार देती हैं। उनके अनुसार, ‘‘कोई भी ऐसा सर्वे, जिसमें विशेषज्ञों की पहचान गुप्त रखी जाए उसको मान्यता नहीं दी जा सकती। इसमें अंगुली पर गिनने लायक लोग शामिल हैं। इससे पूरे समाज का प्रतिनिधित्व कैसे हो सकता है।’’

मीडिया ने भी टीआरएफ के सर्वे को कठघरे में खड़ा किया तो उन्होने सफाई में कहा, ‘‘यह धारणाओं पर आधारित है, क्योंकि सभी देशों से आधिकारिक आंकड़े मिलना संभव नहीं हो पाता है।’’

अभी कुछ दिन पहले संयुक्त राष्ट्र ने कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर भारत विरोधी रपट जारी की थी, जबकि कश्मीर घाटी में हालात बिल्कुल उलट हैं। सरकार ने रमजान के महीने में एकतरफा संघर्षविराम लागू कर उन आम लोगों को राहत दी जिनका पत्थरबाजी और आतंकवाद से कोई मतलब नहीं है। सेना और सुरक्षा बल घाटी में संयम बरतते हुए काम कर रहे हैं। उसके कुछ ही दिन बाद टीआरएफ की निराधार रपट उन खबरों को बल देती है जिनमें नरेंद्र मोदी और भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाने की बात कही जा रही है। निश्चित रूप से इस सर्वे का उद्देश्य महिलाओं के प्रति चिंता कम और भारत सरकार विरोधी एजेंडा ज्यादा लगता है।