हिंदी सिनेमा में दागदार किरदार पर फिल्म बनाने का मोह क्यों?

‘संजू’ फिल्म बनाने के पीछे निर्देशक राजकुमार हीरानी का मकसद क्या संजय दत्त की छवि को चार-चांद लगाना है? या बॉक्स आफिस पर पैसा बटोरना? या फिर उन्हें संजय की जिंदगी ऐसी लगती है जिसमें युवाओं के लिए सीखने को बहुत कुछ है? क्यों मुम्बई का फिल्म उद्योग माफियाओं और अंडरवर्ल्ड को महिमामंडित करने वाली फिल्में बना रहा है? यह संजय दत्त ही हैं जिनकी 1993 में बम्बई बम धमाकों के अपराधियों से सांठगांठ थी, जिसके लिए उन्हें जेल की सजा भी हुई।

आलोक गोस्वामी

1913 में पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से जन्म लेने वाले हिन्दी फिल्मोद्योग ने आज दुनियाभर में सालाना सबसे ज्यादा फिल्में बनाने का रिकॉर्ड भले तोड़ दिया हो, लेकिन आदर्श के रूप में विषयों या किरदारों का चयन आज इस रुपहले संसार को किस स्तर तक ले आया है, इसे ‘संजू’ फिल्म बखूबी साबित करती है। हिंदी फिल्मों के मुख्य किरदार अब गिरोहबाज या जेबतराश नहीं होते, आजकल फिल्मकारों की खास पसंद हैं माफिया और अंडरवर्ल्ड सरगना, या ‘संजू’ के संदर्भ में, अंडरवर्ल्ड से नाता रखने वाले नेता/अभिनेता।

‘संजू’ यानी मशहूर अभिनेता संजय दत्त की जिंदगी के चुनिंदा पहलुओं को बड़े परदे पर दिखाने वाली फिल्म। संजय दत्त यानी बीते दिनों के मशहूर अभिनेता, सांसद, समाजसेवी दिवंगत सुनील दत्त के पुत्र। मुम्बइया फिल्मी जगत में बिगड़ैल बच्चे के नाम से पहचाने जाने वाले संजय दत्त—जो लड़कपन में नशे के शिकार होकर जिंदगी को गलत रास्ते की तरफ मोड़ चुके थे, और अगर पिता ने उनके ऐब को पहचानकर इलाज के लिए विदेश न भेजा होता तो फिल्म जगत की मशहूर जोड़ी सुनील दत्त-नरगिस का यह पुत्र आज जाने किस हाल में होता। कई तरह के ऐबों के शिकार रहे, 1993 के बम्बई बम धमाकों में मजहबी उन्मादियों से सांठगांठ/याराना रखने वाले, अपने घर में घातक हथियार छुपाकर रखने वाले, बम धमाके की साजिश का पता होने के बावजूद उसे पुलिस से छुपाए रखने वाले, माफिया सरगनाओं से गलबहियां डाले रखने वाले, अपने किए अपराधों के लिए कई मर्तबा जेल की हवा खा आने वाले, रंगीनमिजाज होने की वजह से तीन शादियां रचाने वाले (फिल्म के अनुसार, ‘308 युवतियों से संबंध रखने के अलावा, जिनमें रेडलाइट इलाके वाली यौनकर्मियों की संख्या शामिल नहीं है’), अपनी पहली पत्नी को कैंसर की हालत में बेसहारा छोड़ देने वाले, अपनी पहली संतान से सालों तक कोई नाता न रखने वाले, लफ्फाजी के लहजे में दबंगई दिखाने वाले, एक नौजवान अभिनेता के तौर पर अपने माता-पिता की साख को दाग लगाने वाले संजय दत्त की इन्हीं ‘खूबियों’ से अभिभूत होकर फिल्म पटकथाकार और निर्देशक राजकुमार हीरानी ने 58 साल के संजय के पुकारे जाने वाले ‘संजू’ नाम से पिछले दिनों जो फिल्म परदे पर उतारी है, उसे इस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली, पहले हफ्ते में ‘बाहुबली’ को पीछे छोड़ करीब 200 करोड़ कमाने वाली बायोपिक के नाते प्रचारित करने में अंगे्रजी फिल्म पत्र-पत्रिकाएं एक-दूसरे को पानी पिला रही हैं।

