''कई बालगृहों में जोर-जबरदस्ती से किया जाता है कन्वर्जन''
   दिनांक 14-जुलाई-2018
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित एवं दुनिया के प्रख्यात बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी मानते हैं कि रांची के मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर लगे आरोप बेहद गंभीर एवं आपराधिक हैं। अगर जांच में ये आरोप सत्य प्रमाणित होते हैं तो उस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। पाञ्चजन्य संवाददाता अश्वनी मिश्र ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी में बच्चों के बेचे जाने के मामले एवं उनके साथ बढ़ते अपराध को केन्द्र में रखकर श्री सत्यार्थी से विस्तृत बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

झारखंड की राजधानी रांची स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी की ओर से संचालित 'निर्मल हृदय' में बच्चों के बेचे जाने के मामले पर आप क्या कहेंगे?
देखिए,अभी तक जो आरोप सामने आए हैं, वे बहुत ही गंभीर, अमानवीय और आपराधिक हैं। अंतिम फैसला तो न्यायालय में होगा, लेकिन यह कोई एकांगी घटना नहीं है। चर्च की संस्थाओं, मदरसों और साधुओं के मठों में बच्चों के साथ होने वाले दुराचार की घटनाएं और भी ज्यादा शर्मनाक होती हैं। यहां मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मामले में एक और गंभीर सवाल जुड़ा हुआ है। जब वहां पर बच्चों का रिहाइशी केंद्र था तो अब तक उसे कानून के दायरे में क्यों नहीं रखा गया? यानी कि किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के तहत उसका रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं हुआ? हाल ही में कथित गुरु दाती महाराज के आश्रमों में भी युवतियों के साथ बलात्कार के आरोप लगे हैं। आसाराम बापू का मामला तो जग-जाहिर है ही। देश में बाल गृहों की दुर्गति पर लगातार शर्मनाक खुलासे हो रहे हैं। कहीं बच्चों को गायब कराकर बेचा जा रहा है, तो कहीं लड़कियों से वेश्यावृत्ति कराई जा रही है। बिहार के मुजफ्फरपुर के एक बालिका गृह की लड़कियों को नेताओं और अफसरों के पास भेजा जा रहा था। मदरसों में भी लड़कियों का शोषण हो रहा है। हाल ही में दिल्ली में 70 साल के मौलवी द्वारा 9 साल की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना सामने आई। कुछ साल पहले मेरे संगठन ने ईसाइयत की आड़ में चलने वाले दो बाल गृहों से दर्जनों बच्चों को मुक्त कराया था। मैं बच्चों के सभी रिहाइशी केंद्रों को कानून के दायरे में लाकर उनके नियंत्रण और निगरानी के लिए लगातार संघर्ष करता आ रहा हूं। हमने ऐसे मामलों में अपनी मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की थी, जिस पर 2015 में बड़ा सख्त फैसला आया। न्यायालय ने नाबालिगों को रखने वाले हर बालगृह को पंजीकृत कराने के आदेश दिए थे। इसके परिणामस्वरूप 2-3 साल में पंजीकृत बालगृहों की संख्या करीब 6,000 तक पहुंच गई, जो पहले केवल 800 थी। अब बालगृहों का अनिवार्य पंजीकरण नए जेजे एक्ट का हिस्सा भी है। लेकिन नेताओं और राजनीतिक दलों की साठगांठ से पांथिक संस्थाएं कानून की परवाह नहीं करतीं। बिना पंजीकरण के संचालित होने वाले सभी अवैध बालगृहों पर फौरन कार्रवाई होनी चाहिए।
हिमाचल में गुड़िया की घटना को आपने बड़ी मुखरता से उठाया, लेकिन मंदसौर में 7 साल की मासूम के साथ हुई दरिंदगी पर ऐसी मुखरता नहीं दिखी?