लेकिन यहां तीन सवाल खड़े होते हैं-एक, क्या संजय दत्त या संजू या ‘बाबा’ की ये ऐसी खूबियां हैं कि जिन्हें बड़े परदे पर ग्लैमराइज या महिमामंडित करके जनता के सामने ‘आदर्श’ रूप में परोसा जाए और उससे अरबों-खरबों के वारे-न्यारे किए जाएं? अगर ऐसा है तो फिर सिनेमा का वह ‘हाई मोरल ग्राउंड’ धूल चाटता दिखता है जो कहता है कि फिल्में समाज को राह दिखाती हैं, जो यह तर्क भी देता है कि फिल्में वही दिखाती हैं जो ‘जनता देखना चाहती है’! दो, क्या यह किसी के दागदार दामन को उजला दिखाने की करोड़ों रुपए बहाकर की गई ‘पी.आर.’ कसरत है? क्योंकि तीन-चार बार जेल की हवा खा आने वाले और असल जिंदगी में अब भी अधिकांशत: नशे में धुत रहने वाले ‘बाबा’ के कई ऐबों को या तो फिल्म में छुपा लिया गया है या सरसरी तौर पर जिक्र करने के बाद गुम कर दिया गया है, जैसा कि बायोपिक का दावा करने वाली किसी फिल्म से अपेक्षित नहीं होता! इस पूरी कसरत को अंजाम दिया है, संजय के साथ बनाईं अपनी फिल्मों, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के जरिए व्यावसायिक फिल्में बनाने में माहिर हुए निर्देशक राजकुमार हीरानी ने। 55 साल के वही राजकुमार हीरानी जिन्होंने 2014 में अपनी फिल्म ‘पीके’ में एक छुपे अंदाज में हिन्दू धर्म, उसके प्रतीकों और मान-बिन्दुओं को उपहास का विषय बनाया था। अब ‘संजू’ के बहाने हीरानी भारत के युवाओं के सामने क्या आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं? संजय ने क्या अपने जीवन में ऐसा कोई असाधारण काम करके दिखाया है जो काबिलेतारीफ हो, या नशे से पूरी तरह तौबा करके वे आदर्श पति और अभिनेता बन गए हैं? नहीं, ऐसा रत्तीभर नहीं दिखता। (साक्ष्य के लिए सोशल मीडिया पर उनके हाल के कुछ वीडियो देख लेना काफी होगा) तो हीरानी ने संजय दत्त के जीवन में, ऐसा क्या पाया जिसने ‘उन्हें उन पर बायोपिक बनाने को मजबूर’ किया?

और तीसरा सवाल यह कि पिछले कुछ समय से मुम्बई फिल्म उद्योग माफिया या अंडरवर्ल्ड को इतना तूल क्यों देता आ रहा है, क्यों एकाध साल में एकाध फिल्म भारत के ‘मोस्ट वांटेड’ अपराधी, जिसके तार 1993 के बम्बई बम धमाकों से जुड़े हैं, उस दाउद इब्राहिम पर, नहीं तो उसकी बहन हसीना पारकर पर, या छोटा राजन पर, या अरुण गवली पर, या गुजरात के नामी अपराधी अब्दुल पर, या हाजी मस्तान पर बड़े बजट की फिल्में बनाई जाती हैं? सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं-क्या यह सब किसी के इशारे पर हो रहा है? क्या इसके पीछे खाड़ी से आया पैसा लगा है? क्या मुस्लिम फिल्म निर्माताओं की बाढ़ सी आने और फिल्मों में खान तिकड़ी पर पानी की तरह पैसा बहाने के पीछे कोई छुपी ताकत है? वह ताकत, जो यह चाहती है कि भारत के लोगों के मन में ऐसे किरदारों की कहानियों को परीकथा की तरह बसा दिया जाए जो कानून को ठेंगे पर रखते हैं, जो देश की संप्रभुता को चुनौती देते हैं, जो भारत की वास्तविक संस्कृति और सरोकारों का मजाक उड़ाते हैं, जो गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर ‘बड़े दिल वाले’ इस्लामी किरदारों की भरमार की पैरवी करते हैं? बात शुरू से शुरू करें। सबसे पहले संजू का वह ‘असाधारण जीवन’ जिसने हीरानी को फिल्म बनाने के लिए भीतर तक ‘झकझोर’ दिया था।

शुरुआती झटके

याद कीजिए, 1982 में आई फिल्म विधाता की। दिलीप कुमार, संजीव कुमार के साथ इस फिल्म में संजय दत्त निहायत ही दुबले-पतले कॉलेज के छात्र सरीखे लगे थे, जो किरदार के हिसाब से ठीक ही था। लेकिन ध्यान दीजिए इस फिल्म में उनकी संवाद अदायगी पर, जब वे संजीव कुमार को ‘अबु बाबा’ कहकर पुकारते हैं। या उससे पहले 1981 में संजय दत्त की बतौर हीरो उनके पिता सुनील दत्त की बनाई फिल्म रॉकी पर नजर डालिए। दोनों ही फिल्मों में संजय के चलने, बोलने, खड़े होने या बैठने के अंदाज से यह आभास होते देर नहीं लगी थी कि संजय की नशे की लत का इलाज भले हो गया हो, पर उसका असर बहुत मात्रा में उस वक्त तक कायम था। विधाता ने बॉक्स आफिस पर भले ही अच्छी कमाई की, पर अभिनेता के तौर पर संजय नाकाम ही माने गए। चेहरे पर ना कोई भाव, ना आवाज में दमदारी। ना चलने में कोई अदा, ना उठने-बैठने का सलीका। सुनील दत्त को अपने होनहार में कोई ‘होनहारी’ न दिखी थी। वह आगे क्या करेगा, कैसे बढ़ेगा, इसे लेकर वे अक्सर चिंतित भी रहते थे। बाद के दौर में कुछ फिल्में आर्इं, पर परदे पर संजय का कोई कमाल नहीं दिखा। 1993 में सुभाष घई की फिल्म ‘खलनायक’ में खलनायक को ‘लार्जर देन लाइफ’दिखाकर संजय को उस किरदार में उतारा गया और वे उस किरदार की चाल-ढाल में चल निकले। फिर मुम्बइया अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्म ‘वास्तव’ में संजय ने बात-बात पर पिस्तौल तानी और मुम्बइया बोली के साथ माफिया के लटके-झटके दिखाए। लेकिन संजय का डगमगाता फिल्मी करियर एक तरह से पटरी पर लौटा हीरानी की ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ से, जिसमें एक बार फिर संजय ने मुम्बई के टपोरी किस्म के एक गिरोहबाज का किरदार निभाया और फिल्म ने बॉक्स आॅफिस पर इतनी कमाई की कि हीरानी को उसकी अगली कड़ी ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ बनाने का हौसला मिला और यह कड़ी भी व्यावसायिक तौर पर कामयाब ही रही। संजय तमाम कमियों के बावजूद फिल्म उद्योग में अपनी जगह कायम रखने में कामयाब रहे। निस्संदेह संजय दत्त या संजू या बाबा एक अति सम्मानित माता-पिता की बिगड़ी संतान के नाते ही पहचाने जाते रहे हैं। लेकिन उन्हें ‘घरेलू किस्म का’ और ‘रिश्ते निभाने वाला इनसान’ बताने वाले लोग तब चुप हो जाते हैं जब उनसे संजय के अपनी पहली पत्नी ऋचा शर्मा के साथ ऐसे मौके पर किए गए व्यवहार की याद दिलाई जाती है जब ऋचा को कैंसर था। संजय ने न सिर्फ ऋचा को तब अकेला छोड़ दिया था बल्कि बाद में उनसे हुई अपनी बेटी से सालों तक कोई रिश्ता तक नहीं रखा था।

क्या सुधर गए हालात?