हिमाचल की गुड़िया और मंदसौर की निर्भया दोनों ही मेरी बेटियां हैं। उनके साथ बलात्कार करने वाले राक्षस हैं। जो उन्हें हिंदू या मुसलमान मनाता है, वह हिंदुत्व और इस्लाम को नहीं समझता। मैंने दोनों ही मामलों में सख्त रवैया अपनाया है। दुर्भाग्य से गुड़िया की बर्बरता और दरिंदगी से हत्या करने वाले हत्यारों की पहचान करने में देर हुई। सरकारी तौर पर मामले में लीपापोती की गई। पुलिस ने तो और घिनौना रवैया अपनाया। सीबीआई ने अपनी जांच में स्थानीय पुलिस अधिकारियों को दोषी पाया और गिरफ्तार भी किया, जबकि दूसरी ओर मंदसौर की निर्भया के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार ने जो मुस्तैदी दिखाई है, वह सराहनीय है। हमारे संगठन 'बचपन बचाओ आंदोलन' के साथी घटना के दूसरे दिन से ही निर्भया के परिवारवालों, पुलिस और अस्पताल के अधिकारियों से लगातार संपर्क में हैं। हां, यह जरूर है कि मैं और मेरे साथी ऐसी उन्मादी भीड़ के खिलाफ हैं जो खुद आरोपी बलात्कारियों को फांसी पर लटकाना चाहती है या फिर तड़पा-तड़पा कर मार डालना चाहती है,  उसको हम कभी भी समर्थन नहीं देते।
बच्चों की तस्करी के मुद्दे पर आप मुखरता से काम कर रहे हैं। पाञ्चजन्य के साथ एक साक्षात्कार में आपने मिशनरी और एनजीओ की संलिप्तता को उजागर किया था। 'निर्मल हृदय' की घटना उसी बात पर मुहर लगाती है। इस सचाई पर आप क्या कहेंगे ?
हां, मैंने कुछ एनजीओ के छिपे हुए एजेंडे पर बात की थी। मैं आज भी मानता हूं कि नेताओं और अफसरों के संरक्षण में चलने वाले कई बाल गृहों में 'ट्रैफिकिंग' और बलात्कार ही नहीं होता, बल्कि लालच और जोर-जबरदस्ती से कन्वर्जन किया जाता है और बच्चों का ब्रेनवॉश कर उनमें आतंकवादी बनने का बीज भी बोया जाता है।
देश में छोटे बच्चों के साथ बलात्कार के मामले बढ़े हैं। आखिर इसके पीछे क्या कारण है ?
देश में बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं। यह भी सच है कि हमारे देश में बाल हिंसा रोकने के लिए अच्छे कानून भी हैं। लेकिन सामाजिक जागरूकता और पारिवारिक मूल्यों के पतन की वजह से बलात्कार और बच्चों का यौन शोषण महामारी का रूप ले चुका है। मैं इसे 'अनैतिकता की महामारी' कहता हूं। बच्चों के यौन शोषण और तस्करी के खिलाफ समाज को जागरूक करने के लिए पिछले साल हमने देशव्यापी भारत यात्रा का आयोजन किया था। यह यात्रा 12,000 किलोमीटर की दूरी तय कर 23 राज्यों से गुजरी थी। बाल यौन हिंसा के खिलाफ यह दुनिया का सबसे बड़ा अभियान था। हम अपने उद्देश्य में सफल रहे और समाज में बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक चेतना जगी है। लेकिन, बलात्कार और बच्चों के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा हमारे परिवारों और समाज के ताने-बाने को तहस-नहस कर रही है। जिन मूल्यों में भारत की आत्मा बसती है, वह परिवार और कुटुम्ब में आस्था से उपजा स्वाभाविक संरक्षण है। लेकिन आज जब छोटी-छोटी बच्चियों से रिश्तेदार ही नहीं, बल्कि सगे पिता और भाई तक बलात्कार करने लगे हों तो हम किस भारतीयता पर गर्व कर पाएंगे?
बच्चों के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा की एक बड़ी वजह 'पोर्नोग्राफी' है। पिछले दिनों एक केंद्रीय मंत्री मुझसे मिलने आए। मैंने उन्हें सोशल मीडिया पर बढ़ती पोर्नोग्राफी के प्रति आगाह किया और आग्रह किया कि वे इसे रोकने के लिए सभी देशी-विदेशी कंपनियों पर शिकंजा कसने के लिए कानून बनाएं। मैंने उनसे वादा भी किया कि इस काम में मैं आपका साथ दूंगा और 'पोर्नोग्राफी' के खिलाफ सामाजिक चेतना जगाने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा। मैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के साथ मिलकर प्रयास कर रहा हूं कि 'पोर्नोग्राफी' के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र का एक कानून बने।
हाल ही में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष श्री आलोक कुमार का अपने कार्यालय में अभिनन्दन करते हुए उनसे भी आग्रह किया कि आगामी कुंभ में सभी धर्मगुरुओं और अखाड़ा प्रमुखों को 'पोर्नोग्राफी' के खिलाफ एकजुट किया जाए। वे अपने प्रवचनों और उपदेशों के माध्यम से जनता को इस बारे में जागरूक करें।