हाल ही में सोशल मीडिया पर संजय का ऋषि कपूर से मिलने उनके घर जाने का वीडियो खूब दिखा। उसमें कार चला रहे रणबीर की बगल में बैठे संजय साफतौर पर नशे की हालत में दिख रहे थे। इतना ही नहीं, संजय के अक्खड़ मिजाज को दिखाता एक और वीडियो है जिसमें वे अपने घर के बाहर जमा फोटोग्राफरों के साथ नशे की हालत में बात करते हुए मुंह से अपशब्द बोलते नजर आए थे, उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि साथ में एक महिला खड़ी थीं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हर आदमी की एक निजी जिंदगी होती है जिसे वह अपने हिसाब से जीता है, और उसे इसका पूरा हक है। संजय दत्त ने एक साक्षात्कार में कहा भी है कि ‘मैं एक आम इनसान हूं और आम इनसान की तरह जीता हूं। मुझसे जिंदगी में गलतियां हुर्इं, जिसके लिए मैंने सजा काटी है।’ लेकिन हीरानी ने ऐसी जिंदगी को भी ‘मिसाल’ बनाकर सिर्फ सहूलियत देने वाली चीजें परोसकर जनता के सामने पेश तो किया, पर यह नहीं सोचा कि उनका यह पात्र युवाओं को कैसी जिंदगी जीने की प्रेरणा देगा?

एक दौर वह भी था

एक दौर था जब साफ-सुथरी, सकारात्मक संदेश देतीं या सिर्फ स्वस्थ मनोरंजन करने वाली फिल्में बनाने का आग्रह हुआ करता था, पर वह दौर ऐसा बदला कि निर्माताओं में माफियाओं, गिरोहबाजों, अपराधियों, यहां तक कि अंडरवर्ल्ड सरगनाओं की आपराधिक जिंदगी को चमक-दमक के साथ परोसने की होड़ दिखने लगी है। 1980 के दशक में सई परांजपे और कुंदन शाह सरीखे विख्यात फिल्मकारों की फिल्मों में छायांकन कर चुके वरिष्ठ सिनेमेटोग्राफर श्री आनंदवर्धन मानते हैं कि ‘‘दौर बदल रहा है और आज ऐसे किरदारों पर फिल्में बन रही हैं जो नकारात्मक हैं।’’ ‘चश्मेबद्दूर’, ‘कथा’, ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ और ‘कभी हां, कभी ना’ जैसी फिल्मों के साथ ही सुनील दत्त की कई फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर रहे आनंदवर्धन यह तो कहते हैं कि ‘ऐसे किरदारों पर बन रही फिल्मों के पीछे पैसा कमाने की चाहत हावी रहती है’, पर वे यह भी मानते हैं कि ‘यह दौर ज्यादा लंबा नहीं चलने वाला।’

अब बात उसी तर्क की, कि फिल्में समाज का आईना होती हैं और वे वही दिखाती हैं जो समाज में घट रहा होता है। इस पैमाने पर ‘संजू’ या ‘डी-कंपनी’ या ‘वंस अपोन ए टाइम इन मुंबई’ या ‘रईस’ जैसी फिल्में कितनी खरी उतरती हैं, अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। दरअसल व्यावसायिक नजरिए के तहत ऐसा मसाला ढूंढा जाता है जिसे भावनात्मकता, ड्रामा और हास्य का तड़का लगाकर मनोरंजन के नाम पर परोसा जाता है। लेकिन क्या गारंटी है कि तीन घंटे ‘जी हल्का’ करने के नाम पर अपने ‘वीकैंड्स’ सिनेमाहॉल में बिताने वाले युवा ऐसी फिल्में देखकर ऐसे पात्रों से अभिभूत नहीं होंगे? 

कुछ बरस पहले कश्मीरी जिहादियों पर बनी एक फिल्म ‘हैदर’ देखी थी, जिसमें जिहादी बना शाहिद कपूर जब-जब भारतीय सैनिकों को ललकारता हुआ पिस्तौल तानता था, तब तब दिल्ली के लिबर्टी सिनेमा में ईद का जश्न मनाने आए युवक जोश से उछल पड़ते थे। उस मंजर को देखकर उपजी चिंता आज भी कायम है। 

बॉलीवुड के माफिया और अंडरवर्ल्ड के प्रति मोह को दिखातीं कुछ चर्चित फिल्में कंपनी

2002 में आई यह फिल्म काफी हद तक डी कंपनी यानी दाउद गिरोह के अंदर की हलचलों पर आधारित थी। इसमें दाउद और छोटा राजन के बीच हिंसक झड़पों और माफिया दादागीरी की झलक दिखाई दी। मुख्य किरदार अजय देवगन और विवेक ओबराय ने निभाए थे।

डी डे 

2013 में ही प्रदर्शित यह फिल्म के केन्द्र में भी मुम्बइया फिल्मकारों के पसंदीदा अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद की कारगुजारियों और चमक-दमक की है। फिल्म दाउद और उसके गिरोह की मारकाट, लूट और दबंगई को ‘जनता की पसंद’ कहकर बड़े परदे पर दिखाने के चलन को ही आगे बढ़ाने की कोशिश थी। इसमें ऋषि कपूर और इरफान खान मुख्य भूमिकाओं में नजर आए।

वंस अपॉन ए टाइम इन मुम्बई दोबारा

2013 में परदे पर आई यह फिल्म इसी नाम से 2010 में आई फिल्म की अगली कड़ी है। इसमें भी दादउ का बढ़ते-बढ़ते मुम्बई पर अपना सिक्का जमाने की कहानी दिखाई गई है। 

हसीना पारकर

2017 में परदे पर आई इस फिल्म में भी घुमा-फिराकर दाउद गिरोह और मुख्यत: उसकी बहन की जिंदगी को बढ़ा-चढ़ाकर जांबाजी का जामा पहनाने की कोशिश की गई है। हसीना का किरदार श्रद्धा कपूर ने निभाया है।

रईस

2017 में आई यह फिल्म गुजरात के अपराधी अब्दुल लतीफ को केन्द्र में रखकर बनाई गई है। विडम्बना यह कि एक अपराधी पर बनी यह फिल्म 2017 में गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले प्रदर्शित हुई और मुख्य किरदार निभाने वाले शाहरुख खान पर परोक्ष रूप से अपराधी के चरित्र को भी जनता की हमदर्दी दिलाने की कोशिश करने के आरोप लगाए गए।

डैडी

2017 में ही आई यह फिल्म कभी मुम्बई के ‘दादा’ रहे और बाद में राजनीति में उतरे अरुण गवली की जिंदगी के गिर्द बुनी गई है। गवली का किरदार अर्जुन रामपाल ने निभाया।

वंस अपॉन ए टाइम इन मुम्बई

2010 में प्रदर्शित इस फिल्म में मुम्बई पर कभी एकछत्र राज करने वाले तस्कर हाजी मस्तान को महिमामंडित किया गया है। इसमें कभी मस्तान के नीचे काम करने वाले दाउद का ग्लैमर की नगरी मुम्बई में धीरे-धीरे बढ़ता रुतबा भी दिखाया गया है।

हंगामा क्यों बरपा होता है?

जब भी कोई अभिनेता किसी अपराध में जेल भेजा जाता है तो सेकुलर मीडिया में उन्माद की हद तक तीन बातें बार-बार उभारी जाती हैं, कि-

—फलां अभिनेता के करोड़ों चाहने वालों के दिल को बहुत ठेस पहुंची है।

—उस अभिनेता के जेल जाने से फिल्मोद्योग को अरबों रुपए का नुकसान होगा, जिसकी भरपाई नहीं होे पाएगी और कितने ही निर्माता सड़क पर आ जाएंगे।

—अगर उस अभिनेता का संबंध मुस्लिम समाज से हो, तो पक्का जान लीजिए, कितने ही सेकुलर मानवाधिकारकर्मी, फिल्मी हस्तियां और मीडिया के झण्डाबरदार उसके समर्थन में आ खड़े होंगे और उसे इतना पाक-साफ, नेकदिल बताने की होड़ करते दिखेंगे कि जैसे उससे ज्यादा भला मानुष इस जगत में दूसरा नहीं है।

हॉलीवुड में बन रही भारतीय मेधाओं पर फिल्में

कैसी विडम्बना है कि जहां भारत के फिल्मकार माफिया सरगनाओं और दाउद सरीखे अंडरवर्ल्ड दादाओं पर फिल्में बना रहे हैं वहीं हॉलीवुड के फिल्मकार भारत की उन हस्तियों पर फिल्में बना रहे हैं जिन्होंने अपनी मेधा के दम पर दुनिया भर में देश का नाम रोशन किया है। ऐसी ही एक फिल्म है ‘द मैन हू न्यू इंफिनिटी’ जो सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एस. रामानुजम के जीवन पर आधारित है जिसमें मुख्य किरदार निभाया है ‘स्लमडॉग’फिल्म से मशहूर हुए देव पटेल ने।